Islamic NATO Alliance: मुस्लिम देशों का नया सुरक्षा गठबंधन! तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी के बाद अब इस बड़े देश की होगी एंट्री

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Islamic NATO Alliance:मुस्लिम देशों के बीच एक नए सुरक्षा ढांचे की चर्चा तेज हो गई है। तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए रक्षा समझौते में अब मिस्र के शामिल होने की संभावना सामने आई है। तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान ने कहा है कि राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन इस सुरक्षा व्यवस्था को केवल तीन संस्थापक देशों तक सीमित रखने के पक्ष में नहीं हैं।

फिदान के मुताबिक भविष्य में अन्य क्षेत्रीय देशों को भी इस व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इस गठबंधन का लक्ष्य किसी एक देश, खासकर ईरान, के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं है।

तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी ने किया रक्षा समझौता

तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने शुक्रवार को मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को मुस्लिम देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा सहयोग की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

इस व्यवस्था की तुलना NATO के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से की जा रही है। NATO के Article 5 के तहत एक सदस्य पर हमला होने को पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। इसी तरह नए समझौते में भी किसी सदस्य देश पर बाहरी हमला होने की स्थिति में बाकी सदस्य सहयोग के स्वरूप और स्तर पर चर्चा करेंगे।

हालांकि, दोनों व्यवस्थाओं को पूरी तरह समान मानना उचित नहीं होगा। तुर्की के विदेश मंत्री ने भी इस समझौते को मौजूदा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संगठनों का विकल्प नहीं बताया है।

क्या ईरान है निशाने पर?

इस नए सुरक्षा समीकरण को लेकर सबसे बड़ा सवाल ईरान को लेकर उठ रहा है। क्षेत्र में ईरान और कुछ खाड़ी देशों के बीच तनाव के बीच यह समझौता सामने आया है।

लेकिन हकन फिदान ने इस आशंका को खारिज किया है। उनका कहना है कि गठबंधन का उद्देश्य ईरान या किसी विशेष देश को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सदस्य देशों की सुरक्षा के लिए आपसी सहयोग मजबूत करना है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी देश को पहले से दुश्मन नहीं माना जाएगा। किसी बाहरी देश को खतरा तभी माना जाएगा, जब वह गठबंधन के किसी सदस्य के खिलाफ हमला करे।

मिस्र की एंट्री से क्यों बढ़ सकती है इजरायल की चिंता?

अगर मिस्र इस सुरक्षा ढांचे में शामिल होता है तो पश्चिम एशिया की रणनीतिक तस्वीर पर इसका असर पड़ सकता है। इसकी एक बड़ी वजह मिस्र और इजरायल की साझा सीमा है।

दोनों देशों के बीच अतीत में कई बार सैन्य संघर्ष हो चुका है, हालांकि बाद में दोनों के बीच शांति समझौता भी हुआ। ऐसे में मिस्र का किसी नए क्षेत्रीय रक्षा गठबंधन का हिस्सा बनना इजरायल के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा सकता है।

गठबंधन में और देशों को जोड़ने की योजना

हकन फिदान के अनुसार राष्ट्रपति एर्दोगन की सोच इस गठबंधन को तीन देशों तक सीमित रखने की नहीं है। उनका विजन है कि जरूरत और सहमति के आधार पर दूसरे क्षेत्रीय देश भी इस सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनें।

मिस्र को लेकर उन्होंने संकेत दिया कि कुछ तकनीकी और व्यावहारिक मुद्दों के समाधान के बाद उसकी सदस्यता पर आगे बढ़ा जा सकता है।

इससे संकेत मिलता है कि यह व्यवस्था भविष्य में एक बड़े क्षेत्रीय सुरक्षा नेटवर्क का रूप ले सकती है।

सऊदी अरब में होगा मुख्यालय

इस रक्षा समझौते को अंतिम रूप देने में करीब 2 साल 8 महीने का समय लगा। समझौते के तहत इसका जनरल सेक्रेटेरिएट सऊदी अरब में स्थापित किया जाएगा।

इसके संचालन के लिए NATO जैसी व्यवस्था के तहत एक मंत्री स्तरीय समिति बनाए जाने की भी संभावना है। इससे सदस्य देशों के बीच सुरक्षा नीति और आपसी सैन्य सहयोग को संस्थागत रूप देने की कोशिश की जाएगी।

तुर्की के लिए क्यों अहम है यह गठबंधन?

तुर्की खुद NATO का सदस्य है और अमेरिका के बाद NATO में सबसे बड़ी सेनाओं में से एक रखता है। ऐसे में उसका पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ एक अलग क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा तैयार करना रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है।

फिदान ने संकेत दिया है कि नया गठबंधन NATO या किसी अन्य मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था को खत्म करने या उसकी जगह लेने के लिए नहीं बनाया गया है। इसका मुख्य जोर सदस्य देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने पर रहेगा।

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