झारखंड में राज्यसभा चुनाव के बाद राजनीतिक परिदृश्य बदलने की संभावना

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भारतीय जनता पार्टी इस समय विपक्षी राजनीतिक दलों के सांसदों से लेकर विधायकों तक को तोड़कर अपने पक्ष में मिलाकर फायदा उठाने के लिए एक बड़ा मुहिम चला रही है। विपक्षी राजनीतिक दलों के लोकसभा के सदस्यों को भारतीय जनता पार्टी के द्वारा तोड़ने की बात तो समझ में आती है कि इससे वह अपने दम पर लोकसभा में बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में आ जाएगी। वर्तमान में अपने 240 सांसद ही होने के कारण इसे जेडीयू और तेलुगु देसम पार्टी के बैसाखी के भरोसे रहना पड़ रहा है। विपक्षी राजनीतिक दल के लोकसभा के सदस्यों को तोड़कर यह जेडीयू और तेलुगू देशम पार्टी की तरफ से पड़ने वाले किसी भी दबाव से मुक्त हो जाएगी और अपने मर्जी का बिल लोकसभा में पास करवा सकेगी। राज्यसभा को लेकर भी यही बातें कहीं जा सकती है। लेकिन सत्तासीन होने के बावजूद पश्चिम बंगाल में टीएमसी के विधायकों को तोड़कर इसे ऐसा कुछ नहीं मिलेगा,लेकिन इसके बावजूद बीजेपी अगर यहां विधायकों को तोड़ रही है तो इसके पीछे का कारण यह हो सकता है कि इसके सहारे वह अपनी पार्टी का विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक विस्तार कर विपक्षी राजनीतिक दलों को कमजोर कर आगामी चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करना चाह रही है। बीजेपी चुपचाप हर जगह अपना यह मुहिम चला रही है।
भारतीय जनता पार्टी लाख प्रयास करके भी जब से हेमंत सोरेन ने यूपीए या इंडिया अलायंस के तहत झारखंड में अपने मुख्य मंत्रित्व में सरकार बनाई है, तबसे बीजेपी यहां ना तो अपनी और ना ही अपनी गठबंधन की सरकार बना पाई है। ऐसे में यह झारखंड में इंडिया अलायंस को कमजोर करने में लगी हुई है। हालिया राज्यसभा चुनाव में इसे इस मायने में कुछ सफलता भी हाथ लगी है। इंडिया अलायंस के पास दो राज्य सभा सदस्यों को यहां से जीताकर भेजने के लायक पर्याप्त बहुमत यानी 56 का आंकड़ा मौजूद था। लेकिन बीजेपी ने यहां इंडिया अलायंस के विधायकों के बीच सेंधमारी कर दी। बीजेपी या एनडीए के पास मात्र 24 विधायक होने के बावजूद बीजेपी समर्थित उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने राज्यसभा की सीट जीतने में कामयाबी हासिल कर ली। इस अपार बहुमत के बावजूद इंडिया अलायंस राज्यसभा के सिर्फ एक ही प्रत्याशी झारखंड मुक्ति मोर्चा के बैजनाथ राम को जिताने में सफल हो पाइ। इंडिया अलायंस के दूसरे उम्मीदवार कांग्रेस के प्रणव झा इस चुनाव में अपने ही गठबंधन के कुछ नेताओं के दगाबाजी के कारण चुनाव जीतने में सफल नहीं हो सके।

राज्यसभा के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा के नहीं जीत पाने को लेकर इंडिया एलायंस के बीच आरोप -प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। अपनी स्थिति को देखते हुए कांग्रेस जेएमएम पर तो कोई आरोप नहीं लगा रही है,लेकिन सीपीआई (एमएल) और आरजेडी को यह इस हार के लिए जिम्मेदार ठहरा रही है। जवाब में सीपीआई (एमएल) और आरजेडी भी इस मामले में कांग्रेस को लथाड़ रही है कि इसने तो गठबंधन धर्म का पालन किया, लेकिन छेद कहीं कांग्रेस में ही है। उससे तो अपना ही कुलवा नहीं संभल पा रहा है।
राज्यसभा के सदस्य के रूप में परिमल नाथवानी के जीत जाने के बाद अब बीजेपी यहां भी इंडिया एलाइंस को कमजोर करने में जुट सकती है जिससे जल्दी ही यहां भी एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
बीजेपी के लिहाज से देखें तो
जिन चार विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है, उसे अपनी पार्टी में मिला लेने पर बीजेपी के पास सत्ता प्राप्त करने लायक बहुमत हो सकता है। यहां तक की कांग्रेस के सभी 16 सदस्यों को अगर बीजेपी अपने पक्ष में मिल लेती है तो भी एनडीए की विधायकों की कुल संख्या 40 तक ही जाएगी जो सरकार बनाने के लिए बहुमत के जादुई आंकड़े से एक कम है।और फिर इतनी बड़ी टूट भी इस समय जबकि राज्य में इस गठबंधन की सरकार है संभव नहीं है।

दूसरे प्रयोग के रूप में बीजेपी बीजेपी झारखंड में भी महाराष्ट्र और बिहार के तर्ज पर चल सकती है।यानि पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा का छोटा भाई बनकर हेमंत सोरेन को इंडिया अलायंस से हटाकर एनडीए गठबंधन के अंतर्गत मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दे सकती है, और फिर मौका पाकर हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाकर खुद अपनी पार्टी के नेता को इस पर बिठाकर बड़ा भाई बनने की चाल चल सकती है। वैसे भी जेएमएम पहले बीजेपी के साथ गठबंधन की सरकार बना चुकी है ,लेकिन तब वह छोटे भाई की भूमिका में रहा करती थी। ऐसे में हेमंत सोरेन के पास बीजेपी के साथ रहने का पुराना खट्टा मीठा अनुभव रहा है। इसके अलावा महाराष्ट्र और बिहार की घटना का उदाहरण भी उनके सामने है। शायद यही कारण है कि पूर्व में ऐसी हवा चली भी तो हेमंत सोरेन ने उसे सीधे गुजर जाने दिया और उसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

बीजेपी से इतर जेडीयू के सरयू राय ने भी जो पूर्व में बीजेपी के ही सदस्य हुआ करते थे और जो पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास से तकरार होने की स्थिति में बीजेपी को छोड़कर बाहर आए थे , और अभी जेडीयू के विधायक हैं,उन्होंने भी हेमंत सोरेन पर डोरा डालना शुरू कर दिया है। उन्होंने हेमंत सोरेन को भेजे एक प्रस्ताव में कहा कि हेमंत सोरेन चाहें तो गैर कांग्रेस गैर बीजेपी वाली सरकार भी बना सकते हैं। और ऐसे में उसे कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी का दबाव भी नहीं झेलना पड़ेगा और बीजेपी के हड़प नीति का भी डर नहीं रहेगा। इस नये गठबंधन की सरकार बनाने के लिए बहुमत का आवश्यक जादुई आंकड़ा 41 को लेकर सरयू राय ने कहा कि जेएमएम के 34 , सीपीआई(एमएल) के दो और राजद के चार विधायकों को लेकर विधायकों की कुल संख्या 40 पर पहुंच जाती है और एक उनके यानी सरयू राय के समर्थन मिलने से विधायकों की कुल संख्या 41 हो जाती है और इस प्रकार से बहुमत के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा प्राप्त कर लिया जा सकता है।

आवश्यक बहुमत नहीं रहने के बावजूद बीजेपी के उम्मीदवार परिमल नाथवानी के राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद इंडिया अलायंस को तो यह डर जरूर सता रहा होगा कि अब बीजेपी यहां इस खेल के बाद कोई बड़ा खेल ना करदे। ऐसे में इस राज्यसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद झारखंड की राजनीति मे़ ज्यादा नहीं तो कुछ ना कुछ अस्थिरता तो जरूर आ गई है।अब इसका लाभ कौन कितना उठा पाता है यह तो कुछ दिनों के बाद ही पता चलेगा।

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