अब लहसुन के छिलकों से बनेगी बिजली, भारतीय रिसर्चर्स का कमाल, जानें कितना बनेगा करंट

0
4

किसने सोचा था कि जिन लहसुन के छिलकों को अभी तक रसोई से कचरा समझकर कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है, वे अब बिजली बनाने का काम करेंगे। दरअसल भारतीय रिसर्चर्स ने ऐसा एक तरीका खोज निकाला है, जिसमें जैविक कचरा करंट पैदा कर सकता है। इस तकनीक की खासियत है कि जैविक कचरे से बिजली बनाने के लिए किसी रासायनिक सेल या भारी-भरकम बैटरी का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। भविष्य की यह तकनीक आने वाले समय में घरों से निकलने वाले कचरे या बायो-वेस्ट को काम में लिए जाने वाला संसाधन बना सकती है।

इस खास तकनीक को जयपुर स्थित मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के रिसर्चर मानस तिवारी और दीपक भारती ने विकसित किया है। इस तकनीक में ट्राइबोइलेक्ट्रिक इफेक्ट का इस्तेमाल किया जाता है।

इस तकनीक के तहत जब दो अलग-अलग चीजें आपस में रगड़ खाती हैं, तो उनमें इलेक्ट्रॉन का आदान-प्रदान होता है और चार्ज पैदा होता है। एक प्रयोग में इस तकनीक ने सफल तरीके से काम किया है।

टेस्टिंग में लहसुन के छिल्कों से दरवाजे पर लगने वाले एक सिक्योरिटी सेंसर को सफल तौर पर चलाकर भी देखा गया।

इस तकनीक को एक टेस्ट के तौर पर परखने के लिए लहसुन के पिसे हुए छिलकों को पॉजिटिव लेयर के तौर पर इस्तेमाल किया गया और एक प्लास्टिक की शीट को नेगेटिव लेयर के तौर पर यूज किया। टेक्निकल भाषा में यह ट्राइबोइलेक्ट्रिक नैनोजेनरेटर कहलाता है।

जब इन दो लेयर्स या सतहों के बीच घर्षण होता है, तो बिजली पैदा होती है। इस बिजली को एक सेल की तरह कई कामों में लिया जा सकता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार टेस्टिंग में पाया गया कि लहसुन के छिलकों की एक परत से लगभग 210 वोल्ट का झटका पैदा हो सकता है, जबकि दो परतों का इस्तेमाल हो तो 400 वोल्ट तक का करंट पैदा हो सकता है। हालांकि इसमें बहने वाला करंट बहुत सूक्ष्म होता है लेकिन छोटे-छोटे उपकरणों को चलाने के लिए काफी होता है।

इस टेस्टिंग की खास बात ये रही कि 6 महीने तक रखे रहने और 200 बार लगातार इस्तेमाल के बाद भी लहसुन के छिल्के बिजली बनाने में सक्षम रहते हैं।

इसकी मदद से घरों में इस्तेमाल होने वाले कई तरह के सेंसर लहसुन के छिलकों जैसे बायो वेस्ट से लंबे समय तक चलाए जा सकते हैं।

रिसर्चर्स ने लहसुन के छिलकों से पावर लेने वाले एक सेल्फ-पावर्ड सेंसर को दरवाजे और चौखट के बीच फिट कर टेस्ट भी किया। इस टेस्टिंग में दरवाजा खुलते ही दोनों सतहों के अलग होने पर पैदा हुई वोल्टेज स्पाइक से सेंसर बिना किसी बैटरी के भी काम कर सका।

इस प्रयोग के साथ भारतीय रिसर्चर्स ने भविष्य की इको-फ्रेंडली ऊर्जा का रास्ता खोल दिया है। यह तकनीक अपने आप में दो बड़ी समस्याओं को हल कर सकती है। जिसमें से पहली समस्या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना बिजली बनाने की है और दूसरी घरों में निकलने वाले बायो वेस्ट को निपटाने की।

हालांकि अभी इस तकनीक को काम में लिया जाने लायक बनाने के लिए एक लंबा सफर तय करना बाकी है। वैज्ञानिक अब इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि दो परतों के बाद बिजली का आउटपुट बढ़ना क्यों बंद हो गया, ताकि अन्य बायो-वेस्ट से भी बेहतर ऊर्जा उत्पादन की संभावनाएं तलाशी जा सकती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here