बीरेंद्र कुमार झा
चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने दूरी बना ली हैं।न्यायमूर्ति जोसेफ और न्यायमूर्ति वीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि मामले को अन्य पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करें।
संवैधानिक पद पर नियुक्ति के बाद नहीं की जा सकती कोई धारना
स्वयं को सुनवाई से अलग करने से पहले शीर्ष अदालत की पीठ ने निर्वाचन आयुक्त के रूप में अरुण गोयल की नियुक्ति को चुनौती देने वाले गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म से पूछा कि इस नियुक्ति में किन किन नियमों का उल्लंघन किया गया है ? पीठ ने कहा कि संवैधानिक पद पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति के बाद यह धारणा नहीं बनाई जा सकती कि वह गलत या मनमानी करेगा या फिर हां में हां मिलाएगा।
शीर्ष न्यायालय की पीठ ने क्या कहा
न्यायालय की पीठ ने कहा कि अदालत के 2 मार्च पर आधारित है, जिसमें कहा गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति चुनाव की शुद्धता बनाए रखने के लिए एक समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी और समिति में प्रधानमंत्री ,लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के प्रधान न्यायाधीश होंगे ।लंबे फैसले में न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि नौकरशाह गोयल को अगर चुनाव के आयुक्त रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव के बारे में जानकारी नहीं थी तो उन्होंने पिछले साल 18 नवंबर को स्वैच्छिक सेवानिवृति के लिए आवेदन कैसे किया?
अरुण गोयल की नियुक्ति प्रक्रिया दुर्भावनापूर्ण और मनमानी थी
सुनवाई के दौरान एनजीओ की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार ने गोयल की नियुक्ति पर दलील दी है कि चार अफसरों के पैनल में वो सबसे युवा हैं और लंबे समय तक अपनी जिम्मेदारी को निभा सकते हैं। लेकिन भूषण का कहना है कि 1985 के बैच में 160 अफसर हैं। इनमें से कई गोयल से कम उम्र के हैं। फिर उन अफसरों के नाम पर विचार क्यों नहीं किया गया। भूषण का कहना है कि सरकार को नहीं लगता कि दूसरा कोई अफसर उसकी हां में हां उस तरह से मिलाएगा जैसे अरुण गोयल कर सकते हैं। एडवोकेट की सुप्रीम कोर्ट से अपील है कि वो तत्काल इस नियुक्ति को रद कर सरकार को सबक सिखाए।

