पीएम मोदी के लोगों से सोने की खरीद टालने की अपील का असर,अब चैन से सोएंगे लोग

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष मई महीने में जब वे तेलंगाना के दौरे पर थे ,तब सिकंदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने देश के लोगों से कई अपीलें की थी जिसमें सबसे प्रमुख अपील देशवासियों से एक साल तक सोना ख़रीदने से बचने की अपील थी।

भारत ऐसे देश में जहां सोना परंपरा, बचत और पारिवारिक समारोहों से गहराई से जुड़ा हुआ है, तब पीएम मोदी की यह अपील काफी असहज लग रही थी।विपक्षी राजनीतिक दलों ने तब लोगों को अपने पक्ष में करने के लिए पीएम मोदी की जमकर आलोचना करना भी शुरू कर दिया था। लेकिन पीएम मोदी ने उनकी आलोचना का कोई जवाब नहीं दिया बल्कि अपनी तयशुदा रणनीति पर चलते रहे। और अब पीएम मोदी का यह रणनीति रंग लाता हुआ दिख रहा है। देश में सोने के दाम गिरे हैं और अब यूक्रेन रसिया युद्ध या ईरान अमेरिका और इजरायल युद्ध की आक्रामकता घटने से सोने के अंतरराष्ट्रीय मूल्य में भी कमी आई है, जिससे भारत सरकार जो सोना खरीद रही वह सीधे-सीधे राष्ट्रीय विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी कर रहा है क्योंकि सोने का अंश इसमें 16 से 17% तक है। वहीं भारत के लोगों के द्वारा सोने की खरीदारी में कमी लाने से भारत द्वारा भारत के लोगों के आभूषण के लिए खरीदने वाले सोने की आयात में कमी आने से हमारी मुद्रा भंडार से डॉलर भी इस मद में कम बाहर जा रहे हैं। उससे भी हमारा विदेशी मुद्रा भंडार एक तरह से बढ़ ही रहा है। यानी कुल मिलाकर देखें तो अब मोदी की भारत के लोगों से सोना ना खरीदने की अपील रंग लाने लगी है अब लोग घटे हुए भाव पर सोना भी खरीद कर उसका आभूषण पहन कर चैन की नींद सो सकते हैं।

दरअसल तब पीएम मोदी की इस अपील के पीछे एक बड़ी आर्थिक चिंता छिपी थी,वह थी ईरान युद्ध के कारण लगातार बढ़ता वैश्विक ऊर्जा संकट।इस संकट का बड़ा असर भारत पर भी पड़ रहा था।भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर लगातार दबाव बढ़ने लगा था और डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कमज़ोरी तेजी से बढ़ने लगी थी। भारत के प्रमुख राजनीतिक दल डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती ताकत को लेकर अक्षर पीएम मोदी पर तंज भी कसने लगे। पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किला के प्राचीर से अपने भाषण में इस बात का जिक्र भी किया था।

दरअसल यह सब मामला सप्लाई चेन का है।सप्लाई चेन पर लगातार संकट बना रहे तो हम कितने भी उपाय कर लें, मुश्किलें बढ़ती ही जाती हैं। इसलिए देश को सबसे पहले रखते हुए इस सप्लाई चैन की संकट से उबरना तब बहुत जरूरी था और उसके लिए देश में सोना और विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि करना जरूरी हो गया था, क्योंकि सप्लाई चैन के संकट के समय विभिन्न देशों से सप्लाई चैन दुरुस्त करने मैं सोना और डॉलर ही काम आता है। पूरी दुनिया अभी इन दो चीजों पर ही भरोसा करती है। हालांकि भारत समेत कई देश डॉलर के भरोसे भी अब नहीं रहना चाहती है ।ऐसे में सोने की महत्ता विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में और बढ़ जाती है।

भारत में सोना घरेलू बचत और खर्च का अहम हिस्सा है, इसलिए यह दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक है।इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट अहमदाबाद के इंडिया गोल्ड पॉलिसी सेंटर की प्रमुख प्रोफे़सर सुंदरावल्ली के अनुसार भारत में हर साल 600 से 700 टन सोना आयात होता है और निर्यात बहुत कम है, इसलिए यह सोना घरों में जमा हो गया है।
उनके अनुसार भारतीय घरों में बहुत सारा सोना है। घरों में मौजूद सोने को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन आमतौर पर इसे 25 हज़ार से 27 हज़ार टन माना जाता है।

भारत हर साल लगभग 700–800 टन सोने की खपत करता है, लेकिन घरेलू उत्पादन केवल 1–2 टन के आसपास ही है। यानी भारत अपनी जरूरत का 90 फ़ीसदी से अधिक सोना आयात करता है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, फ़रवरी 2026 तक भारत के पास करीब 880 टन आधिकारिक सोना था।इस मामले में भारत दुनिया में नौवें स्थान पर है।अमेरिका, जर्मनी, आईएमएफ, इटली, फ्रांस, रूस, चीन और स्विट्ज़रलैंड भारत से आगे हैं।

कई दूसरी चीज़ों के विपरीत, सोने का आयात बड़े स्तर पर औद्योगिक उत्पादन में सीधे योगदान नहीं देता है, इसके बावजूद, इसके लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा) और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है।
यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब कच्चे तेल की कीमतें ऊंची होती हैं, क्योंकि भारत अपनी लगभग 80 से 85 फ़ीसद तेल ज़रूरतों के लिए भी आयात पर निर्भर है। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई थी और प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम 75 डॉलर से बढ़कर 110 डॉलर तक पहुँच गए थे।

मध्य पूर्व के संघर्ष के कारण ऊर्जा और उर्वरक की लागत बढ़ने के बीच, नीति निर्माता ऐसे गैर-ज़रूरी आयातों को नियंत्रित करने पर ध्यान दे रहे हैं जो आयात बिल बढ़ाते हैं। भारत के कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी लगभग 9% है। आयात होने वाली चीज़ों में कच्चे तेल के बाद गोल्ड दूसरे स्थान पर है।
आर्थिक नज़रिये से देखें तो भारत के लिए सोना और कच्चे तेल में एक बड़ी समानता है, दोनों का अधिकांश हिस्सा आयात किया जाता है और भुगतान अमेरिकी डॉलर में करना होता है।

इसका मतलब यह है कि जब कच्चे तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ती हैं और सोने का आयात ऊंचा बना रहता है तो भारत को इस आयात का भुगतान करने के लिए बहुत ज़्यादा डॉलर की ज़रूरत पड़ती है।

इससे मुद्रा बाज़ार में डॉलर की माँग बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव पड़ता है। यही वजह है कि इस साल रुपया डॉलर के मुक़ाबले अब तक 5 फ़ीसदी तक टूट गया है और अपने सबसे निचले स्तर के करीब है।
अर्थशास्त्री गोल्ड को सामान्य उपभोक्ता वस्तु की तरह नहीं देखते, क्योंकि तेल यानी ईंधन जहां परिवहन, बिजली और औद्योगिक गतिविधियों के लिए ज़रूरी है, वहीं गोल्ड के इंपोर्ट को डिस्क्रेशनरी स्पेंडिंग (वैकल्पिक खर्च) या निवेश का विकल्प मानते हैं।

जब परिवार बड़ी मात्रा में सोना या ज्वैलरी ख़रीदते हैं तो गोल्ड के इंपोर्ट के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे चालू खाता घाटा यानी करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ जाता है। करंट अकाउंट डेफिसिट आयात और निर्यात के बीच अंतर को दिखाता है।

बढ़ता चालू खाता घाटा अक्सर रुपये को कमज़ोर करता है, क्योंकि देश जितनी विदेशी मुद्रा कमा रहा होता है, उससे ज्यादा खर्च कर रहा होता है।यही वजह है कि सरकारें अक्सर इन परिस्थितियों में सोने के आयात को लेकर सतर्क हो जाती हैं।

आर्थिक दबाव के दौर में भारत पहले भी अत्यधिक सोना आयात को हतोत्साहित करने के कदम उठा चुका है।अतीत में सरकारों ने सोने पर आयात शुल्क बढ़ाया है और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ़) जैसे विकल्पों को बढ़ावा दिया है। इन सभी कदमों का मक़सद विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करना और रुपये को स्थिर रखना है।
यूक्रेन और रूस के बीच का युद्ध तथा ईरान और अमेरिका तथा इजरायल के साथ हो रहे युद्ध की जब आक्रामकता घटी है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में थोड़ी कमी आई है तो भारत सरकार भी इस अवसर का फायदा उठाने में ड्यूटी हुई है और वह अंतरराष्ट्रीय बाजार से सोना खरीद कर अपने विदेशी मुद्रा भंडार को और ज्यादा समृद्ध करने में डटी हुई है ताकि भविष्य में अगर युद्ध की विभीषिका और बढ़ती है या किसी अन्य कारणों से सप्लाई चेन प्रभावित होता है तो भारत अपने दमदार समृद्ध विदेशी मुद्रा भंडार से अन्य विकल्पों का सहारा लेकर भारत के लोगों के लिए न सिर्फ दैनिक उपभोग के सामानों की कमी नहीं होने देगी,बल्कि अनाप – शनाप मूल्य वृद्धि भी नहीं होने देगी जिससे लोगों के बीच किसी प्रकार की अपरा तफरी उन हालातो में ना मचे।

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