संसद में गतिरोध : आखिर सत्ता पक्ष नियम 267 के बजाय 176 के तहत चर्चा क्यों चाहता है ?

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अखिलेश अखिल

तीन दिनों से संसद में मणिपुर मामले को लेकर गतिरोध जारी है। मजे की बात यह है कि सत्ता पक्ष भी चाहता है कि मणिपुर पर संसद में बहस हो और विपक्ष भी चाहता है कि चर्चा हो लेकिन चर्चा नहीं हो रही है। सत्ता पक्ष लगातार यह मैसेज दे रहा है कि सरकार चर्चा तो चाहती ै लेकिन विपक्ष भाग रहा है। देश की जनता भी भ्रम में है। बहुत से सरकार समर्थक लोग यह मन कर चल रहे हैं कि जब सरकार भी चर्चा चाहती है तब विपक्ष किस बात मांग पर अड़ा हुआ है। लेकिन सच के पीछे चालाकी छुपी हुई है। बीजेपी चाहती है कि संसद के भीतर नियम 176 के तहत चर्चा हो जबकि विपक्ष नियम 267 के तहत चर्चा चाहता है। और सरकार अभी इसे मान नहीं रही है।
             बता दें कि नियम 267 के तहत किसी भी विषय पर लंबी चर्चा होती है जबकि नियम 176 के तहत कुछ देर ही बात हो सकती है। नियम 267 के तहत होने वाली चर्चा तय वक्त से अधिक समय तक हो सकती है और इसके बाद इसपर वोटिंग भी हो सकती है। लेकिन बीजेपी को दोनों सदनों में ऐसी चर्चा स्वीकार नहीं है।दोनों सदनों के नियमों के मुताबिक राज्यसभा में चेयरमैन और लोकसभा में स्पीकर का अधिकार होता है कि वे चर्चा के किसी भी नोटिस को स्वीकार करें या खारिज कर दें। महत्वपूर्ण विषयों पर कम अवधि की भी चर्चा हो सकती है। पूर्व में भी अहम मुद्दों पर लंबी चर्चा की अनुमति यदा-कदा ही दी जाती रही है।
               इस बीच राज्यसभा चेयरमैन जगदीप धनखड़ ने सोमवार को राज्यसभा को बताया कि उन्हें मणिपुर पर नियम 176 के तहत चर्चा के लिए सांसदों के 11 नोटिस मिले हैं, और उन्होंने इन नोटिस को स्वीकार कर लिया है और नेता सदन पीयूष गोयल भी इस पर सहमत हैं। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें नियम 267 के तहत चर्चा कराने के लिए 27 नोटिस मिले हैं, जिन्हें या यो अस्वीकार कर दिया गया है या वे विचाराधीन हैं। धनखड़ ने जब नियम 176 के तहत चर्चा चाहने का नोटिस देने वाले सदस्यों और उनकी पार्टी के नाम तो पढ़े, लेकिन 267 के तहत चर्चा चाहने वाले सदस्यों के सिर्फ नाम ही पढ़े। इससे तृणमूल कांग्रेस के सदस्य डेरेक ओ ब्रायन ने आपत्ति जताई, और हंगामा होने के बाद सदन की कार्यवाही स्थगति कर दी गई।
                नियमों के इसी खेल पर पूर्व गृहमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता और संसद सदस्य पी चिदंबरम ने टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि सरकार और प्रधानमंत्री मणिपुर पर एक पूर्ण और सार्थक चर्चा से बचना चाहते हैं। प्रधानमंत्री संसद में मणिपुर पर कोई भी बयान नहीं देना चाहते, लेकिन संसद के बाहर दिए महज 36 सेकेंड के एक अनौपचारिक बयान में वह मणिपुर की बात करते हुए राजस्थान और छत्तीसगढ़ में महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन उत्पीड़न का जिक्र करना नहीं भूलते।
                      चिदंबरम ने एक टीवी इंटरव्यू में कई सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री ने इस विषय में कुछ कहा कि आखिर मणिपुर में असली समस्या क्या है? क्या उन्होंने तथ्यों और आंकड़ों को सामने रखा? क्या उन्होंने मणिपुर के हालात के लिए किसी मंत्री या अधिकारी को जिम्मेदार ठहराया? जब तक मणिपुर का वीडियो वायरल नहीं हुआ था, प्रधानमंत्री तो यही दिखावा करते रहे कि उन्हें मणिपुर के बारे में कुछ पता ही नहीं है। 79 दिनों के बाद जब वीडियो सामने आया तो उन्होंने एक अनौपचारिक सा बयान दे दिया, लेकिन संसद में दिए जाने वाले बयान से इसकी बराबरी नहीं की जा सकती।
                 कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसी बात को रेखांकित भी किया। उन्होंने कहा कि, “यह शर्म की बात है कि प्रधानमंत्री ऐसे समय में सदन के बाहर बयान दे रहे हैं, जब संसद का सत्र चल रहा है।” खड़गे ने कहा कि यह प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है कि वे मणिपुर हिंसा पर विस्तार से सदन को बताएं। उन्होंने कहा, “हम राज्यसभा के चेयरमैन और लोकसभा अध्यक्ष से अपील करते हैं कि वे सदन में मणिपुर पर प्रधानमंत्री का बयान कराएं।”

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