ऑटिज्म के नाम पर स्टेम सेल का खेल खत्म! सरकार ने जारी की सख्त एडवाइजरी

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आजकल मेडिकल की दुनिया में एक शब्द बहुत तेजी से सुनने को मिलता है, वो है ‘स्टेम सेल थेरेपी’।कई प्राइवेट क्लीनिक और अस्पताल इसे जादुई इलाज बताकर प्रचार करते हैं। खासकर जब बात बच्चों में ऑटिज्म (Autism Spectrum Disorder) की आती है, तो परेशान मां-बाप किसी भी उम्मीद के सहारे लाखों रुपये लुटाने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन अगर आप भी किसी रिश्तेदार या बच्चे के लिए ऐसा कोई इलाज करवाने की सोच रहे हैं, तो जरा ठहरिए।केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने इस पर एक बहुत सख्त एडवाइजरी जारी की है।
सरकार ने साफ लफ्जों में कह दिया है कि स्टेम सेल कोई जादू की पुड़िया नहीं है जिसे हर बीमारी में बेच दिया जाए।

आइए समझते हैं कि सरकार की नई गाइडलाइन क्या कहती है और एक आम परिवार को किन बातों को लेकर सतर्क रहना जरूरी है।

सरकार के नए आदेश के मुताबिक, ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी को किसी भी सूरत में सामान्य या रूटीन इलाज के तौर पर नहीं दिया जा सकता।

ऑटिज्म के मामले में इसे केवल मंजूर क्लीनिकल ट्रायल (रिसर्च) के तहत ही आजमाया जा सकता है, वह भी सख्त निगरानी में।
कोई भी अस्पताल या डॉक्टर इसे अपनी दुकान चलाकर कमर्शियल सर्विस की तरह नहीं बेच सकता।
अगर कोई क्लीनिक स्टेम सेल थेरेपी से ऑटिज्म को पूरी तरह ठीक करने का दावा करता है, तो ऐसे दावों का समर्थन करने वाले पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और ऐसे प्रचार को लेकर NMC तथा स्वास्थ्य मंत्रालय ने सख्त चेतावनी दी है।
यह नया नियम नेशनल गाइडलाइंस फॉर स्टेम सेल रिसर्च 2017 और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के आधार पर कड़ाई से लागू किया गया है।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल आम इलाज के तौर पर सिर्फ उन्हीं गिनी-चुनी बीमारियों में किया जा सकता है, जिन्हें सरकार से आधिकारिक तौर पर मंजूरी मिली हुई है।

खून से जुड़ी कुछ खास गंभीर बीमारियों (जैसे ल्यूकेमिया या थैलेसीमिया) में बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसी स्वीकृत विधियां ही मान्य हैं।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्टेम सेल थेरेपी को केवल स्वीकृत संकेतों (approved indications) में ही मानक उपचार माना जा सकता है।अन्य बीमारियों में इसका उपयोग स्थापित वैज्ञानिक और नियामकीय मानकों के अनुरूप होना चाहिए।
बिना वैज्ञानिक प्रमाण के मरीजों पर ऐसे प्रयोग करना उनकी जान को जोखिम में डालने जैसा है।

मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चिट्ठी लिखकर इन नियमों का सख्ती से पालन कराने को कहा है।नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने भी डॉक्टरों को कड़ी चेतावनी दी है।

अगर कोई डॉक्टर गैर-मंजूर बीमारी के लिए स्टेम सेल लिखता है या उसका इलाज करता है, तो इसे पेशेवर कदाचार माना जाएगा।
गलत प्रचार, बड़े-बड़े पोस्टर या झूठे विग्यापन करने वाले क्लीनिकों पर सीधी कानूनी कार्रवाई होगी।
नियमों के उल्लंघन के मामलों में संबंधित नियामकीय और कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
NMC ने राज्य मेडिकल काउंसिलों और चिकित्सा संस्थानों से शिकायतों पर नियमानुसार जांच और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है।

जब घर में कोई बच्चा ऑटिज्म से जूझ रहा होता है, तो पूरा परिवार मानसिक रूप से काफी परेशान रहता है इसी मजबूरी का फायदा कुछ गैर-जिम्मेदार संस्थान उठाते हैं।आम जनता को इन बातों का खास खयाल रखना चाहिए:

चमत्कारी दावों से दूर रहें: मेडिकल साइंस में आज तक ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला है कि स्टेम सेल से ऑटिज्म पूरी तरह ठीक हो सकता है।
रिसर्च के नाम पर वसूली न दें: अगर कोई डॉक्टर कहता है कि यह ट्रायल चल रहा है, तो ट्रायल के नाम पर मरीज से लाखों रुपये नहीं वसूले जा सकते।
आथेराइज्ड डॉक्टर की राय लें: किसी भी नए या महंगे इलाज में हाथ डालने से पहले सरकारी मेडिकल कॉलेज या किसी बड़े न्यूरोलॉजिस्ट से दूसरी सलाह जरूर लें।
यह एडवाइजरी असल में आम जनता की गाढ़ी कमाई और मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लाई गई है।उम्मीद के नाम पर चल रहे इस महंगे और अप्रमाणित धंधे पर रोक लगना बेहद जरूरी था। अगर आपके आसपास भी कोई ऐसा झूठा दावा कर रहा है, तो फौरन सतर्क हो जाएं और बिना सोचे-समझे ऐसे जाल में न फंसें।

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