2024 से पहले कांग्रेस को मायावती के हाथ की जरूरत क्यों, 3 राज्यों में हाथ और हाथी का समीकरण

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बीरेंद्र कुमार झा

पिछले दिनों पटना में 15 विपक्षी दलों की बैठक हुई। बीएसपी सुप्रीमो मायावती उससे दूर रही। उन्होंने पहलेl ही कहा था कि वह 2024 का चुनाव अपने दम पर लड़ेगी और किसी से गठबंधन नहीं करेगी। हालांकि वह 2024 के मद्देनजर बनते बिगड़ते और संभावित समीकरणों पर पैनी नजर गड़ाए हुए है।सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है की बीएसपी यूपी में कांग्रेस के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ सकती है। दोनों को एक दूसरे की सख्त जरूरत है।पिछली बार बीएसपी ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और 10 सीटें जीती थी।

मध्यप्रदेश में समीकरण

2024 से पहले इस साल के अंत तक होने वाले चुनावों खासकर मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों को भी एक दूसरे की सख्त जरूरत है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में 49.89 परसेंट वोट हासिल कर 230 सदस्यों वाली विधानसभा में 114 सीटों पर जीत दर्ज की थी, वहीं बीएसपी ने 5 परसेंट वोट हासिल कर दो सीटें जीती थी ।बीएसपी 2 सीटों पर बीजेपी के मुकाबले दूसरे नंबर पर रही थी और कम मार्जिन से चुनाव हारी थी। बीजेपी को इस चुनाव में 41.02% वोट मिले थे।लेकिन सीटों की संख्या कांग्रेस से पांच कम यानी 109 थी।

2020 के शुरुआत में ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों के पाला बदलने के बाद राज्य में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी थी। फिलहाल मध्यप्रदेश विधानसभा में बीजेपी के 127, कांग्रेस के 96,निर्दलीय चार बीएसपी के दो और एसपी के एक विधायक हैं। अब जब कांग्रेस फिर बीजेपी को हरा कर राज्य की सत्ता में वापसी चाह रही है तो उसे बीएसपी के साथ की जरूरत महसूस हो रही थी। अगर दो हजार अट्ठारह के ही चुनावी पैटर्न को आधार मानें तो दोनों दलों के मिल जाने के बाद कुल वोट परसेंट करीब 46 परसेंट हो जाता है जो सर्वाधिक होगा।

छत्तीसगढ़ में हाथ हाथी को सटाना भी नहीं चाहेगा कांग्रेस

छत्तीसगढ़ विधानसभा में कुल 90 सीटें हैं। 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने अपने दम पर 43 परसेंट वोट लाकर कुल 68 सीटों पर जीत दर्ज की थी ,जबकि लगातार तीन बार से सत्तारूढ़ रही बीजेपी को कुल 33 परसेंट वोट और 15 सीटें ही मिल पाई थी। राज्य में तीसरे नंबर पर जनता कांग्रेस छतीसगढ़ रही थी।इसने 1.6% वोट और 5 सीट मिली थी।इन चुनावों में भी दलितों की राजनीति करने वाली बीएसपी को 3.9 परसेंट वोट 2 सीटों पर जीत मिली थी।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस फीलगुड में है और उसे पूरा भरोसा है कि भूपेश बघेल के नेतृत्व में पार्टी फिर से चुनाव जीतेगी।कांग्रेस बीएसपी या किसी से भी गठबंधन नहीं करना चाह रही है। जबकि बीएसपी को कांग्रेस के साथ की जरूरत है, उसे पता है कि कांग्रेस ने साथ दिया तो हाथी 2 से ज्यादा घर पर कब्जा कर सकता है। हालांकि इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिख रही है।

राजस्थान में कांग्रेस से जली भूमि बैठी है बीएसपी

2018 में राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव हुए थे।200 सीटों वाली विधानसभा में तब कांग्रेस ने 99 सीटों पर जीत दर्ज की थी और बहुमत से 2 सीटें कम पाई थी। मायावती की पार्टी बीएसपी ने अपने 6 विधायकों का समर्थन कांग्रेस के गहलोत सरकार को दिया था।बाद में राजनीति की जादूगर कहे जाने वाले गहलोत ने बीएसपी के सभी 6 विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करवा लिया। इससे मायावती कांग्रेस से खार खाए बैठी है।

वैसे आंकड़ों की बात करें तो कांग्रेस को तब 39.30% वोट मिले थे जबकि बीजेपी को 38.7% वोट और 73 सीटें मिली थी। 73 निर्दलीयों ने भी चुनाव में जीत हासिल की थी।बीएसपी को 4 परसेंट वोट मिले थे।बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट परसेंट का अंतर 1 परसेंट से कम रहा था।राज्यों में हर 5 साल पर सत्ता परिवर्तन की रिवाज रही है।ऐसे में कांग्रेस को बड़ी जीत हासिल करने और सत्ता में वापसी के लिए मायावती के साथ की जरूरत हो सकती है।लेकिन इसकी की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिख रही है ।लेकिन 2024 के लिए अगर बीएसपी और कांग्रेस साथ आए तो मरुस्थल में भी दोस्ती के फूल खिला सकती है।

 

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