Homeदेशअजित पवार पर बीजेपी की मेहरबानी ,शिंदे का काउंटडाउन शुरू !

अजित पवार पर बीजेपी की मेहरबानी ,शिंदे का काउंटडाउन शुरू !

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अखिलेश अखिल 

थोड़ा पीछे चलिए और महाराष्ट्र की राजनीति पर मंथन कीजिए तो आपको यही दिखेगा कि महाराष्ट्र की राजनीति में बीजेपी की सबसे बड़ी दुश्मन पार्टी एनसीपी ही रही है। जब बीजेपी और शिवसेना साथ थी तब भी बीजेपी के निशाने पर एनसीपी ही ज्यादा रहती थी और अभी भी है। 2019 के बाद तो एनसीपी और बीजेपी में बीच खाई और भी बढ़ी जब एनसीपी की पहल पर उद्धव ठाकरे को शरद पवार ने अपने साथ लाया और महा अघाड़ी तैयार किया। इसके बाद बीजेपी के निशाने पर एनसीपी आ गई। लेकिन चुकी महाराष्ट्र में शरद पवार की अपन ठसक रही है और मराठा राजनीति के वे प्रतीक रहे हैं इसलिए एनसीपी के खिलाफ अब तक जाने से बीजेपी बचती रही है। लेकिन बीजेपी समय का इन्तजार कर रही थी। वह एनसीपी की कमजोर कड़ी को पढ़ रही थी और जैसे ही अजित पवार के रूप में उसे कमजोर कड़ी दिखाई दी ,उसने एनसीपी को झटके में ही तोड़ दिया। इससे पहले बीजेपी शिवसेना को तोड़ चुकी थी। उसे किसी भी पार्टी को तोड़ने का बड़ा अनुभव है। किसी भी सरकार को गिराने ,तोड़ने और फिर अपनी सरकार बनाने में महारथ हासिल है। बीजेपी के बढ़ते कदम की यह खास  विशेषता रही है।      
 अब बड़ा सवाल तो यह है कि जिस अजित पवार पर 70 हजार करोड़ के घोटाले का आरोप बीजेपी लगा रही थी उसी अजित पवार को वित्त मंत्रालय कैसे और क्यों दिया गया ? या तो बीजेपी अजित पवार पर झूठे आरोप लगा रही थी या फिर यह मान लिया जाए कि सारे भ्रष्टाचारियों को अपने खेमे में लाने का बीजेपी की यह नीति है। अजित पवार को केवल वित्त मंत्रालय ही नहीं दिया गया उनके लोगों के हवाले ही सहकारिता विभाग को भी सौप दिया गया। वही सहकारिता विभाग जिसके घोटाले में अजित पवार फंसे हुए हैं। इसके क्या मायने हैं ?ऐसे में सवाल यही है कि क्या बीजेपी अजित पवार के सामने दंडवत हो चुकी है या फिर वह अजित पवार पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है ?            
      दो जून को जिस समय यह तय नहीं था कि अजित पवार के  साथ कितने विधायक हैं उस समय उनको उप मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई और उनकी पसंद के आठ अन्य लोगों को मंत्री बनाया गया। बाद में पता चला कि वैध तरीके से एनसीपी तोड़ने के लिए जितने विधायक चाहिए उतने अजित पवार के पास नहीं हैं। फिर भी भाजपा नेतृत्व ने उनको और उनके साथ आए विधायकों को मनपसंद मंत्रालय दिया। भले 12 दिन का समय लगा और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की ऑथोरिटी की अनदेखी करनी पड़ी लेकिन अजित पवार को वित्त मंत्रालय दिया गया और उनकी  पार्टी के मंत्रियों को सहकारिता और कृषि जैसे विभाग दिए गए। अजित पवार के ऊपर सहकारिता में घोटाले के कितने आरोप लगे हैं!       
     एकनाथ शिंदे और उनकी पार्टी के नेता इस बात से बहुत आहत हैं कि उनके विरोध के बावजूद अजित पवार को वित्त मंत्रालय मिला। यह भी खबर है कि जल्दी ही मंत्रिमंडल में एक और विस्तार होगा, जिसमें अजित पवार खेमे के चार या पांच और विधायक मंत्री बन सकते हैं। अगले विस्तार में भी शिंदे सेना के किसी विधायक को मंत्री नहीं बनाए जाने की चर्चा है। तभी सवाल है कि पवार पर भाजपा की इतनी मेहरबानी का क्या कारण है? क्या सचमुच भाजपा शिंदे को किनारे करने वाली है? क्या सचमुच ऐसा हो सकता है कि अजित पवार आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री बन जाएं?
             अजित पवार को ज्यादा महत्व देने और शिंदे को किनारे करने के दो कारण बताए जा रहे हैं। पहला कारण तो यह है भाजपा एकनाथ शिंदे के वोट को लेकर भरोसे में नहीं है। भाजपा को लग रहा है कि शिंदे के साथ शिवसेना का वोट भाजपा के साथ नहीं आना है। जो हिंदूवादी वोट है वो भाजपा के नाम से ही उसके मिलेगा, जबकि अजित पवार के साथ मराठा वोट भाजपा से जुड़ सकता है। साथ ही उनके साथ आए छगन भुजबल की वजह से पिछड़ी जातियों का वोट भी भाजपा के साथ जुड़ सकता है। मराठा और ओबीसी वोट कंसोलिडेट करने के लिए भाजपा अभी अजित पवार की जरूरत महसूस कर रही है।
             दूसरा कारण भाजपा के कुछ नेताओं की शरद पवार के साथ निजी नाराजगी है। बताया जा रहा है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रदेश में उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस चाहते हैं कि शरद पवार को जवाब दिया जाए। ध्यान रहे पवार की वजह से 2019 में भाजपा का सरकार बनाने का खेल बिगड़ा था। पवार की वजह से उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने थे, जो लगातार अमित शाह पर निशाना साधते हैं।    
      लेकिन इस पुरे खेल में शिंदे कहाँ है ? उनकी राजनीति तो फंस गई ! बीजेपी ने उन्हें कही का नहीं छोड़ा। शिंदे लोग आज सोंच रहे होंगे कि कहाँ से फंस गए। वे तो अब उद्धव के पास ही जा सकते हैं या फिर अपने झूठे विचार को त्याग कर किसी और पार्टी के साथ चले जायेंगे। या फिर एक और तरीका है। जिसका इन्तजार बीजेपी कर रही है। एक दिन ऐसा भी आएगा जब शिंदे गुट बीजेपी में मर्ज कर जायेगा और महाराष्ट्र की राजनीति एक नयी दिशा में चल जाएगी। 

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