क्या बिहार की अति पिछड़ी राजनीति में बीजेपी सेंध लगा रही है ?

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अखिलेश अखिल 
क्या बिहार की अति पिछड़ी रजनीति इस बार नीतीश कुमार के हाथ से निकल जाएगी ? दूसरा सवाल यह भी क्या बीजेपी अब नीतीश की अति पिछड़ी जाति की राजनीति को साधंने में जुट गई है ?और बड़ा सवाल यह कि क्या इस बार के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की सभी राजनीति को चुनौती देते हुए बीजेपी पहले से ज्यादा सीट हासिल करेगी जैसा की बीजेपी दावा भी कर रही है ? ऐसे बहुत से सवाल इन दिनों बिहार की राजनीति में उम्र घूमर रहे हैं। बिहार के बहुत से जानकार यह भी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार का इकबाल अब ख़त्म हो गया है। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार के साथ अब कोई जाति ऐसी खड़ी  नहीं है जिसके वोट पर जदयू गुमान कर सकें। 

 लेकिन सबसे पहले गठबंधन की सीट शेयरिंग पर एक नजर रखने की जरूरत है। बिहार ले लोकसभ की 40 सीटें है। पिछले लोकसभा चुनाव में जदयू और बीजेपी का गठबंधन था। चिराग पासवान की पार्टी भी बीजेपी के साथ थी। तीनो को मिलकर कुल 39 सीटें बीजेपी गठबंधन के पास गई थी और मात्र एक सीट पर कांग्रेस को मिली थी। लेकिन इस बार खेल दूसरा है।  चुनाव में जदयू ,राजद और कांग्रेस के साथ ही वाम दल भी एक साथ हैं। उधर बीजेपी और चिराग की पार्टी के साथ ही कुछ और खुदरा दल भी खड़े हैं। कई लोग कह रहे हैं कि बीजेपी के वोट में कमी नहीं होगी। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि बीजेपी के साथ होने की वजह से पिछले चुनाव में जदयू की अच्छी सीटें मिल गई थी। लेकिन क्या यह भी नहीं है कि गठबंधन की राजनीति में जदयू के साथ का लाभ बीजेपी को भी मिला। नीतीश कुमार जिस वोट बैंक की राजनीति करते रहे हैं उस वोट बैंक का लाभ बीजेपी को भी मिला है। ठीक उसी तरह से बीजेपी के वोट बैंक का लाभ नीतीश कुमार को भी मिला है। 

 लेकिन क्या इस बार बीजेपी को उतनी ही सीट मिलेगी जितनी पिछले चुनाव में मिली थी। सच तो यही है कि पिछले चुनाव में बीजेपी के पास जितनी सीटों पर जीत हसली हुई थी उनमे से दर्जन भर सीटों पर अगर बीजेपी इस बार उम्मीदवार नहीं बदलती है तो उसकी जीत असम्भव है। जाहिर है जब सीट बदलेगी और उम्मीदवार भी बदलेंगे तो इसका अलग समीकरण खड़ा होगा। बड़ी बात तो यह भी है कि यादवो का एक बड़ा वोट बैंक भी बीजेपी के साथ जुड़ा है।

हो सकता है कि मध्यप्रदेश के सीएम मोहन यादव को बिहार में उतारकर बीजेपी कुछ वोट को भी राजद से झटक ले। यह भी संभव है कि बीजेपी नीतीश कुमार के वोट बैंक को भी हड़प ले। कहने के लिए कुछ भी कहा जा सकता है। बीजेपी तो हर बार यही कहती है कि वह सभी सीटें जीत रही है लेकिन कभी ऐसा संभव नहीं हो सका। जब भी नीतीश कुमार बीजेपी के साथ रहे तब ही बीजेपी की बड़ी जीत सुनिश्चित हो सकी है। ऐसे में इस बार देखना होगा कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी कितनी ताकतवर दिखती है। अगर लोकसभा चुनाव में बीजेपी आगे बढ़ जाती है और इंडिया गठबंधन को बड़ी चुनौती देती है तो साफ़ है कि आगामी राजनीति नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के लिए कठिन हो जाएगी। कह सकते हैं कि नीतीश कुमार के लिए यह चुनाव उनके भविष्य को निर्धारित करने वाल ही होगा। 

  अब सीटों की बात। इंडिया गठबंधन के भीतर बिहार में सीटों को लेकर जो भी पेंच फंसा है उसमे बड़ी भूमिका राजद की है। पिछले चुनाव में राजद को लोकसभा चुनाव में एक सीट भी नहीं मिली थी। लेकिन इस बार वह ज्यादा सीट मांग रही है। फिर वह उस सीट को भी मांग रही है जो सीट जदयू पिछले चुनाव में जीतकर आयी थी। भला जदयू उन सीटों को कैसे छोड़ सकती है। एक समय था जब जदयू काफी ताकतवर थी लेकिन विधान सभा चुनाव में मात्र 45 सीटों पर सिमटने वाली जदयू आज राजद के सामने काफी कमजोर है। ऐसे में अगर जदयू सीटों को लेकर को मांग करती है और राजद पर दवाब बनाती है तो वह भी संभव नहीं नहीं है। और अगर नहीं बनाती है तो साफ़ है कि जदयू के बहुत से सांसद किसी दूसरी पार्टी के साथ जा सकते हैं। हो सकता है कि बीजेपी के साथ भी चले जाए। नीतीश कुमार के सामने यही बड़ी समस्या है। लेकिन  इस बात की  गुंजाइस है कि अगर गठबंधन को आगे ले जाना है तो सीटों पर तालमेल तो करना ही होगा। बीजेपी के साथ भी यही दिक्कत आने वाली है।

अब अति पिछड़ी जाति के वोट बैंक पर ध्यान देते हैं। जाति गणना के आंकड़ों से पता चला है कि बिहार में 36 फीसदी आबादी अत्यंत पिछड़ों की है। इसमें आठ फीसदी मुस्लिम आबादी भी शामिल है। उसे हटा दें तब भी 26 फीसदी आबादी का एक बड़ा ब्लॉक है। अभी तक इस आबादी के एकमात्र नेता नीतीश कुमार थे। उनकी पार्टी अत्यंत पिछड़ा और महादलित वोट की राजनीति करती थी। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के अपने लंबे कार्यकाल के बिल्कुल शुरुआत में ही कर्पूरी ठाकुर के फॉर्मूले पर पिछड़ा और अति पिछड़ा का आरक्षण कर दिया था और दलित व महादलित के दो अलग समूह बना दिए थे। नीतीश कुमार से अलग होने के बाद भारतीय जनता पार्टी भी अत्यंत पिछड़ा राजनीति में हाथ आजमा रही है हालांकि उसे अभी बहुत कामयाबी हाथ नहीं लगी है।

इस बीच बिहार की राजनीति में अत्यंत पिछड़ा प्रतिनिधि चेहरा रहे पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की सौवीं जयंती आ गई है। कर्पूरी ठाकुर की राजनीति पर मंडल के दोनों नेता लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दावा करते हैं लेकिन मूल रूप से उसके प्रतिनिधि नीतीश कुमार ही है, जिन्होंने कर्पूरी के ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर को राज्यसभा भी भेजा है। वे लगातार दो बार से राज्यसभा में हैं और इस बार भी उनको नया कार्यकाल मिल सकता है।

लेकिन 24 जनवरी को कर्पूरी ठाकुर की सौवीं जयंती के मौके पर नीतीश कुमार के साथ साथ भाजपा भी बड़ा कार्यक्रम कर रही है। नीतीश की पार्टी ने वेटनरी कॉलेज ग्राउंड में बड़ी रैली का आयोजन किया है तो भाजपा ने मिलर स्कूल में रैली रखी है। भाजपा के नेता सुशील मोदी ने दावा किया है कि राजद के साथ जाने से नीतीश का अत्यंत पिछड़ा वोट उनको छोड़ चुका है। उन्होंने यह भी दावा किया है कि अति पिछड़ा वोट भाजपा से जुड़ा है। इस बार सिर्फ रैलियों में नहीं, बल्कि सीटों के बंटवारे में अति पिछड़ों को महत्व मिलने की संभावना है। 

 लेकिन बीजेपी का जो दावा है क्या वही सच है ? अगर बीजेपी को राम मंदिर का लाभ मिल सकता है तो महागठबंधन को भी नीतीश की उन योजनाओं का लाभ भी मिल सकता है जो अभी वे करते जा रहे हैं। पांच लाख लोगों को नौकरी और रोजगार देने का काम जो नीतीश कुमार ने किया है उसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। बिहार ही महिलाओं में भी नीतीश कुमार की अच्छी पकड़ है। नीतीश कुमार को भी इसका लाभ मिल सकता है। 

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