अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू होनी चाहिए या नहीं, यह सवाल अब केवल सामाजिक बहस नहीं रहा, बल्कि संवैधानिक कानून के केंद्र में पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं के जरिए मांग की गई है कि आरक्षित वर्गों के भीतर आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे निकल चुके परिवारों को आरक्षण लाभ से बाहर किया जाए। लेकिन इस मामले में अगस्त 2026 में केंद्र ने अपने हलफनामे में SC-ST आरक्षण से अपेक्षाकृत संपन्न लोगों को बाहर करने के लिए OBC जैसी क्रीमी व्यवस्था लागू करने का विरोध किया है।
मामले की पेचीदगी इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के 2024 के State of Punjab v. Davinder Singh फैसले में SC-ST के भीतर उप-वर्गीकरण को संवैधानिक रूप से स्वीकार किया गया और जस्टिस बीआर गवई की राय में SC और ST पर क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करने की बात कही गई। हालांकि, केंद्र अब पुराने फैसलों का हवाला देकर कह रहा है कि SC-ST के लिए OBC वाला क्रीमी लेयर सिद्धांत सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग जनहित याचिकाएं दाखिल हुई हैं। रामाशंकर प्रजापति और अन्य की याचिका में सभी आरक्षित वर्गों के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता तय करने की मांग की गई है। इसमें SC, ST, OBC और EWS जैसे वर्गों को शामिल किया गया है।
दूसरी ओर अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका विशेष रूप से SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने पर केंद्रित है। याचिका में तर्क है कि अत्यधिक सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके परिवारों के बच्चों को लगातार आरक्षण लाभ मिलने से सबसे वंचित वर्ग पीछे रह सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रजापति की याचिका पर 11 अगस्त 2025 को नोटिस जारी किया था। उपाध्याय की याचिका पर 12 जनवरी 2026 को केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी हुआ।
दरअसल, क्रीमी लेयर का मूल विचार यह है कि किसी पिछड़े वर्ग के वे लोग जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पर्याप्त आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जा सकता है। 1992 के Indra Sawhney फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC के लिए क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने का सिद्धांत स्वीकार किया। अब समाज में उसी तर्ज पर SC-ST जातियों में भी क्रीमीलेयर की बात उठ रही है, ताकि इन जातियों में जो लोग आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाए। यह बहस केवल आय सीमा तय करने की नहीं, बल्कि यह तय करने की भी है कि SC-ST के आरक्षण का संवैधानिक उद्देश्य किस कसौटी से मापा जाए।
केंद्र का मुख्य तर्क है कि SC-ST और OBC की संवैधानिक तथा सामाजिक पृष्ठभूमि एक जैसी नहीं है। समुदाय की पहचान में विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव और ऐतिहासिक पिछड़ापन भी महत्वपूर्ण हैं। इसके विपरीत OBC की पहचान सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के विभिन्न मानकों से जुड़ी है। केंद्र का कहना है कि SC-ST के साथ भेदभाव केवल परिवार की आय बढ़ने से समाप्त नहीं हो जाता। इसलिए केवल आय के आधार पर किसी व्यक्ति को आरक्षण से बाहर करना संवैधानिक उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 क्रमशः SC और ST की सूची से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था प्रदान करते हैं। केंद्र का कहना है कि इन सूचियों में शामिल या बाहर करने की शक्ति सामान्य तौर पर संसद के कानून से जुड़ी है। सरकार इसी आधार पर यह तर्क दे रही है कि अदालत या राज्य सरकारें सूची को अपनी ओर से बदल नहीं सकतीं।
हालांकि क्रीमी लेयर का प्रश्न तकनीकी रूप से किसी जाति या जनजाति को सूची से हटाने और आरक्षण का लाभ न देने के बीच अंतर पैदा करता है। 2024 के जस्टिस गवई के मत में भी यह अंतर महत्वपूर्ण था कि क्रीमी लेयर से बाहर करना संबंधित समुदाय को SC-ST सूची से हटाना नहीं है। यानी व्यक्ति अपनी संवैधानिक श्रेणी में बना रह सकता है, लेकिन किसी विशेष आरक्षण लाभ के लिए अलग कसौटी लागू हो सकती है।
यही बिंदु केंद्र के मौजूदा तर्क और 2024 के न्यायिक विचारों के बीच महत्वपूर्ण कानूनी टकराव पैदा करता है। अंतिम स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि सुप्रीम कोर्ट मौजूदा याचिकाओं में इन संवैधानिक प्रावधानों और पुराने फैसलों को किस तरह पढ़ता है।
गौर तलब है कि केंद्र ने इस मामले में न्यायपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र का सवाल भी उठाया है। सरकार का कहना है कि आरक्षण नीति बनाना व्यापक नीतिगत और विधायी प्रक्रिया का विषय है। दूसरी तरफ याचिकाकर्ता आरक्षण के वास्तविक लाभ को सबसे वंचित लोगों तक पहुंचाने और समानता के संवैधानिक सिद्धांत का तर्क दे रहे हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के सामने केवल क्रीमी लेयर की उपयोगिता नहीं, बल्कि न्यायिक समीक्षा की सीमा और नीति निर्माण की संवैधानिक सीमा भी महत्वपूर्ण प्रश्न है।
अभी सबसे अहम सवाल यह है कि केंद्र के ताजा हलफनामे और 2024 के न्यायिक दृष्टिकोण के बीच कानूनी स्थिति किस दिशा में जाती है।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र से Davinder Singh फैसले के अनुपालन पर Action Taken Report मांग चुका है। दूसरी ओर, केंद्र का वर्तमान रुख है कि SC-ST में क्रीमी लेयर लागू करने की जरूरत नहीं है और OBC वाला मॉडल यहां सीधे लागू नहीं किया जाना चाहिए।
यदि अदालत इस मुद्दे पर कोई बाध्यकारी आदेश देती है, तो उसके बाद सरकार को मानदंड, प्रक्रिया और संवैधानिक आधार स्पष्ट करने पड़ सकते हैं।
फिलहाल केवल केंद्र के हलफनामे से SC-ST आरक्षण की मौजूदा पात्रता व्यवस्था में स्वतः बदलाव नहीं होता।
इसी तरह 2024 की न्यायिक राय को आधार बनाकर यह कहना भी उचित नहीं होगा कि SC-ST में क्रीमी लेयर का कोई निश्चित आय मानदंड पहले से लागू है।
आने वाली सुनवाई इस विवाद के कानूनी दायरे और सरकार की कार्रवाई की दिशा स्पष्ट कर सकती है।

