उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस लगातार दलित वोट बैंक पर नजर बनाये हुए है। आजादी के बाद से लंबे समय तक कांग्रेस का कोर वोटबैंक दलित समुदाय हुआ करता था, लेकिन अस्सी के दशक में बसपा के सियासी उदय के बाद से दलित समाज उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से दूर होता चला गया। ऐसे में कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक को पाने के लिए यूपी में बसपा की तरफ रुख किया, लेकिन जब बसपा से निराशा हाथ लगी तो अब चंद्रशेखर की तरफ रुख कर रही है।इसको लेकर बसपा भी सावधान नजर आ रही है।
कांशीराम ने अपनी सियासी पारी का आगाज कांग्रेस के विरोध में शुरू किया और दलित समाज में राजनीतिक और सामाजिक चेतना ऐसी जगाई कि कांग्रेस हाशिए पर पहुंच गई।बसपा की क्या पहचान, ‘नीला झंडा और हाथी निशान’… यह नारा दलित गांव में गूंजने लगा था। दलित समाज के बीच बसपा की यही पहचान थी और सियासी ताकत।दलित समुदाय बसपा का मुख्य वोटबैंक बन गया, जिसके सहारे मायावती चार बार यूपी की मुख्यमंत्री बनीं और कांग्रेस सियासी वनवास पर चली गई।
ऐसे में अब कांग्रेस यूपी में दोबारा से इस वोट बैंक को पाने की कवायद में जुट गई है और इसके संकेत भी दिखाई पड़ने लगे हैं।कांग्रेस ने पहले बसपा से यूपी में हाथ मिलाने की कोशिश की, लेकिन बसपा के इनकार के बाद अब कांग्रेस चंद्रशेखर की तरफ रुख कर गयी है, ताकि दलित वोट फिर से कांग्रेस के पास आ सके।कांग्रेस ने एक बार फिर दलित समाज के विश्वास को हासिल करने के लिए कांशीराम को अपना सियासी हथियार बनाने का दांव चला है और मायावती की जगह चंद्रशेखर को चुना है।
यूपी में दलित मतदाता लगभग 21% से 22 % हैं और राज्य की 85 आरक्षित विधानसभा सीटें चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।यूपी में कुल दलित आबादी में करीब 11% जाटव और करीब 10 से 11% अन्य गैर-जाटव (जैसे पासी, कोरी, धोबी, वाल्मीकि आदि) जातियां शामिल हैं।दलित आबादी राज्य की 140 से अधिक सामान्य सीटों के नतीजों को सीधे प्रभावित करती है।कुल दलित आबादी में लगभग 11% आबादी जाटव समाज की है, जो परंपरागत रूप से बहुजन समाज पार्टी का कोर वोटर माना जाता है।बुंदेलखंड (झांसी, जालौन, चित्रकूट) के जिलों में दलित आबादी 25% से अधिक है। इसके अलावा पश्चिमी यूपी (बिजनौर, आगरा, सहारनपुर, बुलंदशहर) और पूर्वी यूपी (आजमगढ़, जौनपुर, चंदौली) में भी दलित वोटर्स का भारी दबदबा है।
कांग्रेस को लगता है कि पार्टी अपने पुराने दलित वोट बैंक को फिर अपनी ओर खींच सकती है। कांग्रेस को लगता है कि दलित मतदाता अब किसी अन्य विकल्प की तलाश में हैं। अब इसी वजह से बसपा अपने कोर वोट बैंक को लेकर अलर्ट हो गयी है।मायावती दलित समाज को इस बात के लिए लगातार आगाह करती रहती हैं कि कांग्रेस से दूर रहें।मायावती जानती हैं कि अगर मुस्लिम वोटों की तरह दलित समुदाय भी कांग्रेस की तरफ गया तो उनका राजनीतिक ग्राफ फिर कभी उठ नहीं पायेगा।
दलित वोटर जरूर 2024 के चुनाव में आरक्षण और संविधान के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ गए हैं, लेकिन अभी भी कांग्रेस को ये लगता है कि अगर यूपी में कोई दलित का चेहरा उनके साथ गठबंधन में रहेगा तो दलित वोट फिर कांग्रेस से कभी छिटकेगा नहीं और यूपी में उनका राजनीतिक वनवास खत्म हो जाएगा।
राजनीति में बसपा का जितनी तेजी से उदय हुआ, उतनी ही तेजी से पतन भी।इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं।यूपी में 2007 में विधानसभा चुनाव हो रहे थे। उस समय बसपा की लहर चली।30.43 फीसदी वोट के साथ बसपा ने यूपी में पूर्ण बहुमत भी हासिल की। बसपा ने 206 सीटें जीतकर सरकार बनाई।बसपा सुप्रीमो मायावती मुख्यमंत्री बनीं। पिछले दो चुनावों की बात करें तो बसपा का पतन समझ में आ जाएगा 2022 के चुनाव में बसपा को सिर्फ 1 सीट मिली।
बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट से बसपा प्रत्याशी उमाशंकर सिंह ने जीत दर्ज की।पिछले दिनों ही उमाशंकर सिंह का निधन हो गया. 2022 के चुनाव में बसपा को 12.88 फीसदी वोट मिले।वहीं, पांच साल और पहले जाएं तो 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा के खाते में 19 सीटें गई थीं।22.23 फीसदी वोट मिले थे. लोकसभा की बात करें तो 2024 के चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इस चुनाव में बसपा 79 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, एक भी चुनाव जीतने में कामयाब नहीं हो पाई।
बसपा अपना खोया अस्तिव जुटाने में जमीन पर उतर गई है। बसपा सुप्रीमो मायावती के भतीजे आकाश आनंद पिछले दिनों हाथरस की सादाबाद से चुनावी बिगुल बजा दिया है।बसपा एक बार फिर से बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुट गई है।मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को यूपी विधानसभा चुनाव से पहले आगे कर दिया है। बसपा ने चुनावी अभियान शुरू कर दी है।
कांग्रेस यूपी विधानसभा चुनाव 2027 चुनाव में दलित वोटरों को साधने के लिए सबसे पहले चुनाव प्रभारी बदल दिया।कांग्रेस ने यूपी का प्रभारी बदलकर दलित राजेंद्र पाल गौतम को मैदान में उतार दिया है।कांग्रेस ने राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाकर वेस्ट यूपी में चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी के असर को भी कम कर सियासी फायदा उठाने की कोशिश में है।
चंद्रशेखर आजाद वेस्ट यूपी के सहारनपुर से आते हैं। वह नगीना से सांसद हैं। वह जाटव समाज से आते हैं। दलित समाज में जाटव आबादी ज्यादा है। दलित वोटरों के सहारे ही नगीना सांसद चंद्रशेखर भी अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं। साथ ही चंद्रशेखर की नजर वेस्ट यूपी में दलित के बाद मुस्लिम वोटों पर भी है। वहीं, कांग्रेस की भी नजर दलित वोटरों के साथ मुस्लिम आबादी पर है।कांग्रेस सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद के सहारे मुस्लिम को साधने में जुटी है।
दलित वोटरों को साधने में सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि सत्ताधारी बीजेपी और सपा भी जुटी है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम बदलकर संत सिरोमणि रविदास के नाम पर कर दिया था। भदोही का नाम बदलकर संत रविदासनगर कर दिया था।इतना ही नहीं योगी सरकार ने डॉ. बीआर आंबेडकर मूर्ति विकास योजना को भी मंजूरी दे दी है।इसके अलावा हाल ही में योगी मंत्रिमंडल में शामिल 6 नए मंत्रियों में दो दलित चेहरा शामिल किया।
सपा ने दलित वोटरों को साधने के लिए चुनाव से पहले बड़ा ऐलान कर दिया है। 2027 चुनाव से पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सामान्य सीटों पर 14 दलित उम्मीदवारों को उतारने की घोषणा की है। यूपी में अनुसूचित जाति के लिए 84 सीटें और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 सीटें हैं।अब अखिलेश यादव द्वारा सामान्य की 14 सीटों पर दलित प्रत्याशी उतारने के ऐलान के बाद 100 सीटें आरक्षित वर्ग के लिए हो जाएंगी। देखना होगा कि सपा का यह दांव 2027 के विधानसभा चुनाव में कितना कारगर साबित होगा?

