क्या केरल और बंगाल में  इंडिया गठबंधन के साथ चुनाव लड़ पायेगी सीपीएम ?

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अखिलेश अखिल 

कहने को तो बीजेपी को पटखनी देने के लिए इंडिया गठबंधन की बड़ी तैयारी है लेकिन अब सवाल यह भी उठा दिख रहा है कि क्या इंडिया गठबंधन में ही सब कुछ ठीक ठाक है ?क्या बंगाल और केरल में यह गठबंधन काम करेगा > क्या टीएमसी बंगाल में सीपीएम को कोई सीट देने को तैयार है ? क्या केरल में कांग्रेस के साथ सीपीएम का गठबंधन संभव है ? और क्या सीपीएम अगर इन डॉन राज्यों में गठबंधन के साथ नहीं जाती है तब वह क्या करेगी ? और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि फिर इंडिया गठबंधन का क्या होगा / ऐसे बहुत से सवाल है जो सामने आ रहे हैं। इन सवालों के उत्तर भाई मिल भी नहीं रहें है और लगता है कभी मिलेंगे नहीं। क्योंकि सवाल में जी जवाब है और जवाब सामने आय गए तो सब कुछ बिखड़ सकता है।    
   सीएपीम की सबसे बड़ी समस्या  है कि बंगाल में वह अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़े। हालांकि पिछले चुनाव में उसे बंगाल से कोई भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी। लेकिन बंगाल में अभी भी सीपीएम का आधार बचा हुआ है। अगर इस बार भी पार्टी को करतब नहीं दिखा पाती है तो पार्टी का खत्म निश्चित है। पार्टी के अधिकतर लोग पहले से ही बीजेपी के साथ जा चुके हैं।  
   पार्टी की सबसे बड़ी इकाई पोलित ब्यूरो का कहना है कि बंगाल में पार्टी को मजबूती के साथ लड़ने की जरूरत है। लेकिन गठबंधन के तहत ममता बनर्जी सीपीएम को एक भी सीट देने को तैयार नहीं है। ममता ने साफ़ कर दिया है कि वह कुछ सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ सकती है। उस सीट पर वह खुद लाडे या किसी को दे इससे उसे कोई मतलब नहीं है लेकिन गठबंधन के तहत वह किसी और पार्टी को एक भी सीट देने को तैयार नहीं है। सीपीएम की परेशानी बढ़ी हुई है। येचुरी परेशान हैं। उन पर पार्टी का दवाब भी है।      
लेकिन मामला केवल बंगाल का ही तो नहीं है। कुछ यही हाल केरल का भी है। बता दें कि देश की एकमात्र राज्य केरल में लेफ्ट गठबंधन दलों की सरकार है, लेकिन यहां भी सीपीएम का कांग्रेस से खटपट है। सीपीएम केरल के एक नेता ने कहा कि केंद्रीय समिति की बैठक में हमने अपनी बात रख दी है। केरल को लेकर लेफ्ट दलों के नेताओं से बात करने के बाद ही कांग्रेस से सीट शेयरिंग पर बात शुरू की जाएगी।  सीपीएम सूत्रों ने बताया कि केरल इकाई ने केंद्रीय समिति से कहा कि अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन में पार्टी शामिल होती है, तो भविष्य में सीपीएम केरल से भी खत्म हो जाएगी।  केरल के नेताओं का कहना है कि यहां छोड़कर अन्य राज्यों में गठबंधन पर बातचीत हो। पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि लोकसभा में 5-7 सीट जीतने के लिए केरल जैसे महत्वपूर्ण राज्य को नहीं खोया जा सकता है।      
      बता दें कि केरल में कांग्रेस 10 साल से विपक्ष में है। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने एकतरफा जीत हासिल की थी। कांग्रेस गठबंधन ने 2019 में केरल की कुल 20 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 
              गौरतलब है कि एक वक्त देश की सियासत में सीपीएम मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका में होती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसका जनाधार सिकुड़ता गया। 2019 में सीपीएम को सिर्फ 3 सीटों पर जीत मिली। 2019 में सीपीएम तमिलनाडु की 2 और केरल की 1 सीट जितने में कामयाब हुई थी।  पार्टी को इस चुनाव में करीब 1.75 प्रतिशत वोट मिले। 2019 के चुनाव में करीब 20 सीटों पर सीपीएम दूसरे नंबर पर थी। पार्टी बंगाल में कई सीटों पर तृणमूल का खेल बिगाड़ने में भी कामयाब रही। 2014 में सीपीएम को देश की 9 लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी, जबकि पार्टी को 3.25 प्रतिशत वोट प्राप्त हुआ था। 2014 में सीपीएम ने सबसे अधिक केरल की 5 सीटों पर जीत हासिल की थी। 
                  सीपीएम भारत की एक राष्ट्रवादी पार्टी है, जिसका केरल, बंगाल, तमिलनाडु और त्रिपुरा में मजबूत जनाधार है। नीतीश कुमार ने जब विपक्षी एकता की कवायद शुरू की थी, तो सबसे पहले वे सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी से ही मिले थे। उस वक्त येचुरी ने विपक्षी मोर्चे को पहला और जरूरी टास्क बताया था। हालांकि, जैसे-जैसे इंडिया गठबंधन आकार लेते गया, वैसे-वैसे गठबंधन में सीपीएम की भागीदारी को लेकर सस्पेंस गहराता गया। कहा जा रहा है कि इंडिया गठबंधन में सीपीएम की भूमिका को लेकर अक्टूबर के अंत तक फाइनल फैसला हो सकता है। इंडिया गठबंधन ने अक्टूबर के अंत तक सीट बंटवारे विवाद को सुलझा लेने का फैसला किया है।    
 लेकिन इस गठबंधन में सबसे ज्यादा परेशानी सीपीएम की बढ़ी हुई है। अगर वह गठबंधन के साथ चुनाव लड़ती है तो उसे कोई भी सीट नहीं मिलती  दिख रही है और उसका फिर अस्तित्व ही खतम हो जाएगा। अगर अलग होकर चुनाव लड़ती है तो गठबंधन टूट सकता है।  इंडिया गठबंधन के सामने यही बड़ी चुनौती है।                      
राजनीति तभी तक साझे की चलती है जब तक मकसद पूरा होता रहता है। मकसद जैसे  साझेदारी अक्सर ख़त्म कर दी जाती है। भारत की राजनीति का यह बड़ा सच है। चुकी राजनीति का कोई चरित्र नहीं होता इसलिए राजनीति करने वाले भी चरित्रहीन ही होते हैं। उनका पूरा जीवन पाखंड में ही चलता है। झूठ इतना बोलते हैं जिसकी कल्पना भी आप नहीं कर सकते। नेता हर आदमी को सलाम करता है और पीछे गाली भी देता है।
नेता उसी की बात ज्यादा मानता है जो उसके काम के लायक हो और जो उसे लाभ पहुंचाए .लाभ का मतलब नकदी और वोट भी। नेताओं की यही दो कमजोरी है। जैसे ही ये सब बढ़ते हैं नेताओं की राजनीति चरम पर होती है। नकदी और वोट घटे तो नेताओं की नेतागिरी ख़त्म हो जाती है। यह राजनीति  विचित्र है। सीपीएम आगे क्या करेगी या फिर गठबंधन में आगे क्या होगा इस पर सबकी निगाहें टिकी  हुई है। 

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