बीरेंद्र कुमार झा
पटना में नीतीश कुमार के आह्वान पर आयोजित विपक्षी एकता की मीटिंग की खूब चर्चा हुई है। इस मीटिंग में आगे भी इस बात को जारी रखने पर सहमति बनी है और अब जुलाई में शिमला में अगले राउंड की मीटिंग होगी।शिमला की बैठक में गठबंधन के संयोजक, सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर चर्चा हो सकती है। डीएमके, कांग्रेस, शिवसेना ,एनसीपी,समाजवादी पार्टी और नेशनल कांफ्रेंस समेत 15 पार्टियां जिसमें आम आदमी पार्टी के तेवर को देखते हुए अगर छोड़ दिया जाए तो 14 की एकजुटता काफी चर्चा का विषय-वस्तु रहा है।इसे बीजेपी के लिए एक बड़ा खतरा भी माना जा रहा है। लेकिन इस विपक्षी एकता की गोलबंदी से चार ऐसे दल जो अपने राज्यों में अच्छा प्रभाव रखते हैं काफी दूरी बनाए हुए हैं।
ये 4 पार्टियां है उड़ीसा में नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल (BJD),उत्तर प्रदेश में मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (BSP)आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना मे केसीआर की भारत राष्ट्र समिति(BRS)। इन चार राजनीतिक दलों में से मायावती की बीएसपी को छोड़कर बंकी तीनों दल अपने-अपने राज्यों में बहुमत की सरकार चला रही है। ऐसे में इनकी गैर हाजरी ,विपक्ष की एकता के लिए चिंता की एक बड़ी बात है।इतना ही नहीं भले ही यह तटस्थ दिखते हैं ,लेकिन जरूरत पड़ने पर यह बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है ।इसकी बड़ी वजह यह है कि पहले भी कई अहम विधेयकों को पारित कराने में इन दलों ने सदन में बीजेपी का समर्थन किया है।
मायावती का दौर रहना उत्तर प्रदेश में विपक्ष के लिए घातक
भले ही मायावती इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में फ्रंटफुट पर नहीं है ,लेकिन वोट शेयर के हिसाब से अगर पिछले लोकसभा चुनाव की बात की जाए तो मायावती की पार्टी बहुजन समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में तब तीसरी सबसे बड़ी पार्टी रही थी। दलित वर्ग के बीच में मायावती का एक बड़ा जनाधार रहा है। यदि यह विपक्षी एकता से दूर रहती है और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन होता है तो बीजेपी से मुकाबला करना उनके लिए कठिन होगा। इसकी एक बड़ी वजह है कि यदि मायावती मुस्लिम और दलित उम्मीदवार बड़ी संख्या में उतार दे तो कई ऐसी सीटें हैं जहां मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा और यह स्थिति विपक्ष के बजाय बीजेपी के लिए ज्यादा मुफीद होगी।
तेलंगाना से उड़ीसा तक बीजेपी के लिए राहत की बात
तेलंगाना की बात करें तो वहां केसीआर की पार्टी ने 2019 की लोक सभा चुनाव में 17 में से 9 सीटें जीती थी, चार बीजेपी के हाथ आई थी और 3 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी। अब यदि कांग्रेस उसके साथ नहीं आती है तो फिर स्वतंत्र रूप से चुनाव के बाद केसीआर किसी भी पाले में जा सकते हैं। यही स्थिति आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और उड़ीसा में नवीन पटनायक की है। दोनों ही नेता अपने राज्यों में पूर्ण बहुमत की सरकार चलाते हैं और जरूरत पड़ने पर बीजेपी का साथ भी दे देते हैं। बीजेपी और उनके बीच एक अनकहा करार यह है कि वे अपने राज्यों में खुलकर सरकार चलाएं और केंद्र में बीजेपी से भी बनाकर रखें।

