आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।स्ट्रोक एक ऐसी गंभीर स्थिति है, जिसमें समय पर इलाज न मिलने पर व्यक्ति की जान भी जा सकती है या उसे स्थायी विकलांगता का सामना करना पड़ सकता है।यशोदा मेडिसिटी, इंदिरापुरम के न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ. गौरव बत्रा का कहना है कि शरीर में बनने वाला खून का थक्का अगर दिमाग तक पहुंच जाए, तो ये स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थिति का कारण बन सकता है।इसलिए थ्रोम्बोसिस और स्ट्रोक के बीच के कनेक्शन को समझना बहुत ही जरूरी है।
डॉक्टर का कहना है कि थ्रोम्बोसिस वह स्थिति है, जिसमें किसी ब्लड सेल्स के अंदर खून का थक्का बन जाता है।ये थक्का ब्लड के नॉर्मल फ्लो को बाधित कर देता है।जब ये थक्का दिमाग तक जाने वाली धमनियों में बनता है या वहां पहुंच जाता है, तो ब्रेन को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिल पाते।ऐसी स्थिति में इस्कीमिक स्ट्रोक हो सकता है, जो स्ट्रोक का सबसे आम प्रकार माना जाता है।
कई स्वास्थ्य समस्याएं और खराब लाइफस्टाइल थ्रोम्बोसिस का खतरा बढ़ा सकती हैं। इनमें हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी और हार्ट संबंधी बीमारियां, विशेष रूप से एट्रियल फिब्रिलेशन शामिल हैं। ये स्थितियां रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाकर थक्का बनने की संभावना बढ़ाती हैं।
डॉक्टर का कहना है कि स्ट्रोक के लक्षण अक्सर अचानक दिखाई देते हैं। इनमें शरीर के एक हिस्से में कमजोरी या सुन्नपन, बोलने में परेशानी या शब्द स्पष्ट न निकलना, देखने में दिक्कत, चक्कर आना और संतुलन बिगड़ना शामिल हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लेना बेहद जरूरी है, क्योंकि शुरुआती घंटों में इलाज मिलने से मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
थ्रोम्बोसिस और स्ट्रोक के रिस्क को कम करने के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना सबसे महत्वपूर्ण है। नियमित व्यायाम करें, संतुलित आहार लें, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखें, धूम्रपान से दूर रहें और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का नियमित सेवन करें। इसके अलावा, इमेजिंग टेस्ट, रक्त जांच और अन्य डायग्नोस्टिक जांचों की मदद से बीमारी का कारण पता लगाया जा सकता है।
अंत में डॉक्टर कहते हैं कि स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों को पहचानना और तुरंत कार्रवाई करना जीवन बचाने में अहम भूमिका निभाता है। थ्रोम्बोसिस और स्ट्रोक के बीच के संबंध को समझकर लोग न सिर्फ बीमारी के खतरे को कम कर सकते हैं, बल्कि समय रहते इलाज लेकर गंभीर जटिलताओं से भी बच सकते हैं।

