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मणिपुर की आवाज ,उन्हें चुनाव नहीं शांति चाहिए !

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न्यूज़ डेस्क
 हिंसा में झुलस रहगे मणिपुर के लोगों को चुनाव नहीं शांति चाहिए। इम्फाल के राहत शिविर में रह रहे लोगों का कहना है कि जातीय हिंसा से जूझते मणिपुर में इस बार चुनाव को लेकर कोई उत्साह नहीं है. लोग कहते हैं कि उन्हें चुनाव नहीं, शांति चाहिए “हम बीते 11 महीनों से अपने ही घर में बेगाने हो गए हैं। वोट डालने से हमारी समस्या हल नहीं होगी. सरकार ने हमारे लिए कुछ भी नहीं किया है। केंद्र ने जब इतने दिनों तक राज्य के लोगों के बारे में नहीं सोचा तो इस समय चुनाव भी नहीं कराना चाहिए था। हमें चुनाव नहीं बल्कि शांति और सुरक्षा की जरूरत है।”

मणिपुर में कुकी और मैतई समुदायों के बीच भड़की जातीय हिंसा को लगभग एक साल हो गया है। इस हिंसा में करीब 200 लोगों ने जान गंवाई और 50 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए।  जातीय हिंसा ने मणिपुर की तस्वीर ही बदल दी। इसी माहौल में राज्य की दो लोकसभा सीटों, इनर मणिपुर और आउटर मणिपुर के लिए 19 और 26 अप्रैल को मतदान होना है। आंतरिक मणिपुर और बाहरी मणिपुर के कुछ इलाकों में पहले चरण में मतदान होगा जबकि बाहरी मणिपुर के बाकी इलाकों में 26 अप्रैल को मतदान होगा। 

बीते साल मई से ही जातीय हिंसा की आग में झुलस रहे मणिपुर में आम लोग फिलहाल चुनाव को लेकर उत्साहित नहीं दिखते। दिल्ली स्थित मैतेई संगठन दिल्ली मैतेई समन्वय समिति (डीएमसीसी) ने मुख्य चुनाव आयुक्त और मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेज कर मणिपुर में लोकसभा चुनाव स्थगित करने की मांग की है। मणिपुरी मुस्लिम ऑनलाइन फोरम के अध्यक्ष रईस अहमद भी कहते हैं कि राज्य में हिंसा खत्म होने के बाद ही चुनाव कराया जाना चाहिए था।  राज्य की दोनों सीटों पर करीब 1.5 लाख मुस्लिम वोटर हैं। दोनों समुदायों के बीच सुलह कराने में मुस्लिम समुदाय ने अहम भूमिका निभायी थी। 

मणिपुर में चुनाव को लेकर विपक्षी खेमे में भी डर का माहौल है। बीते सप्ताह कांग्रेस की एक चुनावी सभा में कुछ हथियारबंद लोगों ने फायरिंग शुरू कर दी थी। उसमें तीन लोग घायल हो गए थे. उसके बाद पार्टी ने केंद्रीय चुनाव आयोग से घाटी में सुरक्षा मजबूत करने की मांग की।  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मेघाचंद्र कहते हैं कि मणिपुर में इन हालात में शांति से चुनाव हो पाना मुश्किल है. राज्य में कानून व व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह ढह चुकी है। 

लंबे समय से जारी इस हिंसक संघर्ष के कारण राज्य के तमाम इलाके संवेदनशील की श्रेणी में हैं।  करीब पांच महीनों की शांति के बाद नए सिरे से शुरू होने वाली हिंसा ने लोगों के मन में आतंक पैदा कर दिया है। शायद यही उनकी चुप्पी की वजह है। लोग चुनाव के बारे में बात ही नहीं करना चाहते।  ऐसे में मणिपुर में इस बार भाजपा फंसी हुई नजर आ रही है। 

बीजेपी नेता यहां इनर मणिपुर की सीट पर जीत के दावे जरूर कर रहे हैं लेकिन अनौपचारिक बातचीत में वे भी मानते हैं कि इस बार जीत की राह आसान नहीं होगी।  मैतेई हों या कुकी, लोगों में नाराजगी इस बात पर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ना तो राज्य का दौरा किया है और न ही इस पर कोई टिप्पणी की है। लोकसभा चुनाव के दौरान भी उनकी मणिपुर में आने की कोई योजना नहीं है। 

पिछली बार बीजेपी ने इनर मणिपुर सीट जीती थी. लेकिन आदिवासी बहुल आउटर मणिपुर सीट पर नागा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) उम्मीदवार की जीत हुई थी।  राज्य में असामान्य हालात की वजह से आदिवासियों के लिए आरक्षित आउटर मणिपुर सीट परदो चरणों में19 और 26 अप्रैल को मतदान होगा। इनर मणिपुर सीट के लिए 19 अप्रैल को एक चरण में ही वोट डाले जाएंगे।  28.55 लाख की आबादी वाले इस राज्य में 20 लाख से ज्यादा वोटर हैं। 

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह दावा करते हैं कि केंद्र सरकार के समर्थन से राज्य सरकार ने यहां शांति बहाल करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। इसके कारण लोग इस बार भी बीजेपी का ही समर्थन करेंगे।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को उनके इस दावे पर संदेह है. विश्लेषकों का कहना है कि मणिपुर में मतदान से ठीक पहले नए सिरे से हुई हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई है और तीन लोग घायल हो गए हैं। ऐसे में मतदान के दौरान भी हिंसा की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.

एक विश्लेषक अरुण कुमार भक्ता कहते हैं, “केंद्र और राज्य सरकार की चुप्पी से आम लोगों में भारी नाराजगी है। उनकी यह नाराजगी बीजेपी के लिए भारी पड़ सकती है। कांग्रेस इस नाराजगी को अपने सियासी हित में भुनाने का प्रयास कर रही है। “

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