Homeदेशक्यों मनायी जाती है होली? जानिए क्या है ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताएं

क्यों मनायी जाती है होली? जानिए क्या है ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताएं

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न्यूज डेस्क
रंगो का त्यौहार होली पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। होली शब्द को सुनते ही हमारे मन में एक अलग ही भाव उत्पन्न हो है, यह भाव हर्ष और उल्लास और प्रेम का होता है। होली के रंगों को प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है। इसे प्रत्येक वर्ष वसंत ऋतु के समय फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। प्राकृतिक दृष्टि से इस दिन मौसम में बदलाव का होता है। इस दिन से बसंत ऋतु का आंरभ होता है, जिसे प्रेम और नवचेतना की ऋतु माना गया है। लेकिन क्या आपको पता है कि होली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है, इसके पीछे की पौराणिक मान्यता क्या है ,चलिए जानते हैं होली से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं एवं इससे जुड़ी प्रचलित प्रमुख कथाओं के बारे में।

क्यों मनाया जाता है होली का त्योहार?

भक्त प्रह्लाद की कथा

प्राचीन ग्रंथो के अनुसार, प्राचीन समय में हिरण्यकश्यप नाम से एक असुर था। उसकी एक दुष्ट बहन जिसका नाम होलिका था। होलिका ने ब्रम्हा देव की तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था, परन्तु वरदान प्राप्त होने के पश्चात् वह दूसरो पर अत्याचार करने लगी, लोगों को परेशान करने लगी। राजा हरिण्यकश्यप का एक बेटा था, जो भगवान विष्णु का परम भक्त था। उसका नाम प्रह्लाद था। भक्त प्रह्लाद के पिता हरिण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानते थे। वह विष्णु भगवान को स्वयं का शत्रु मानता था, इसलिए उसने अपने राज्य में भगवन विष्णु की पूजा करने पर रोक लगा दी थी। जो व्यक्ति भगवान विष्णु की पूजा करता उसे वह मार देता था। असुर हरिण्यकश्यप भगवान विष्णु के विरोधी थे, जबकि प्रह्लाद विष्णु भक्त थे। उसने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति करने से रोका, परन्तु वह नहीं माने, तो हरिण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने का योजना बनाने लगा की कैसे उसे मारा जाये। असुर हरिण्यकश्यप ने बहुत प्रयास किया भक्त प्रल्हाद को मरने का, परन्तु वह असफल रहा। हरिण्यकश्यप ने प्रह्लाद को पहाड़ो से गिरवाया, तलवार से कटवाने का प्रयास किया, समुद्र में डुबोने का प्रयास किया, परन्तु भक्त प्रल्हाद के भक्ति के कारण भगवान विष्णु उसे हमेशा बचा लेते थे। अंत में हरिण्यकश्यप ने हारकर अपनी बहन होलिका से मदद मांगी। होलिका को ब्रम्हा से आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका भी अपने भाई हरिण्यकश्यप की सहायता करने के लिए तैयार हो गई। आखिर वो दिन आ गया जब होलिका प्रह्लाद को जलाने वाली थी। इसके लिए लकड़ियों की चिता तैयार की गयी, अब होलिका प्रह्लाद को लेकर चिता में जा बैठ गयी। उसे भरोसा था कि उसे कुछ नहीं होगा, उलट प्रह्लाद जल कर भस्म हो जायेगा, परन्तु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल कर भस्म हो गई। बुराई पर अच्छाई की जीत और शक्ति पर भक्ति की विजय के रूप में होली का पर्व मनाया जाता है।

राधा-कृष्ण से जुड़ी कथा

मान्यताओं के मुताबिक, भगवान कृष्ण का रंग सांवला था और राधा रानी गोरी थीं। इस बात को लेकर अक्सर कान्हा अपनी माता यशोदा से शिकायत करते थे कि वह क्यों नहीं गोरे हैं। इसके बाद एक दिन यशोदा जी ने भगवान कृष्ण को कहा कि जो तुम्हारा रंग है उसी रंग को राधा के चेहरे पर भी लगा दो फिर तुम दोनों का रंग एक जैसा हो जाएगा। फिर क्या था कृष्ण अपनी मित्र मंडली ग्वालों के साथ राधा को रंगने के लिए उनके पास पहुंच गए। कृष्ण ने अपने मित्रों के साथ मिलकर राधा और उनकी सखियों को जमकर रंग लगाया। कहते हैं कि तब से ही रंग वाली होली की परंपरा शुरू हुई। आज भी मथुरा में भव्य और धूमधाम तरीके से होली खेली जाती है।

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