विपक्षी नेताओं ने 9 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन सौंपा और अब 12 अक्टूबर यानी सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की तरफ मार्च कर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से मिलने की योजना का ऐलान किया है। आखिर विपक्ष एसआईआर की लड़ाई को राष्ट्रपति और सीजेआई तक लेकर क्यों जा रहा है। इसके पीछे विपक्ष की क्या रणनीति है।
विपक्ष के एक नेता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि इससे एसआईआर की लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक बनेगी और हम पहले से ही कह रहे हैं कि इस सरकार में संविधान ही खतरे में है। दरअसल राष्ट्रपति देश की संवैधानिक प्रमुख हैं। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करती हैं। हालांकि यह औपचारिक है।
लेकिन विपक्ष के लिए राष्ट्रपति तक पहुंचने की राजनीतिक अहमियत यह भी है कि विपक्ष ने इसके जरिए एसआईआर और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से जुड़े अपने आरोपों को एक बड़े संवैधानिक मंच पर भी रखा। राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने उनसे कथित ‘वोट चोरी’ के सबूत मांगे हैं। हालांकि राष्ट्रपति भवन की ओर से इस बातचीत के बारे में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ। साथ ही सरकारी सूत्रों ने राहुल के बयान को गलत बताया और कहा कि राष्ट्रपति को विवाद में घसीटना दुर्भाग्यपूर्ण है।
राष्ट्रपति के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख करना विपक्ष की रणनीति का ही विस्तार माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए अनुच्छेद 32 के तहत याचिकाओं पर सुनवाई करने और जरूरी आदेश देने का अधिकार है। SIR को लेकर पहले से अदालतों में याचिकाएं भी दायर हुई हैं।
विपक्ष सीजेआई के सामने अपने बात रखकर यह संदेश देना चाहता है कि इस मसले पर वे हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है। संसद से सड़क तक और अदालत तक भी। विपक्ष इसके जरिए सरकार को घेरने की कोशिश में भी और ये नेरेटिव बनाने की कोशिश में है कि संविधान को खतरा है और इसलिए सुप्रीम अदालत से गुहार लगाई जा रही है। कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के दौरान भी संविधान खतरे में है का नारा दिया था और वे अपने हर प्रोटेस्ट में इसका जिक्र भी करते हैं।

