अखिलेश अखिल
राजस्थान में इसी साल चुनाव होने हैं और पार्टी के दो बड़े नेता मुख्यमंत्री गलत और सचिन पायलट के बीच घमासान मचा हुआ है। गहलोत की अपनी राजनीति है लेकिन सच्ची की राजनीति भी कमतर नहीं। गहलोत की पकड़ जहां दलित और पिछड़े वोटों पर हैं वहीँ सचिन जाटों और गुर्जरों के नेता हैं। और उनकी इस समाज में पकड़ भी है। कई इलाकों में सवर्ण समाज के लोग भी सचन के साथ खड़े होते दीखते हैं। लेकिन पिछले दो साल से सचिन और पायलट के बीच रार मची है। पायलट अब कई मौकों पर गहलोत की नीतियों के खिलाफ भी बोलते नजर आते हैं हालांकि उनका तर्क है कि वे किसी भी सूरत में पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचार की जांच चाहते हैं।
दोनों नेताओं के बीच रार इतनी बढ़ गई है कि दोनों एक साथ नहीं बैठते। हालांकि तीन दिन पहले खड़गे से सामने ही दोनों नेताओं की बैठक हुई थी लेकिन कोई सुलह का रास्ता नहीं निकल पाया था। लेकिन आज फिर से खड़गे के साथ इन दोनों नेताओं की बैठक होने जा रही है। ये बैठक पायलट के उस ‘‘अल्टीमेटम’’ के बाद हो रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर राज्य सरकार से की गई उनकी तीन मांगों को इस महीने के अंत तक पूरा नहीं किया गया तो वह राज्यव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। पायलट की एक मांग है कि पूर्ववर्ती वसुंधरा राजे सरकार के कार्यकाल में हुए कथित घोटालों की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
सूत्रों के अनुसार, राज्य के सभी नेताओं के साथ कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की बैठक 26 मई को होनी थी, लेकिन बाद में इसे स्थगित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले आलाकमान गहलोत और पायलट को एक मंच पर लाने के लिए उनसे अलग-अलग मुलाकात करेगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैठक में राजस्थान के प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, गोविंद सिंह डोटासरा, अशोक गहलोत, सचिन पायलट समेत डॉ. सीपी जोशी को बुलाया गया है। इसके अलावा, रघु शर्मा, हरीश चौधरी, भंवर जितेंद्र सिंह, रघुवीर मीणा, कुलदीप इंदौर भी बैठक में मौजूद रहेंगे।
सूत्रों ने कहा कि खरगे को कर्नाटक में सिद्धारमैया और डी के शिवकुमार को भी साथ में लाने में सफलता मिली और पार्टी अब चाहती है कि राजस्थान में भी इसी फॉर्मूले को अपनाया जाए। हालांकि राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जा रहा है कि अगर दोनों नेता में विवाद बढ़ता गया तो चुनाव में पार्टी की हार भी सकती है। लेकिन अगर दोनों मिलकर मैदान में आ गए तो बीजेपी की मुश्किलें और बढ़ेगी। फिर पांच साल पर राजस्थान में सत्ता बदलने की राजनीति रुक भी सकती है।

