बीरेंद्र कुमार झा
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह पर उनकी अपनी ही पार्टी जेडीयू हमलावर है। प्रोफेशनल करियर में नैतिकता को लेकर आचार संहिता बनाने वाले हरिवंश की नैतिकता पर ही सवाल उठ रहे हैं। वजह है- पार्टी स्टैंड से हटकर नए संसद भवन के उद्घाटन में शामिल होना।
जेडीयू ने मांगा स्पष्टीकरण
नई संसद के उद्घाटन में हरिवंश के शामिल होने पर जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने कहा है कि हरिवंश को इस मामले में सफाई देनी चाहिए।ललन सिंह ने कहा कि लगता है हरिवंश ने अपनी नैतिकता को कूड़ेदान में फेंक दिया है।विवाद के बीच हरिवंश की जेडीयू की सदस्यता भी खतरे में आ गई है।
पत्रकारिता से करियर की शुरुआत करने वाले हरिवंश 2014 में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू में शामिल हो गए थे। हरिवंश उस वक्त स्थानीय अखबार प्रभात खबर के समूह संपादक भी थे।नीतीश कुमार के करीबी होने की वजह से ही जेडीयू ने हरिवंश को राज्यसभा भेजा था
हरिवंश ने बदला पाला
नई संसद उद्घाटन में हरिवंश की मौजूदगी के बाद सियासी गलियारों में अब इस बात की चर्चा है कि नीतीश कुमार के करीबी रहे हरिवंश ने क्या अब पाला बदल लिया है? अगर हां तो इसकी वजह क्या है?
नीतीश से बगावत की राह पर है हरिवंश
जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार के मुताबिक हरिवंश ने कुर्सी के लिए जमीर से समझौता कर लिया है। नई संसद के औचित्य पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सवाल उठाया, लेकिन हरिवंश उस उद्घाटन में शामिल हुए।
बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजित शर्मा ने कहा कि हरिवंश सिंह जेडीयू में रहने का दिखावा कर रहे हैं। उनका मन बीजेपी में है और वे बीजेपी में शामिल होना भी चाहते हैं।हरिवंश ने पार्टी के साथ गद्दारी की है।
हरिवंश पर उनकी पार्टी हमलावर है, तो दूसरी ओर बीजेपी उनका बचाव कर रही है ।इस पूरे मसले पर हरिवंश ने चुप्पी साध ली है। उद्घाटन के बाद उन्होंने एक ट्वीट भी किया, लेकिन इस विवाद का कोई जिक्र नहीं किया।
नीतीश-हरिवंश कितने दूर, कितने पास?
2019 में हरिवंश ने चंद्रशेखर को लेकर एक किताब लिखी थी। जुलाई 2019 में इसका विमोचन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों करवाया था।इस किताब में उन्होंने चंद्रशेखर को आखिरी सिद्धांतवादी व्यक्ति बताया गया था।
इस कार्यक्रम में पीएम मोदी के अलावा तत्कालीन उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद मंच पर मौजूद रहे। दिलचस्प बात है कि कार्यक्रम में नीतीश कुमार की गैरहाजिरी चर्चा का विषय बना रहा। उस वक्त तक नीतीश कुमार बीजेपी के साथ ही थे।
गठबंधन टूटने के बाद सार्वजनिक बयान नहीं दिया
2022 में नीतीश कुमार बीजेपी से गठबंधन तोड़कर आरजेडी के साथ चले गए।इसके बाद हरिवंश की भूमिका को लेकर सवाल उठा। प्रशांत किशोर कई मौकों पर हरिवंश के बहाने नीतीश पर निशाना साधा।
हरिवंश के समर्थन को लेकर ललन सिंह ने बयान भी दिया, लेकिन हरिवंश ने खुद गठबंधन टूटने या नीतीश के समर्थन को लेकर कोई बयान नहीं दिया। गठबंधन टूटने के बाद नीतीश के साथ मुलाकात की उनकी कोई तस्वीर भी सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई।
उप-सभापति का दायित्व
संसद में दो सदन राज्यसभा और लोकसभा है।लोकसभा के प्रमुख स्पीकर होते हैं, जबकि राज्यसभा में सर्वेसर्वा उपराष्ट्रपति होते हैं, जो पदानुक्रम में प्रधानमंत्री से बड़े होते हैं।ऐसे में उपराष्ट्रपति को बुलाने का दूसरा ही अर्थ निकलता
सांसद के नए भवन के उद्घाटन कार्यक्रम में लोकसभा से स्पीकर ओम बिरला को उद्घाटन में आमंत्रित किया गया था।
माना जाता है कि उपराष्ट्रपति को न बुलाकर राज्यसभा से उपसभापति को सरकार ने बुला लिया, जिससे दोनों सदन का चेहरा दिखे। उपसभापति का पद भी संवैधानिक होता है, इसलिए उद्घाटन में शामिल होना उनका दायित्व भी है।
बीजेपी इसे सोमनाथ चटर्जी केस से भी जोड़ रही है
2008 में सीपीएम ने मनमोहन सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था। सीपीएम ने उस वक्त स्पीकर चटर्जी को इस्तीफा देने के लिए कहा था, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया था।
लालू यादव और उनकी पार्टी से असहजता
प्रभात खबर के पूर्व संपादक ओम प्रकाश अश्क नीतीश से हरिवंश की दूरी के पीछे लालू यादव और उनकी पार्टी को मानते हैं।अश्क के मुताबिक हरिवंश ने अपने पत्रकारिता करियर में लालू सरकार के खिलाफ जमकर अभियान चलाया और चारा घोटाला जैसे बड़ा खुलासा किया।चारा घोटाला की वजह से ही लालू यादव को जेल जाना पड़ा और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी। अश्क कहते हैं- लालू को लेकर हरिवंश 2015 में भी सहज नहीं थे, लेकिन उस वक्त वे ज्यादा कुछ कर नहीं पाए थे।
हाल ही में जेडीयू अध्यक्ष ललन सिंह ने भी एक खुलासा किया था। ललन सिंह के मुताबिक 2017 में नीतीश कुमार और बीजेपी को साथ लाने में हरिवंश ने बड़ी भूमिका निभाई थी। हालांकि, हरिवंश ने इस मसले पर कोई टिप्पणी नहीं की।
नीतीश के पास देने के लिए कुछ नहीं
सियासी गलियारों में हरिवंश की महत्वाकांक्षा भी सवालों के घेरे में रहा है। उनके कई सहयोगी भी तमाम लेखों और सोशल मीडिया पर इसको लेकर सवाल उठा चुके हैं।
ओम प्रकाश अश्क भी नीतीश से हरिवंश की दूरी के पीछे महत्वाकांक्षा को वजह मानते हैं। अश्क के मुताबिक नीतीश कुमार के पास हरिवंश को देने के लिए कुछ नहीं है। जेडीयू की परंपरा रही है कि एक व्यक्ति को सिर्फ 2 बार राज्यसभा भेजती है, इसका उदाहरण अली अनवर और आरसीपी सिंह है।
अश्क आगे कहते हैं- हरिवंश भी यह बात बखूबी जानते होंगे, इसलिए नीतीश के बजाय नरेंद्र मोदी के पाले में जाने की कोशिश कर रहे होंगे।बीजेपी के पास अभी हरिवंश को देने के लिए राज्यपाल समेत कई पद हैं।
