न्यूज़ डेस्क
उत्तरप्रदेश में बीजेपी बड़े स्तर पर उन सांसदों के बारे में रायसुमारी करा रही है जिनका परफॉर्मेंस काफी कमजोर है और जिन्होंने बीजेपी के महाजनसंपर्क अभियान में भी निष्क्रिय रहे हैं। जानकारी के मुताबिक पार्टी ने करीब दो दर्जन ऐसे सांसदों को चिन्हित किया है जिनकी स्थिति जनता के बीच कमजोर हुई है और जिन्होंने मोदी के 9 साल के प्रचार -प्रसार से दुरी बनकट रहे हैं। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक ले जाने के लिए बीजेपी ने एक महीने का महाजनसंपर्क अभियान चलाया था और यह अभियान 30 जून को ख़त्म होना था लेकिन कई नेताओं की उदासीनता की वजह से यह अभियान पूरा नहीं हो सका और इसे 18 जुलाई तक बढ़ा दिया गया। जिन नेताओं की उदासीनता बनी रही है उनको लेकर पार्टी के भीतर कई तरह की बाते की जा रही है। कहा जा रहा है कि अब इनकी टिकट भी काटी जा सकती है। ऐसे करीब दो दर्जन नेता है। इन नेताओं में कुछ तो मौजूदा समय में सांसद हैं तो कुछ हारे हुए नेता हैं। ऐसे सांसदों की जगह अब नए उम्मीदवार को बीजेपी तैयार कर रही है।
बीजेपी के सर्वे में ये बात सामने आई है कि महाजनसंपर्क अभियान में 25-30 फीसद सांसदों की लापरवाही की वजह से इसकी समय सीमा को बढ़ाना पड़ा है। जिसके बाद अब इन नेताओं की टिकट पर तलवार लटकने लगी है। सूत्रों की माने तो महाजनसंपर्क अभियान की देख रेख कर रहे राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल ने 30 जून को अपनी वर्चुअल मीटिंग में क़रीब दो दर्जन से ज़्यादा यूपी के सांसदों की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की थी। इसके बाद अभियान को 18 जुलाई तक बढ़ाया गया।
बीजेपी ने यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों को जीतने का लक्ष्य रखा है। सूत्रों की मानें तो इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये 2019 का चुनाव लड़ चुके 25 से 30 फ़ीसदी प्रत्याशियों को बदल दिया जाएगा। इसमें कई मौजूदा सांसद हैं तो कई हारी हुई सीटों पर प्रत्याशी रह चुके हैं। मोदी सरकार के नौ वर्ष पूरे होने पर चलाये जा रहे अभियान में बहुत सारे सांसदों की छवि और निष्क्रियता का पार्टी हाईकमान को पता चला है, जिसे लेकर यूपी भाजपा अध्यक्ष और महामंत्री संगठन को बताया जा चुका है।
मैनपुरी और रायबरेली ऐसी सीट है जहां बीजेपी 2014 और 2019 दोनों ही चुनावों में जीत हासिल नहीं कर पाई है। 80 की 80 सीटों को जीतने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतर रही पार्टी एक-एक सीट को जीतने के लिए सर्वे करा रही है। सर्वे में मौजूदा सांसदों की जनता में पकड़ के साथ छवि का आकलन भी किया जा रहा है। साथ ही सम्भावित नये प्रत्याशियों की भी रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
करीब दो दर्जन लोकसभा क्षेत्रों में अभियान के तहत हुई रैलियों में पाँच हजार लोग भी नहीं आए जबकि लक्ष्य कम से कम 10 हजार का रखा गया था। नए गठबंधन के सहयोगियों को सीटें दिये जाने की वजह से भी भाजपा के प्रत्याशियों के टिकट कटेंगे।
