न्यूज़ डेस्क
वैसे तो कोई भी सरकार अब संसदीय सत्र में रूचि नहीं रखती। सरकार को यह डर होता है कि विपक्ष उसकी कमियों का उजागर करेगी और जनता तक उसकी कमियों को ले जायेगा। विपक्ष भी इसी ताक में बैठा रहता है। कह सकते हैं कि विपक्ष की चाहत होती है कि सत्र चले ताकि सरकार को घेरा जाए। जानकारी मिल रही है कि इस बार संसद का शीतकालीन सत्र काफी छोटा हो सकता है। वजह है पांच राज्यों के चुनाव और फिर उसके परिणाम। देश तो काफी पहले से ही चुनावी मेयो में है। सत्ता पक्ष और विपक्ष भी चुनावी मैदान में एक दूसरे को ललकार रहे हैं। पांच राज्यों के चुनाव के साथ ही लोकसभा चुनाव की भी रणनीतियां भी बन रही है। एक दूसरे को कैसे मात दिया जाए इसकी प्लानिंग खूब हो रही है। लेकिन देश का भला कैसे हो ,देश की समस्या कैसे खत्म हो और महंगाई ,ेकारी कैसे दूर हो इसकी कोई बात कही से सुनाई नहीं पड़ती।
जानकारी मिल रही है कि संसद का शीतकालीन सत्र इस बार भी छोटा होगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की वजह से सत्र को छोटा किया जा सकता है। आमतौर पर सत्र एक महीने का होता है। नवंबर के तीसरे हफ्ते में संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होता है और दिसंबर के तीसरे हफ्ते में खत्म होता है। लेकिन नवंबर में चुनाव चल रहे होंगे। पांच राज्यों के चुनाव नवंबर में ही हैं। मिजोरम में सात नवंबर को चुनाव है। मध्य प्रदेश में सभी 230 सीटों और छत्तीसगढ़ के दूसरे चरण की 70 सीटों पर 17 नवंबर को मतदान होगा। राजस्थान की सभी 200 सीटों पर 25 नवंबर को और तेलंगाना की सभी 119 सीटों पर 30 नवंबर को मतदान होगा। तीन दिसंबर को पांचों राज्यों में वोटों की गिनती होगी।
इस तरह नवंबर के अंत तक संसद का सत्र शुरू होने की संभावना नहीं है। तीन दिसंबर को वोटों की गिनती के दिन रविवार है। इसलिए ज्यादा संभावना चार दिसंबर से सत्र शुरू होने की है। बताया जा रहा है कि यह सत्र दो हफ्ते का हो सकता है। यानी 20 दिसंबर तक संसद सत्र समाप्त हो जाएगा। वैसे भी उसके बाद क्रिसमस वगैरह की छुट्टी हो जाती है। पिछले साल भी गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव थे, जिसकी वजह से शीतकालीन सत्र समय से शुरू नहीं होकर सात दिसंबर से शुरू हुआ। इसके अगले दिन आठ दिसंबर को दोनों राज्यों के नतीजे आए थे। सात दिसंबर को शुरू होकर सत्र 23 दिसंबर को समाप्त हो गया। यानी पिछले साल भी शीतकालीन सत्र दो हफ्ते ही चला था। ध्यान रहे इस बार शीतकालीन सत्र मौजूदा लोकसभा का आखिरी पूर्ण सत्र होगा। इसके बाद चुनाव से पहले बजट सत्र होगा लेकिन वह सिर्फ लेखानुदान के लिए होगा।
देश को अब किसी सत्र से कोई अपेक्षा भी नहीं है। जनता भी चुनाव को ही देख रही है। जनता भी इस चुनाव में अपना भविष्य तलाश रही है। देखना ये है कि आगामी स्तर में क्या कुछ होता है और आगामी राजनीति देश को क्या कुछ देती है।
