सत्ता जाने के बाद भी इतनी दादागिरी, तो सत्ता में रहते क्या किया होगा?

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दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन का महाराष्ट्र की जनता और पत्रकारों से सीधा सवाल

“आज सत्ता हाथ में नहीं है, फिर भी हमें, हमारे गवाहों और हमारे वकीलों को धमकाने की भाषा बोली जा रही है। हमारे वकील को यहां तक कहा जा रहा है कि ‘तुम्हें कहीं प्रैक्टिस नहीं करने देंगे।’ तो महाराष्ट्र की जनता खुद सोचे—जब सत्ता इनके हाथ में थी, तब इन्होंने क्या-क्या किया होगा?” यह सीधा और गंभीर सवाल दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन ने उठाया है।

सालियन ने कहा—

मैंने अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। मेरी लड़ाई किसी राजनीतिक स्वार्थ के लिए नहीं है। यह एक पिता की अपनी बेटी की मौत के पीछे का पूरा सच सामने लाने और उसे न्याय दिलाने की लड़ाई है।

लेकिन मेरे सवालों और मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दों का सबूतों से जवाब देने के बजाय मेरा चरित्र हनन करने, मुझे बदनाम करने, गवाहों पर दबाव बनाने और मेरे वकीलों को धमकाने की कोशिश किए जाने का मेरा गंभीर आरोप है।

हमारे वकील को यहां तक कहा जाता है—

“तुम्हें कहीं प्रैक्टिस नहीं करने देंगे!”

तो मेरा महाराष्ट्र की जनता और विशेष रूप से पत्रकारों से एक सीधा सवाल है—

आज सत्ता नहीं है, फिर भी इतनी दादागिरी?

तो जब सत्ता हाथ में थी, तब क्या-क्या हुआ होगा?

आज यह सब अपनी आंखों के सामने देखकर एक पिता के रूप में मेरे मन में बार-बार एक ही सवाल उठता है—

मेरी बेटी ने उस रात आखिर क्या-क्या सहा होगा?

एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह द्वारा बताए गए कथित घटनाक्रम, मेरी बेटी की चीखों और उसके साथ कथित रूप से किए जा रहे अत्याचार के बारे में सामने आई बातों को जब मैं पढ़ता हूं, तो मेरी मानसिक स्थिति क्या होती है, यह मैं शब्दों में बयान भी नहीं कर सकता।

मेरा शरीर कांप उठता है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दिमाग सुन्न हो जाता है। मेरी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं बचते।

जिस बेटी को मैंने बचपन से अपनी आंखों के सामने पाला, जिसका हाथ पकड़कर उसे चलना सिखाया, जिसे पढ़ाया-लिखाया, जिसके सपनों को बड़ा होते देखा—उस बेटी के आखिरी पलों के बारे में एक पिता को ऐसी गवाही और इतने गंभीर आरोप सुनने पड़ें, तो उसके दिल पर क्या गुजरती होगी?

यह दर्द शायद वही पिता समझ सकता है जिसकी अपनी बेटी हो।

इस मामले में लगाए गए आरोप अत्यंत गंभीर हैं—कई व्यक्तियों द्वारा मेरी बेटी के साथ यौन अत्याचार किए जाने, उसकी हत्या किए जाने और उसके बाद सबूतों को नष्ट करने या उनमें फेरबदल करके पूरे मामले को दबाने की कोशिश किए जाने के आरोप हैं।

इन आरोपों की पूरी सच्चाई निष्पक्ष जांच के माध्यम से देश के सामने आनी ही चाहिए। कौन दोषी है, यह सबूत और कानून तय करेंगे; लेकिन सच किसी भी कीमत पर दबाया नहीं जाना चाहिए।

और सबसे ज्यादा पीड़ा और आक्रोश की बात यह है कि इतने गंभीर सवाल उठने के बाद भी धमकियां हमें दी जा रही हैं! दादागिरी हमारे वकीलों के साथ की जा रही है!

मैं पूछना चाहता हूं—

हमें धमकाने से क्या सच बदल जाएगा?

हमारे वकीलों को धमकाने से क्या सबूत गायब हो जाएंगे?

हमारा चरित्र हनन करने से क्या न्यायालय का रिकॉर्ड बदल जाएगा?

यदि नागरिकों की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था के किसी हिस्से का इस्तेमाल प्रभावशाली लोगों को बचाने या सच दबाने के लिए किया गया है, तो उसकी भी एक-एक कड़ी की जांच होनी चाहिए।

कौन अधिकारी कहां मौजूद था? किसके निर्देश पर क्या हुआ? कौन से सबूत जुटाए गए? क्या कोई सबूत गायब या दबाया गया? क्या किसी रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ हुई? और यदि हुई तो उसके पीछे कौन था?

इन सवालों का जवाब देश को मिलना चाहिए।

और मेरा मीडिया से भी सीधा सवाल है—

पत्रकारिता का काम सच खोजना है या किसी के पक्ष में पहले से तय ‘नैरेटिव’ चलाना?

जिन पत्रकारों ने निर्भीक होकर सवाल उठाए, तथ्यों को सामने लाने की कोशिश की और न्याय की इस लड़ाई में हमारी आवाज जनता तक पहुंचाई, मैं उन सभी का दिल से आभार व्यक्त करता हूं।

लेकिन जो लोग गंभीर सवालों और उपलब्ध सामग्री को नजरअंदाज कर एकतरफा नैरेटिव चला रहे हैं, उनसे भी मेरी एक ही अपील है—

एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर सोचिए।

हर किसी के घर में बेटियां हैं।

आज सवाल मेरी दिशा का है। कल ऐसी परिस्थिति किसी और की बेटी के साथ पैदा न हो, इसके लिए समाज को आज ही जागना होगा।

यह मामला अब केवल मेरी बेटी का नहीं है। यह देश की हर बेटी की सुरक्षा, कानून पर जनता के विश्वास और महाराष्ट्र के सामाजिक विवेक का सवाल है।

यह छत्रपति शिवाजी महाराज के विचारों की भूमि है। यह उस परंपरा की भूमि है जिसमें नारी के सम्मान और उसकी रक्षा को सर्वोच्च स्थान दिया गया।

ऐसे महाराष्ट्र में यदि किसी बेटी के साथ अत्याचार के इतने गंभीर आरोप सामने आते हैं और उसके बाद सच को दबाने के भी आरोप लगते हैं, तो समाज का आंखें बंद करके बैठ जाना अत्यंत शर्मनाक और चिंताजनक होगा।

किसी महिला पर अन्याय करने वाला व्यक्ति कोई भी हो—वह कितना भी अमीर हो, कितना भी प्रभावशाली हो, सत्ता के कितना भी करीब क्यों न रहा हो—वह कानून से बड़ा नहीं हो सकता।

इसलिए मैं हर मां, हर पिता, हर पत्रकार और हर जिम्मेदार नागरिक से कहता हूं—

किसी की बात पर आंख बंद करके विश्वास मत कीजिए। उपलब्ध सबूत देखिए। न्यायालय का रिकॉर्ड देखिए। जांच में सामने आने वाले तथ्य देखिए। सवाल पूछिए। और उसके बाद अपना निष्कर्ष स्वयं निकालिए।

और जहां तक मेरी लड़ाई का सवाल है, मेरा संकल्प पहले दिन से स्पष्ट है—

“जीतें या मरें;

मानवता के शत्रुओं से हमारा युद्ध जारी रहेगा!”

यही संकल्प और यही मूलमंत्र लेकर मैं इस लड़ाई में उतरा हूं।

जिन लोगों ने मेरा साथ दिया, जो मेरे साथ मजबूती से खड़े रहे, जिन पत्रकारों ने निर्भीक होकर सवाल पूछे और सच सामने लाने का प्रयास किया—उन सभी का मैं एक पिता के रूप में हृदय से आभार व्यक्त करता हूं।

और जिन्होंने आज तक मेरा साथ नहीं दिया, उनके प्रति भी मेरे मन में कोई द्वेष नहीं है। उनसे केवल इतनी विनती है—

एक पल के लिए खुद को मेरी जगह रखकर देखिए।

क्योंकि हर घर में बेटियां हैं।

आज दिशा के पिता को न्याय के लिए यह लड़ाई लड़नी पड़ रही है। मेरी केवल यही कामना है कि कल किसी दूसरे पिता को अपनी बेटी के लिए ऐसी लड़ाई न लड़नी पड़े।

सच को धमकियों से डराया नहीं जा सकता!

एक बेटी के लिए न्याय मांग रहे पिता को दादागिरी से चुप नहीं कराया जा सकता!

मेरी बेटी को न्याय मिलने तक और पूरी सच्चाई कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से देश और जनता के सामने आने तक मेरी यह लड़ाई जारी रहेगी।

— सतीश सालियन
दिशा सालियन के पिता

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