इंतजार कीजिए ! कमंडल की राजनीति को मंडल से नापेंगे नीतीश कुमार

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अखिलेश अखिल
देश के भीतर राहुल गांधी की सजा और फिर रद्द हुई उनकी सांसदी पर विपक्ष का कोहराम जारी है ।अडानी मसले पर जेपीसी की जांच को लेकर भी विपक्ष एक साथ सरकार पर हमलावर है ।ईडी,सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों का मसला भी अदालत पहुंचा हुआ है । हेट स्पीच मामले में भी सुप्रीम कोर्ट सरकार पर तल्ख टिप्पणी करते हुए सुनवाई कर रहा है । उधर कर्नाटक में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है ।आप वाले केजरीवाल साहब मोदी सरकार के खिलाफ देश भर में पोस्टरबाजी कर रहे हैं ।कह सकते हैं कि देश ,संविधान और लोकतंत्र के नाम पर बहुत कुछ होता दिख रहा है ।लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अभी मैं हैं ।आखिर क्यों?

लंबे समय के बाद उन्होंने मीडिया का सामना किया और यही कहा कि चुकी राहुल का मसला कोर्ट पहुंच गया है इसलिए इस पर कुछ नही कहूंगा ।दूसरे सवाल में उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता के लिए कांग्रेस को आगे आना है और हम अभी भी इंतजार कर रहे हैं ।तीसरी बात उन्होंने यह कही कि केंद्र वाले कोई काम तो करते नही ।केवल प्रचार करते हैं ।

लेकिन नीतीश की कहानी यह सब कहने से ही खत्म नहीं हो जाती । दरअसल उन्हे भी कुछ खेल का इंतजार है ।जून महीने के बाद जातिगत जनगणना के परिणाम सामने आने लगेंगे तब नीतीश की राजनीति परवान चढ़ेगी ।नीतीश जानते है कि यह ऐसा खेल होगा जिसमे बीजेपी की राजनीति सिमट जाएगी ।कमंडल पर मंडल भरी पड़ेगा ।

वैसे तो बिहार सरकार की ओर से जाति आधारित जनगणना के एलान के बाद से ही भाजपा बैकफुट पर चली गई थी लेकिन अब जब उसके परिणाम सामने आने वाले है बीजेपी की कमंडल वाली राजनीति भोथरी होती जा रही है।

बता दें कि बिहार सरकार ने राज्य में जातीय जनगणना कराने का फैसला लिया है और उसे आगे भी बढ़ा रही है ।पहले सर्वदलीय बैठक और फिर कैबिनेट की मीटिंग में सबकुछ तय करने के बाद यह ऐलान कर दिया गया है कि बिहार, कर्नाटक मॉडल की तर्ज पर सूबे में जातीय गणना को अंजाम देगा। इस महाअभियान पर सरकारी खजाने से 500 करोड़ खर्च किये जायेंगे जो 9 महीने के भीतर सूबे की 14 करोड़ की आबादी की जाति, उपजाति, धर्म और संप्रदाय के साथ ही उसकी आर्थिक सामाजिक स्थिति का भी आकलन करेगा। यह काम अब तेजी से आगे बढ़ रहा है। जैसे जैसे जातिगत जनगणना के काम आगे बढ़ रहे है नीतीश कुमार की बांछे खिल रही है और बीजेपी की धड़कन तेज हो रही है ।बीजेपी को लगने लगा है कि देश के अन्य भागों में तो धार्मिक खेल के आधार पर वह लोगो को सोने कब्जे में कर लिया लेकिन बिहार में धर्म बिकता नही है । हां जातियों की राजनीति की फसल का लाभ बीजेपी को जरूर मिलता रहा ।लेकिन अब क्या होगा जब मंडल का यह तीसरा रूप सामने आएगा ?

बिहार में सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व में जैसे ही सर्वदलीय बैठक के बाद कैबिनेट की मंजूरी का ऐलान हुआ, देश के अन्य इलाकों के भी कान खड़े हो गए। बिहार का यह मैसेज देश के कोने-कोने में पहुंचा और जाति की राजनीति करने वाली पार्टियां और खासकर मंडल राजनीति के पैरोकारों ने बैठकें शुरू कर दी। बिहार से निकली यह चिंगारी उत्तर प्रदेश पहुंची, मध्यप्रदेश पहुंची और दक्षिण के राज्यों में भी इसके असर दिखने लगे। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के साथ ही गुजरात और हिमाचल में भी इस पर बहस शुरू हो गई है। खासकर हिन्दी पट्टी के राज्यों में जिस तरह से जातीय समीकरण के जरिए चुनावी खेल होते हैं अब बिहार ने सबको जगा दिया है। बिहार ने मंडल की राजनीति को मजबूत करने का बड़ा सन्देश दिया है साथ ही यह भी जताया है कि अगर जाति की गणना हो जाती है तो इससे साफ़ हो जाएगा कि किस जाति-उपजाति की कितनी संख्या है और आरक्षण में कितनी भागीदारी। अगर आरक्षण पाने वाली पिछड़ी जातियों की संख्या अधिक होगी तो जाहिर है आरक्षण का दायरा जो अभी 50 फीसदी तक है उसे आगे बढ़ाने की मांग उठेगी। अभी मानकर चला गया है कि देश में पिछड़ी जातियों की संख्या करीब 52 फीसदी है और उसी के मुताबिक उसे 27 फीसदी आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है जा रहा है। हालांकि मंडल की राजनीति करने वालों की समझ है कि पिछड़ों की आबादी 52 फीसदी से ज्यादा है। पिछड़ों की राजनीति करने वाली तमाम क्षेत्रीय पार्टियां इसी वजह से जातीय गणना की मांग करती रही है ताकि कुल आबादी में पिछड़ों की आबादी साफ़ हो जाने के बाद आरक्षण का नया रूप तैयार किया जा सके। भाजपा की यही परेशानी है। वह नहीं चाहती कि देश में आरक्षण को लेकर कोई नया बखेड़ा हो जाए और उसकी धार्मिक राजनीति कमज़ोर पड़ जाए।

आने वाले समय में इस खेल का राजनीति पर क्या असर होगा इसे देखना होगा, लेकिन एक बात तो तय है कि बीजेपी ने अगर राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित गणना को आगे नहीं बढ़ाया तो बीजेपी की राजनीति कुंद हो सकती है। गैर बीजेपी पार्टियां इस जाति आधारित गणना को मंडल राजनीति का तीसरा अवतार मानती है और उसे लगने लगा है कि अगर इसमें सफलता मिल जाती है तो बीजेपी की हिंदूवादी राजनीति को ध्वस्त किया जा सकता है। बीजेपी ने दबाव में ही सही लेकिन बिहार में जातिगत गणना पर सहमति तो दे दी है लेकिन अन्य राज्यों में भी यह बवंडर उठता है तो फिर उसे संभालना कठिन हो सकता है। नीतीश कुमार के इस दांव ने बीजेपी को फंसा दिया है। अगर केंद्र जातिगत जनगणना का विरोध करती है तो यह मैसेज जाएगा कि बीजेपी पिछड़ा विरोधी है और अगर बीजेपी इसका समर्थन करती है तो न सिर्फ उसकी धार्मिक राजनीति जमींदोज होगी बल्कि पार्टी के भीतर भी पिछड़ों की आवाज उठेगी। पार्टी कमजोर होगी और टूट की सम्भावना भी बढ़ेगी। बीजेपी शासित राज्य मध्यप्रदेश में भी जातिगत जनगणना की मांग हो रही है और पिछले कई महीनों से वहां आंदोलन भी चल रहा है। जारी ……

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