पावरबैंक आज एक ऐसा गैजेट बन चुका है. जिसके बिना काम चला पाना कई बार मुश्किल हो जाता है। हालांकि साधारण लिथियम-आयन पावरबैंक के साथ समस्या रहती है कि खराबी आने पर वे ब्लास्ट हो सकते हैं या उनमें आग भी लग सकती है। हालांकि अब पावरबैंक से आगे की तकनीक आ चुकी है। इसे सॉलिड स्टेट पावरबैंक नाम दिया गया है, जिसे SolidSafe और Kuxia जैसी कंपनियों ने बाजार में उतार भी दिया है।
यह टेक्नोलॉजी पावरबैंक से डिवाइस चार्ज करना ज्यादा सुरक्षित बना सकती है। ऐसा दावा किया जाता है कि एक सॉलिड स्टेट पावर बैंक के बीच से चाकू भी आर-पार हो जाए, तो वह फटेगा नहीं। वहीं लिथियम-आयन पावरबैंक की स्थिति इससे ठीक उलट है।
सोलिड स्टेट पावरबैंक को हर कोई बेहतर और पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरियों से सुरक्षित बताता है। इसकी वजह है कि लिथियम-आयन बैटरियों में लिक्विड या जेल इलेक्ट्रोलाइट्स का इस्तेमाल होता है, जो गर्मी में आग पकड़ लेते हैं। वहीं सॉलिड स्टेट पावरबैंक ठोस पदार्थों जैसे कि सिरेमिक, सल्फाइड या पॉलिमर के इस्तेमाल से बनते हैं।
किसी भी आम पावरबैंक के मुकाबले एक सॉलिड स्टेट पावरबैंक के कई फायदे होते हैं। जैसे कि यह आग लगने या फटने के खतरे के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार इनके आर-पार एक चाकू के वार के बावजूद भी यह फटे नहीं। आग की जगह इनमें सिर्फ हल्का सा धुआं निकला।
इसके अलावा इन बैटरियों की लाइफ भी ज्यादा होती है। इनमें बैटरी के फूलने की समस्या नहीं आती और यह बिना खराब हुए सालों-साल चल सकती हैं।
इनकी एक खूबी है कि इनका बैकअप काफी अच्छा होता है। इनके एक छोटे साइज के पावरबैंक से भी लंबा बैकअप मिल सकता है।
सॉलिड-स्टेट पावरबैंक किसी भी आम लिथियम-आयन बैटरी वाले पावरबैंक से तेजी से चार्ज हो सकता है।
बेहतर लेकिन महंगा भी
सॉलिड-स्टेट पावरबैंक सुरक्षित होने के साथ-साथ जेब पर भारी भी पड़ते हैं। दरअसल नई तकनीक होने की वजह से इनके दाम फिलहाल ज्यादा हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार SolidSafe कंपनी का 5,000 mAh वाला वायरलेस पावरबैंक मॉडल लगभग 59.99 डॉलर यानी कि करीब 5,000 रुपये में मिल रहा है, जबकि इसका 10,000 mAh मॉडल 79.99 डॉलर का है।
वहीं एक नॉर्मल पावरबैंक इससे आधे दाम और दुगनी क्षमता के साथ मिल रहे हैं। ऐसे में फिलहाल यह उन लोगों की टेक्नोलॉजी है, जिन्हें सस्ता नहीं बल्कि सुरक्षित पावरबैंक चाहिए।
बता दें कि तमाम खूबियों के बाद भी सॉलिड स्टेट पावरबैंक ऐसी तकनीक नहीं है, जिसमें कोई कमी न हो। दरअसल ये पावरबैंक भले फटते न हों लेकिन इनमें डेंड्राइट्स एक बड़ी समस्या है। डेंड्राइट्स का मतलब है बैटरी के अंदर आने वाली छोटी-छोटी दरारें। इन बैटरियों को जब तेजी से चार्ज किया जाता है, तो यह दरारें बढ़ती हैं और इससे इलेक्ट्रोलाइट्स कमजोर पड़ते हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक इन्हें बनाने के लिए बेहतर सामग्रियों पर काम कर रहे।

