आज पश्चिम बंगाल में दूसरे और अंतिम चरण को लेकर मतदान चल रहा है। पश्चिम बंगाल में हुए प्रथम चरण के विधानसभा चुनाव में 93% का भारी मतदान हुआ था। आज दूसरे चरण के मतदान में भी मतदान का प्रतिशत 5 बजे शाम तक 90 प्रतिशत हो चुका था। आज के चुनाव में मतदान के पश्चात सभी उम्मीदवारों का भाग्य ईवीएम में बंद हो जाएगा। 4 मई को मतगणना के लिए जब इन ईवीएम को गिनती के लिए निकाला जाएगा तभी इन उम्मीदवारों का भाग्य का फैसला हो जाएगा। कोई इसमें जीतेगा तो कोई हारेगा।व्यक्तिगत उम्मीदवार की यह जीत हार ही यह तय करेगा की पश्चिम बंगाल में सत्ता की चाबी किसके पास होगी? क्या ममता दीदी इस चुनाव में बहुमत लाकर चौथी बार पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनकर कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के सर्वाधिक पांच बार मुख्यमंत्री बनने के रिकॉर्ड के करीब पहुंच जाऐंगी या बीजेपी इस विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर पहली बार पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाने में सफल होगी।
4 मई को पश्चिम बंगाल के साथ-साथ असम,केरल और तमिलनाडु के अलावा पुडुईचेरी केंद्र शासित प्रदेश का चुनाव परिणाम भी आयेगा। इनमें असम और पुडुचेरी में बीजेपी सत्ता में रह चुकी है। दक्षिण भारत के राज्य केरल की बात करें तो केरल विधानसभा चुनाव में अभी तक भारतीय जनता पार्टी अपना एक भी उम्मीदवार जीताने में सफल नहीं हो सकी है। इस बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यदि यहां कोई बड़ा करिश्मा भी करती है, तो ज्यादा से ज्यादा अपने कुछ उम्मीदवारों को चुनाव जितवाने में सफल हो सकती है,सत्ता प्राप्ति का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है। दक्षिण भारत के दूसरे प्रमुख राज्य तमिलनाडु की बात करें तो बीजेपी ने 2021 के विधानसभा चुनाव में यहां एृआईडीएमके के साथ गठबंधन में कुछ सीटें जरूरी जीत सकती है, लेकिन वर्तमान चुनाव में यह ऐसा कोई करिश्मा नहीं कर सकती है, जिसकी वजह से यह दक्षिण के इस राज्य में बीजेपी के मुख्यमंत्री वाली सरकार बनाने ले। ज्यादा से ज्यादा यह यहां एआईडीएमके के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का हिस्सा बन सकती है। ऐसे में बीजेपी वर्तमान विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा ताकत पश्चिम बंगाल में झोंक रही है, ताकि कम से कम एक नए प्रदेश में पहली बार सरकार बनाने में सफल हो जाए और जहां यह हाल के बरसों में तेजी से उभरते हुए प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा प्राप्त कर चुकी है। इससे यह पैन इंडिया पार्टी का स्वरूप प्राप्त कर लेगी। इसका बड़ा फायदा बीजेपी 2029 ईस्वी में होने वाले आमसभा चुनाव के दौरान भी चुनाव जीतने में उठा सकती है।
पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतना बीजेपी के रणनीतिकार पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी के लिए जितना महत्वपूर्ण है,उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह ममता बनर्जी के लिए है। पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतने पर पश्चिम बंगाल में यह सर्वाधिक समय तक शासन करने वाले ज्योति बसु का रिकॉर्ड तोड़कर अपना एक नया रिकॉर्ड तो बनाएगी साथ ही देश की राजनीति में भी एक बड़ा स्थान प्राप्त कर लेगी। किसी सर्वमान्य नेता के अभाव में कांग्रेस के राहुल गांधी को नाम मात्र का नेता मान कर चल रहा इंडिया एलायंस को ममता बनर्जी के रूप में 2029 के पूर्व में एक बड़ा नेता मिल जायेगा। तब बहुत संभव है कि ममता बनर्जी अपने जुझारूपण और पश्चिम बंगाल में लगातार सरकार चलाने की खासियत के कारण 2019 के आम चुनाव में देशवासियों के एक बड़े वर्ग का पसंद बन जाएं। ऐसा होने की स्थिति में इंडिया एयरलाइंस एनडीए का एक तगड़ा विकल्प के रूप में उभरकर पीएम मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन गठबंधन को राजनीतिक चुनौती दे सकता है बल्कि 2029 के चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को उखाड़ कर फेंक सकती है। वर्तमान चुनाव में अपने मतदाताओं से जीत दिलाने की बात कहते हुए ममता बनर्जी इस बात की घोषणा भी कर चुकी है कि केंद्र की सत्ता में पीएम मोदी विदाई का काउंटडाउन शुरू हो गया है और अब वह ज्यादा दिनों तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठ पाएंगे।
चुनाव परिणाम बीजेपी के पक्ष में जाएगा या टीएमसी के पक्ष में उसका सही -सही खुलासा तो 4 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन कई मानक ऐसे हैं जो अभी से ही हमें इस बात का इशारा करने लगते हैं कि 4 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद पश्चिम बंगाल की कुर्सी पर एक बार फिर से ममता बनर्जी ही बैठेगी या बीजेपी इस बार उसे धकिया कर बाहर कर अपने किसी नेता को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान करने में सफल हो जाएगी ।
बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत :- पश्चिम बंगाल के चुनाव में इस बार बंपर वोटिंग हुआ है। प्रथम चरण के चुनाव में 93% से कुछ ज्यादा मतदाताओं ने वोटिंग किया। कुचबिहार जैसे क्षेत्र में मतदान प्रतिशत से 97%भी कुछ ज्यादा रहा। दूसरे चरण में भी पश्चिम बंगाल में मतदान प्रतिशत भी इसी पैटर्न पर है। पश्चिम बंगाल में मतदान प्रतिशत अक्सर अच्छा खासा रहता है वर्ष 2011 से लेकर वर्ष 2021 तक के मतदान प्रतिशत पर एक नजर डालें ,तो यह प्रतिशतता 85% प्रतिशत से ज्यादा ही रही है। वर्ष 2026 के वर्तमान विधानसभा चुनाव 90 लाख से भी अधिक मतदाताओं के नाम एसआई आर की वजह से काटे गए हैं। इन नाम काटे गए मतदाताओं को वेटेज के रूप में जो लगभग 12% के आसपास आता है को पूर्व के मतदान प्रतिशत 85% में जोड़ें तो यह लगभग 94- 95 प्रतिशत के आसपास आ जाता है। ऐसे में जिस बंपर वोटिंग की बात की जा रही है और जिसे लेकर भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस पार्टी दोनों ही इस बात का डंका पीट रही है कि बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत उसकी जीत का द्योतक है, यह हकीकत नहीं है और इस आधार पर दोनों की जीत की संभावना 50- 50% है।
एस आई आर का मुद्दा:- एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन करने के बावजूद बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी जेडीयू और अन्य दलों वाली एनडीए को बड़ी सफलता मिली थी। ऐसे में बीजेपी पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी एसआईआर के बावजूद चुनाव जीतने का दावा कर रही है। लेकिन पश्चिम बंगाल के लिए एस आई आर एक बड़ा चुनावी मुद्दा है जो टीएमसी को जीत दिलाने में एक बड़ी भूमिका निभा सकती है। सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में एसआईआर के मुद्दे को उठाकर ममता बनर्जी ने इस मामले में लोगों का भरोसा जीतने में सफलता प्राप्त की है। खासकर इस एसआईआर के मुद्दे से ही उन्होंने मुसलमान के एक बड़े वर्ग को टीएमसी के प्रति और बीजेपी के विरुद्ध पहले से भी अधिक प्रतिबद्धघं कर दिया है, जिसका लाभ टीएमसी को मिलेगा और बीजेपी को इसका घाटा उठाना होगा।
निरंतरता :- वर्ष 2011 में जब ममता बनर्जी की टीएमसी कांग्रेस के साथ गठबंधन के रूप में पहली बार सत्ता में आई ,तब इस गठबंधन ने 227 सिटें जीती थी और इनको मिले वोटो का प्रतिशत 39% था। 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 211 सिटें जीती और इन्हें प्राप्त मतों का प्रतिशत 44.91 था ।वर्ष 2021 ईस्वी में हुए विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी ने 215 सीटें जीती और इनके पक्ष में हुए मतदान का प्रतिशत बढ़कर 48.02% था, और यह सब तब हुआ था जबकि बीजेपी पश्चिम बंगाल में एंटी इनकंबेंसी और भ्रष्टाचार के मुद्दे को पूरे जोर शोर से उठा रही थी । उनके सभी प्रमुख नेताओं ने जिसमें पीएम मोदी अमित शाह जेपी नड्डा उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदि ने बड़े पैमाने पर पश्चिम बंगाल में रैलियां की थी। निरंतरता का यह पैमाना ममता बनर्जी की टीएमसी को एक बड़ी जीत की तरफ इशारा करता है।
बीजेपी निरंतरता के इस पैमाने पर खरी नहीं उतरती है। वर्ष 2011 ईस्वी में इसका एक भी विधायक पश्चिम बंगाल में नहीं था और इसे मात्र 4% मतदाताओं ने ही मतदान किया था। वर्ष 2016 में यानी पीएम मोदी के आने के बावजूद पश्चिम बंगाल में बीजेपी को कोई बड़ी सफलता नहीं मिली और यहां इसके सिर्फ तीन विधायक जीत सके और मतदान की प्रतिशतता भी 10 % रही। हां 2021 ई के विधानसभा चुनाव में इसने एक बड़ी उछाल मारी थी और इसके 77 विधायक वर्ष 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में जितने में सफल रहे और इसे प्राप्त मतों का प्रतिशत भी बड़ा उछाल लेते हुए 37.97 प्रतिशत पर पहुंच गया। लेकिन बीजेपी का यह उपहार कांग्रेस और वाम दलों की कीमत पर था न कि उसने ममता बनर्जी के टीएमसी के प्रभाव क्षेत्र में कोई बड़ी सेंधमारी की थी। और यह सब तब हुआ जबकि इसने 2021 के चुनाव में सुवेंदु अधिकारी , मुकुल राय समेत कई बड़े टीएमसी के नेता को अपने पक्ष में मिला लिया था। हालांकि बाद में उनमें से मुकुल राय जैसे कई नेता वापस टीएमसी में लौट आए थे। इतना ही नहीं कांग्रेस और वाम दलों का मतदाता जिन्होंने उन पार्टी को छोड़ा था वह सब भी बीजेपी में नहीं गए थे ,बल्कि उनकी बड़ी संख्या ममता बनर्जी के टीएमसी के साथ भी चली गई थी। इस आधार पर भी 4 म मई को आने वाले पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम में टीएमसी सत्ता की तरफ जाती हुई दिखती है।
मुस्लिम मतदाता:- वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुसलमान की जनसंख्या 30% से कुछ ज्यादा है। वर्तमान समय में मुसलमान की संख्याओं का प्रतिशत कुछ और ही अधिक हो गया होगा क्योंकि हिंदुओं के प्रजनन तुलना में मुसलमान के प्रजनन दर कहीं ज्यादा है। लिहाजा मतदाताओं की संख्या भी ज्यादा हो गया होगा। इन मुस्लिम वर्ग पर टीएमसी की नेत्री ममता बनर्जी की जबरदस्त पकड़ और ऊपर से इस समय एसआईआर में नाम हटाए जाने को लेकर भी यह वर्ग वर्ग बीजेपी से पहले से भी ज्यादा खफा है। बिहार में हुए चुनाव को उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो पीएम मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को बंपर सफलता मिलने के बावजूद सीमांचल के क्षेत्र में जहां मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा थी वहां बीजेपी को बड़ा हार का सामना करना पड़ा।
इस पैमाने के आधार पर 4 मई को आने वाले चुनाव परिणाम में पीएम मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा की तुलना में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी जीत की ओर बढ़ती नजर आती है।
घोषणा पत्र:-बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में पीएम कल्याण योजना के अंतर्गत लोगों को मुफ्त राशन, पक्का मकान देने का वादा, आयुष्मान योजना, और लखपति दीदी , उज्जवला गैस योजना, पीएम किसान योजना और श्रमिक योजना के अंतर्गत वित्तीय लाभ देने जैसे कई कार्यक्रम लागू करने की बात कही है। ये योजनाएं मतदाताओं को बीजेपी के प्रति आकर्षित कर सकती है, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार पहले से लक्खी योजना के अंतर्गत सामान्य वर्ग की महिलाओं को ₹1000 और एससी-एसटी की महिलाओं को 1500 रुपए दे रही है, इसके अलावा कन्याश्री योजना के अंतर्गत छात्राओं को स्कॉलरशिप, रूपाश्री योजना के अंतर्गत बच्चियों की शादी के लिए ₹25000 की सहायता राशि, बांग्ला युवा साथी के अंतर्गत बेरोजगार युवकों को 1500 रुपया प्रतिमाह और स्वास्थ्य साथी के अंतर्गत पूरे परिवार के स्वास्थ्य के लिए चिकित्सा व्यवस्था जैसी कई योजनाएं चल रही है। बीजेपी की कल्याण योजनाएं एक वायदा है जबकि टीएमसी की ममता सरकार की योजना एक यथार्थ है। ऐसे में बिहार के उदाहरण को देखा जाए जहां महिलाओं के लिए एनडीए की सरकार में₹5000 बैंक लोन दिया था और महिलाओं ने विपक्षी राजनीतिक दल के इससे भी अधिक राशि देने के वायदे को दरकिनार कर दिया था और एनडीए के पक्ष में मतदान किया था। इसलिए इस लिहाज से भी ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले बीजेपी पर भारी पड़ती नजर आती है।
हिंदुत्व का मुद्दा: बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे पर पश्चिम बंगाल के मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर अपनी जीत तय मान रही है, वहीं टीएमसी की ममता सरकार ने हिंदू मतदाताओं को लुभाने के लिए दुर्गा पूजा के समय सभी पूजा पंडालून को आर्थिक मदद दी थी। इसके अलावा बीजेपी के हिंदू के मुद्दे पर ध्रुवीकरण को देखते हुए मुसलमान का ध्रुवीकरण टीएमसी के पक्ष में हुआ है। ऐसे में अगर ममता बनर्जी 2021 ई के चुनाव के अनुरूप हिंदुओं के वोटो को बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण को रोकने में सफल हो पाती है, तो बीजेपी को अपना मनसूबा पूरा करने में कठिनाई होगी ।

