जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन को लेकर दायर याचिकाओं पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने सोमवार यानी 3 अगस्त, 2026 को बड़ी बातें कही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि 28 जुलाई के आदेश में ‘आपराधिक इतिहास” शब्द का मतलब सिर्फ ‘गंभीर और जघन्य अपराध’ है। दरअसल, सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने शीर्ष अदालत से सुनवाई के दौरान अपील की थी कि आपराधिक इतिहास शब्द को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
दरअसल, 28 जुलाई के आदेश में कोर्ट ने उन छात्रों के खिलाफ सख़्त कार्रवाई करने पर रोक लगा दी थी, जिनका कोई ‘आपराधिक इतिहास’ नहीं था। कोर्ट ने यह बात तब साफ की जब याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह शब्द अस्पष्ट है और इससे उन छात्रों को परेशानी हो सकती है जिन पर छोटे-मोटे अपराधों का आरोप हो। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को बंद करने या वापस लेने की इजाजत भी दे दी है। पीठ ने इसी के साथ मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को तय कर दी।
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 3 अगस्त को साफ किया कि राज्य, कानून के मुताबिक स्टूडेंट प्रोटेस्ट में शामिल होने वाले छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को बंद करने या वापस लेने के लिए आजाद हैं।
कोर्ट ने अपने 28 जुलाई के आदेश को और स्पष्ट किया है, जिसमें कहा गया था कि राज्य FIR में जांच आगे बढ़ा सकते हैं। कोर्ट ने यह सफाई तब दी जब याचिकाकर्ताओं ने बताया कि 28 जुलाई का आदेश FIR वापस लेने में रुकावट डाल सकता है। FIR वापस लेना वह वादा था जो केंद्र सरकार ने प्रोटेस्ट खत्म करने की शर्त के तौर पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से किया था।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने वाले पुलिस अधिकारी को बेवजह सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए। और ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि छात्र विरोध-प्रदर्शन की आड़ में किसी कुख्यात अपराधी को भी सुरक्षा मिल जाए।
इस पर सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने सुझाव दिया कि स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम की निगरानी के लिए भारत के पूर्व चीफ जस्टिस को नियुक्त किया जाए।
वहीं, एक और सीनियर एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने भी पैलेट गन के खिलाफ याचिका उठाई और कहा कि उनकी रिसर्च से पता चला है कि नागरिकों के प्रदर्शन के खिलाफ इनके इस्तेमाल को अधिकृत करने वाला कोई दस्तावेज़ नहीं है। CJI ने कहा कि कोर्ट पैलेट गन के इस्तेमाल के तरीके पर एक प्रोटोकॉल तय करेगा।
वहीं, इससे पहले जब सुनवाई शुरू हुई तो सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलील रखते हुए कहा कि ‘आपराधिक इतिहास” शब्द को स्पष्ट किया जाना चाहिए, ताकि ड्राइविंग नियमों के उल्लंघन जैसे छोटे-मोटे अपराधों का सामना करने वाले छात्रों को परेशानी न हो।
जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसे लोग भी थे जिन पर हत्या और रेप के आरोप थे, तो सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने बायोमेट्रिक निगरानी और फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, ‘सरकार ने विरोध प्रदर्शन में शामिल सभी लोगों की पहचान सिर्फ़ फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके की है। इसकी जांच होनी चाहिए। हमने अपने बायोमेट्रिक डेटा के इस्तेमाल के लिए सहमति नहीं दी है।
CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के सामने याचिकाओं का पुलिंदा है। इन याचिकाओं के एक सेट में उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है, जिन पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने के आरोप हैं। वहीं, उन अधिकारियों की ओर से भी याचिकाएं दायर की गई हैं जो कथित तौर पर घायल हुए थे। प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी एक याचिका दायर की गई है।
सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने एक वकील के साथ मारपीट का मुद्दा उठाया, जिनके साथ कथित तौर पर निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन में मारपीट की गई थी, जब वे वहां हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों से मिलने गए थे। उन्होंने कहा कि यह न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक गंभीर मामला है। चीफ जस्टिस ने कहा कि बर्बरता करने वाले पुलिस अधिकारियों को बचाया नहीं जाना चाहिए।
CJI सूर्यकांत की बेंच के समक्ष शुरुआत में भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि छात्रों के खिलाफ FIR वापस लेने के केंद्र सरकार के वादे को कैसे लागू किया जाए, इसे लेकर कुछ उलझन थी। सरकार अपने वादे को लेकर गंभीर थी, लेकिन ‘शब्दों के अर्थ’ को लेकर कुछ उलझन थी, क्योंकि आपराधिक कानून में FIR वापस लेने का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बजाय क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने, मुकदमा वापस लेने की अर्जी देने या अदालतों द्वारा इसे रद्द करने का विकल्प हो सकता है। सॉलीसिटर जनरल ने कहा कि उन्होंने वकील वृंदा ग्रोवर के साथ इस बात पर चर्चा की थी कि इस वादे को कानूनी रूप से कैसे लागू किया जाए।
ग्रोवर ने कहा कि मुकदमा वापस लेने के लिए अलग-अलग आवेदन करना एक थकाऊ और मुश्किल प्रक्रिया हो सकती है और इसमें न्यायिक मंजूरी मिलने को लेकर अनिश्चितता भी बनी रहती है। उन्होंने पटना की एक FIR का जिक्र किया जिसमें 5000 से ज्यादा अज्ञात लोगों का नाम था। उन्होंने कहा कि ऐसी ‘कैच-ऑल’ FIR का इस्तेमाल किसी को भी फंसाने के लिए किया जा सकता है। मेहता ने जवाब को अंतिम रूप देने के लिए कुछ दिन मांगे और FIRs का चार्ट साझा करने पर सहमति जताई। जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट FIRs को रद्द करने के लिए एक प्रक्रिया तैयार कर सकता है।

