मेडिकल सेक्टर में नोबेल प्राइज 2026 का ऐलान हो चुका है। इस क्षेत्र में यह प्राइज एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीक को दिया जाने वाला है जिसने दिमाग को समझने का तरीका बदल दिया है। कार्ल डिसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को प्रकाश-संवेदनसशील आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स में उनके योगदान के लिए यह सम्मान दिया जाने वाला है। इस तकनीक की खासियत यह है कि वैज्ञानिक प्रकाश की मदद से खास तंत्रिका कोशिकाओं यानी न्यूरॉन्स को सक्रिय या निष्क्रिय कर सकते हैं।
यही वजह है कि इस रिसर्च को मिर्गी, पार्किंसन जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों को समझने और भविष्य में उनके ज्यादा सही इलाज की उम्मीद से जोड़कर देखा जा रहा है।इतना ही नहीं, आंखों की गंभीर बीमारी रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा के कारण खो रही रोशनी को वापस लाने के लिए भी इस तकनीक पर रिसर्च चल रही है।
ऑप्टोजेनेटिक्स अभी किसी बीमारी की सामान्य दवा या इलाज नहीं है, लेकिन इसका महत्व इसलिए बड़ा है क्योंकि यह वैज्ञानिकों को उन न्यूरल सर्किट्स को समझने का मौका देता है जो यादाश्त, भावनाओं, डर, लत और शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं।यही सर्किट कई न्यूरोलॉजिकल और मानसिक बीमारियों में प्रभावित होते हैं। इनमें पार्किंसन रोग और मिर्गी जैसी गंभीर बीमारियां भी शामिल हैं। रिसर्चर्स को उम्मीद है कि अलग-अलग न्यूरॉन्स और उनके सर्किट किस तरह बीमारी पैदा करते हैं,यह ज्यादा सटीक तरीके से समझकर भविष्य में इसके इलाज को विकसित करना आसान होगा।
इस तकनीक का एक महत्वपूर्ण मेडिकल इस्तेमाल आंखों से भी जुड़ा है। रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा एक गंभीर जेनिटीक आंखों की बीमारी है, जिसमें धीरे-धीरे रेटिना की प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाएं खराब होती जाती हैं और मरीज की नजर कम होने लगती है।ऑप्टोजेनेटिक्स के जरिए वैज्ञानिक ऐसी कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो सामान्य स्थिति में प्रकाश को महसूस नहीं कर पातीं। नोबेल कमेटी के अनुसार, क्लिनिकल मेडिसिन में इस तकनीक का इस्तेमाल दृष्टिबाधित लोगों की रोशनी लाने के इलाज में किया जा रहा है।

