बिहार में थके हारे सांसदों पर ही बाजी लगाने को बीजेपी मजबूर !

0
127



अखिलेश अखिल

बिहार में बीजेपी कितने सांसदों की टिकट को काट सकती है इसको लेकर कई तरह की खबरे चल रही है। कुछ ख़बरों में तो टिकट काटने वाले सांसदों की लम्बी सूचि भी जारी की गई है। कई चैनलों पर इसको लेकर है। चर्चा में सबके अपने अपने तर्क भी हैं। जो सूची मीडिया में तैर रही है उसके मुताबिक ,पूर्वी चम्पारण के सांसद और पार्टी के वरिष्ठ नेता राधा मोहन सिंह ,पटना साहिब के सांसद रवि शंकर प्रसाद ,बक्सर के सांसद अश्विनी चौबे ,आरा के सांसद और केंद्रीय मंत्री आर के सिंह ,शिवहर की सांसद रमा देवी ,बेगूसराय के सांसद और मंत्री गिरिराज सिंह के नाम टिकट काटने वालों में शामिल हैं। इसके अलावे भी कुछ और नाम है जो सूत्रों के हवाले से चलाये जा रहे हैं। हो सकता है कि कुछ और नामो पर भी बीजेपी विचार कर रही हो लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन सांसदों की जगह कौन चुनाव लड़ेगा ? बीजेपी की सबसे बड़ी परेशानी यही है। कहा जा रहा है कि जिन नामों पर बीजेपी टिकट देने को विचार कर रही है उनकी हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। ऊपर से विपक्षी खेल का सामना अगर नहीं किए गए तो बीजेपी की मुश्किलें और भी बढ़ सकती है।
बीजेपी के जानकार कहते हैं कि जिन सांसदों के टिकट काटने की बात की जा रही है उसके दो कारण हैं। एक तो उनकी उम्र ज्यादा हो गई है और दूसरी बात यह है कि इन सांसदों के क्रिया कलाप भी अब पहले जैसे नहीं है। कह सकते हैं कि अब इनकी उपलब्धियां कम हो गई है। सर्कार की नीतियों के साथ ये आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। लेकिन फिर भी बीजेपी के पास कोई विकल्प भी तो नहीं है। बिहार में बीजेपी के चुनावी चेहरे तो कई हो सकते हैं लेकिन विपक्ष का सामना कोई भी नया उम्मीदवार नहीं कर सकता। कुछ नए चेहरे बाजी मार भी सकते हैं लेकिन चैहरे इस बार धोखा खा सकते हैं। ऐसी हालत में मज़बूरी में ही सही बीजेपी उन्ही पुराने चेहरे पर बाजी लगा सकती है।
बीजेपी सूत्रों का कहना है कि अगर किसी की टिकट कटती है तो उसकी सीट पर उसकी पसंद से उम्मीदवार तय किया जाएगा। कई जगह नेताओं के बेटे या बेटियों को टिकट देने की चर्चा है। बक्सर के सांसद अश्विनी चौबे अपने बेटे शाश्वत के लिए टिकट चाहते हैं। उम्र या परफॉरमेंस के आधार पर उनकी टिकट कटती है तो उनके बेटे को टिकट मिल सकती है। इसी तरह बाकी सीटों पर भी भाजपा को एडजस्टमेंट करनी है।
ऐसी इसलिए नहीं होगा कि पार्टी को इन सांसदों के चेहरे बहुत पसंद हैं या इन्होंने बहुत अच्छा काम किया है। इसका कारण मजबूरी है। अगर नीतीश कुमार का भाजपा के साथ तालमेल बना रहता तब निश्चित रूप से इन सबकी टिकट कट जाती। फिर भाजपा जिसको चाहती उसको उम्मीदवार बनाती और वह नरेंद्र मोदी व नीतीश कुमार नाम पर जीत जाता। लेकिन अब नीतीश कुमार की पार्टी भाजपा के साथ नहीं है। वह 2014 की तरह अलग भी नहीं लड़ रही है, बल्कि राजद और कांग्रेस के साथ तालमेल करके लड़ रही है। इसलिए आमने सामने की लड़ाई में भाजपा एकाध सीटों को छोड़ कर ज्यादातर सीटों पर अपने किसी भी पुराने नेता की टिकट काटने की हिम्मत नहीं कर पाएगी।
बिहार भाजपा के सामने मुश्किल है कि उसके पास स्वतंत्र रूप से या अपने दम पर लड़ने वाले नेताओं की कमी है। विकल्प की कमी के कारण वह सांसदों की टिकट काटने में असमर्थ है। भाजपा के एक जानकार नेता का कहना है कि अगर कोई लहर होती तो किसी की टिकट काटने से फर्क नहीं पड़ता। लेकिन बिहार में कोई लहर नहीं है। राजद, जदयू, कांग्रेस और लेफ्ट के गठबंधन के मुकाबले भाजपा को अपनी छोटी गठबंधन सहयोगियों के साथ एक एक सीट पर मुश्किल लड़ाई लड़नी है। इसलिए वह पुराने, मंजे हुए और सक्षम नेताओं की टिकट नहीं काट सकती है। उसकी मजबूरी है कि वह अपने दम पर लड़ सकने वाले मजबूत नेताओं को टिकट दे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here