महाराष्ट्र में सरकार चाहे उद्धव की हो या देवेंद्र फडणवीस की,परमवीर सिंह को परवाह नहीं

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परमवीर सिंह हमेशा से विवादों में रहने वाले एक पुलिस पदाधिकारी रहे हैं।अपने मातहत पुलिस के माध्यम से गैंगस्टर की तरह अवैध उगाही करने के तक के आरोप इन पर लगे हैं। प्रसिद्ध औद्योगिक घराना अंबानी के घर एंटीलिया के पास कार में अपनी पुलिस के माध्यम से बम प्लांट करवाना, हीरेन सुख मांडवीय हत्या के मामले में भी इनका नाम आया। यह बात दिगर है कि एनआईए में दर्ज एफआईआर में परमवीर सिंह का सीधा-सीधा नाम नहीं था लेकिन जांच के क्रम में उनकी संलिप्तता सामने आने लगी थी। इन आरोपों में से कुछ आरोपों को लेकर उनका निलंबन तक हुआ था। और तब जेल जाने से बचने के लिए उनके देश छोड़कर विदेश भाग जाने तक की चर्चा हुई थी। लेकिन इस सब के पश्चात भी अंतिम रूप से कभी भी वह किसी भी आरोप में जेल नहीं गए। न सिर्फ इन्होंने खुद को जेल जाने से बचाया बल्कि खुद के निलंबन को भी निरस्त करवाया और पूरी नौकरी करते हुए सेवानिवृत हुए।

इन आरोपों मे से कुछ आरोप परमवीर सिंह पर तब लगे थे, जबकि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उद्धव ठाकरे विराजमान थे और कुछ आरोप तब लगे थे जबकि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देवेंद्र फडणवीस विराजमान थे या हैं। जब एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे तब भी देवेंद्र फडणवीस पर यह आरोप लगे हुए थे और जांच का कम चल रहा था।

लेकिन परमवीर सिंह के भ्रष्टाचार के धंधे पर रोक लगाने के मामले में किसी भी मुख्यमंत्री या सरकार का कोई वश नहीं चलता था। उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्रीत्व काल में जब जब एंटीलिया बम कांड के मामले पर लेकर जन दबाव बढ़ा,तब उन्होंने परमवीर सिंह को पद से हटा दिया था और इसके बाद जब परमवीर सिंह और उसके मातहत पुलिस के द्वारा एक गैंगस्टर गिरोह के तर्ज पर जबरन अवैध उगाही के मामले में बहुत ज्यादा तूल पकड़ना शुरू कर दिया तब कहीं जाकर उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्रीत्व वाली सरकार ने परमवीर सिंह का निलंबन स्वीकृत किया था। लेकिन इसके बावजूद परमवीर सिंह पर कोई बड़ी कार्रवाई उद्धव ठाकरे की मुख्यमंत्री कार्यकाल में नहीं हुआ। कहा जाता है कि अंदर ही अंदर उद्धव ठाकरे का परमवीर सिंह पर कृपा दृष्टि बनी हुई थी।

इसके बाद जब महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन का खेल हुआ, शिवसेना विभाजित हुई और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना की जगह पर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के सहयोग से बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना गठबंधन की सरकार बनी जिसमें एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने और देवेंद्र फडणवीस उपमुख्यमंत्री। एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री वाली सरकार ने परमवीर सिंह पर लगे आरोपों पर कार्यवाही करने की बात तो दूर, उल्टे परमवीर सिंह को इन सभी आरोपों से बरी कर दिया गया ,उनके निलंबन को समाप्त कर दिया और निलंबन अवधि को ऑन ड्यूटी मानकर उन्हें उपकृत किया।

अब बात देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्रीत्व काल में परमवीर सिंह पर लगे आरोपों पर कार्यवाही करने की बात की जाए तो देवेंद्र फडणवीस भी परमवीर सिंह पर मेहरबान ही दिखते हैं।8 जून 2020 ईस्वी में जब दिशा सालियान की हत्या का मामला दर्ज हुआ था, तब देवेंद्र फडणवीस भले ही मुख्यमंत्री नहीं थे, लेकिन जब बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर दिशा सालियान हत्या कांड मुंबई पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपा गया, तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देवेंद्र फडणवीस ही मौजूद थे और वह अभी भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। लेकिन इस समय जब परमवीर सिंह सीबीआई में दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान के द्वारा दर्ज कराए गए एफआईआर में नामित आरोपी बनाए गए हैं, तब भी देवेंद्र फडणवीस का कृपा दृष्टि परमवीर सिंह पर बनी हुई है।

कहने को तो सीबीआई केंद्रीय जांच एजेंसी है। लेकिन केंद्र की एनडीए गठबंधन सरकार की प्रमुख पार्टी भारतीय जनता पार्टी का एक मुख्यमंत्री होने के नाते और अमित शाह से उनकी निकटता को लेकर इस बात की उड़ती हुई खबर आते रहता है कि ये अपने प्रभाव का उपयोग कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से परमवीर सिंह को सीबीआई के मामले में राहत दिलाने की वकालत कर रहे हैं। इस उड़ती हुई खबर की सच्चाई पर संदेह हो सकता है यानि यह सच भी हो सकता है और गलत भी। लेकिन जिस तरह नामीत आरोपी होने के बावजूद मामला हस्तांतरण के 2 महीने पूरे होने की कगार पर आ जाने के बावजूद सीबीआई ने परमवीर सिंह पर कोई बड़ी कार्यवाही नहीं की है, उससे उड़ती हुई खबर उड़कर सच के निकट पहुंचती नजर आती है। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जब इस मामले की मुंबई पुलिस से छीनकर सीबीआई को सौंपने की मुंबई हाई कोर्ट के निर्देश को लेकर कहा कि मुंबई पुलिस सही दिशा में जांच कर रही थी और यह मामला सीबीआई को टेक्निकल ग्राउंड पर हस्तांतरित किया गया था, तो यह भी इस उड़ती हुई खबर को सच करता हुआ ही नजर आता है। इस तरह से देवेंद्र फडणवीस परमवीर सिंह को बचाते हुए नजर आते हैं, क्योंकि मुंबई पुलिस अपनी जांच में परमवीर सिंह को इस मामले में असंलिप्त मानकर चल रही थी। और फिर 29 अक्टूबर 2026 को देवेंद्र फडणवीस ने दिशा सालियान मामले में नामित आरोपी उद्धव ठाकरे के साथ मंच साझा कर भी इस उड़ती खबर को सच बताने का प्रयास किया है,क्योंकि वहां उन्होंने उद्धव ठाकरे के साथ बंद कमरे में एक गुप्त मीटिंग की थी और उसे मीटिंग की बातों को सार्वजनिक नहीं किया था।

मुख्य मंत्री सरीखे राजनेता मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह जिन पर कई प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं उन्हें यूं ही नहीं बचा रहे हैं, बल्कि परमवीर सिंह ने भी कई बार इन्हें अपने कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार और अन्य कई बड़े-बड़े आरोपों के लगने पर इनकी रक्षा की थी और अभी भी अपने पूर्व के रसूख और तिकड़मी बुद्धि से करने में लगे हुए हैं।

बड़े राजनेताओं के ऊपर लगे भ्रष्टाचार से उन्हें बचाने में परमवीर सिंह के योगदान से जुड़ी एक घटना अजीत पवार से जुड़ी हुई है जो महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री पूर्व और सिंचाई मंत्री थे। सिंचाई मंत्री के रूप में अजीत पवार पर 72000 करोड रुपए के घोटाला का आरोप लगा था। सिंचाई मंत्री के रूप में अजीत पवार के द्वारा किए गए इस घोटाले को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तक अपने भाषणों में उठाकर उन्हें जेल भेजने की बात करते थे, देवेंद्र फडणवीस चक्की पीसिंग चक्की पीसिंग जैसे जुमले का प्रयोग करते थे। इस चुनाव में बीजेपी और शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिला था। लेकिन सरकार बनाने के दौरान उद्धव ठाकरे द्वारा यह कहते हुए मुख्यमंत्री बनने के लिए अड़ जाने पर कि अमित शाह ने चुनाव से पूर्व चुनाव के उपरांत गठबंधन को जीत मिलने पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की बात बंद कमरे में कही थी, बीजेपी शिवसेना गठबंधन सरकार नहीं बन पाई थी। तब देवेंद्र फडणवीस ने उस अजीत पवार के साथ ही आनन – फानन में सुबह 6:00 बजे ही राज्यपाल को जगा कर सरकार बना ली जिसके मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बने थे और अजीत पवार उपमुख्यमंत्री बने थे। इस समय अजीत पवार के चाचा और शिवसेना प्रमुख शरद पवार ने भी अजीत पवार के घोटाले को लेकर तंज कसा था। हालांकि यह सरकार सिर्फ 80 घंटे तक ही चली और फिर बाद में उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री में महायुति गठबंधन की सरकार बनी।

उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्रीत्व वाली इस सरकार के समय में परमवीर सिंह महाराष्ट्र के एंटी करप्शन ब्यूरो के डायरेक्टर जनरल थे। तब इन्होंने अजीत पवार को उनके ऊपर लगे 72000 करोड़ की सिंचाई घोटाले के मामले में इन्हें क्लीन चिट देकर उपकृत किया।

परमबीर सिंह ने महाराष्ट्र एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) के महानिदेशक के पद पर रहते हुए दिसंबर 2019 में बॉम्बे हाई कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया था। इस हलफनामे में उन्होंने ₹72,000 करोड़ के विदर्भ सिंचाई घोटाले में अजित पवार को क्लीन चिट दी थी।

परमबीर सिंह के नेतृत्व वाली ACB ने अदालत को बताया कि सिंचाई परियोजनाओं में हुई कथित अनियमितताओं और टेंडर आवंटन में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री और विदर्भ सिंचाई विकास निगम (VIDC) के अध्यक्ष रहे अजित पवार को कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
इस हलफनामे में सीधे तौर पर अजित पवार की भूमिका को नकारा गया था, जिससे उनके साथ-साथ VIDC और सिंचाई विभाग से जुड़े कई तत्कालीन विभागीय अधिकारियों और क्षेत्रीय स्तर के उन नेताओं को भी राहत मिली जो इस पूरी प्रक्रिया और टेंडर आवंटन का हिस्सा थे।

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