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ओडिसा के पूरी में विराजने वाले जगत के नाथ जगन्‍नाथ की रथ यात्रा आज

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जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन हर साल उड़ीसा के पुरी में होती है। हर साल आषाढ़ मास के शुक्‍ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ,बहन सुभद्रा और दाऊ बलराम के रथ के साथ पूरी के मंदिर को रथयात्रा शुरू होती है जो वहां से 3 किलोमीटर दूर गुंडीचा मंदिर जाकर संपन्न होती है।माना जाता है की गुंडीचा मंदिर उनकी मौसी का घर है।यहां वे 7 दिनों तक रुकते हैं और फिर आषाढ़ शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को वापस रथ में सवार होकर अपने धाम लौट जाते हैं। इस अवसर पर देश दुनिया से भक्तों की भारी भीड़ इस रथयात्रा का दर्शन करने के लिए यहां आते हैं।

इस वर्ष उड़ीसा के पूरी धाम में रथ यात्रा का आयोजन रविवार 7 जुलाई को हो रही है। सदियों से चली आ रही या परंपरा भारत की लोक संस्कृति की धरोहर है तो वहीं यह रथ यात्रा वेदों से निकले सूत्र वाक्य सर्वे भवंतु सुखिनः ,सर्वे संतु निरामया ,सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुःखभाग भवेत,भयानि सभी सुखी हों,सभी स्वस्थ हों,सभी अच्छा देखें और किसी को भी दुःख नहीं हो को चरितार्थ करती है।

रथ यात्रा की इस भीड़ में न कोई जाति रह जाती है ,ना कोई धन पद और मान रह जाता है। यहां सिर्फ महाप्रभु जगन्नाथ ,बहन सुभद्रा और दाऊ बलराम होते हैं और उनका रथ खींचते श्रद्धालु होते हैं ।रथ यात्रा के दौरान हर व्यक्ति का परिचय सिर्फ इतना भर रह जाता है कि वह जगन्नाथ जी की शरण में आया है।यहां किसी का पद और कद कोई मायने नहीं रखता है।यह बात तब और अधिक साफ हो जाती है, जब खुद पूरी के राजा लोगों की भीड़ के बीच बिना किसी छत्र और चंवर के पैदल आते हैं और श्री मंदिर से लेकर रथ यात्रा के मार्ग पर झाड़ू लगाते हैं। राजा द्वारा झाड़ू लगाने की परंपरा को रथ यात्रा में छेरा फहरा कहते हैं।जगन्‍नाथजी की रथयात्रा में शामिल होने का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना जाता है।

रथ यात्रा में हर साल 3 रथ शामिल किए जाते हैं। जिसमें से एक रथ भगवान जगन्‍नाथ, एक बलरामजी और एक बहन सुभद्रा का होता है। रथ यात्रा के लिए प्रतीक वर्ष इन रथों का निर्माण किया जाता है।निर्माण की प्रक्रिया बसंत पंचमी के दिन लकड़ी काटकर रथखला यानि रथ निर्माण स्थल तक लाने से होता है और अक्षय तृतीया के दिन से यहां रथों का बनना प्रारंभ हो जाता है।

भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और दाऊ बलराम जिन रथों पर सवार होते हैं, उनमें से हर रथ की ऊंचाई, लंबाई चौड़ाई और रंग अलग-अलग होता है। इसके अलावा इन तीनों रथों के नाम भी अलग-अलग होते हैं, और इन रथों के निर्माण में काष्ठ की संख्या तथा पहियों की संख्या भी अलग-अलग होती है।

भगवान जगन्नाथ जी के रथ का नाम नदी घोष है। इसे बनाने में कारीगर लकड़ी के 832 टुकड़ों का प्रयोग करते हैं।16 चक्कों पर खड़े इस रथ की ऊंचाई 45 फीट होती है तथा इसकी लंबाई 34 फीट होती है। रथ के सारथी का नाम दारूक ,रक्षक गरुण, रथ की रस्सी शंखचूड़ नागुनी और रथ पर त्रिलोक मोहनी पताका फहराती है।इस रथ को चार घोड़े खींचते हैं ,जिनके नाम शंकर बहालक सुवेत और हरिदश्व हैं।जगन्नाथ जी के रथ पर नव देवता भी सवार होते हैं ।नव देवताओं में गोवर्धन, कृष्ण,गोपी कृष्णा,नरसिंह, राम, नारायण त्रिविक्रम, हनुमान और रुद्र शामिल है। जगन्नाथ जी के रथ को गरुड़ ध्वजा और कपिध्वज भी कहा जाता है।

बहन सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है।इसे दर्पदलन भी कहते हैं।इसमें कष्ठों की कुल संख्या 593 होती है और 12 चक्कों पर खड़ा यह रथ 31 फीट लंबा और 43 फीट ऊंचा होता है। खुद अर्जुन ही इस रथ के सारथी हैं। और रथ की रक्षिका जय दुर्गा देवी का नाम स्वर्ण चरण नागुनी है। इस रथ का पताका नंदमबिका कहलाती है। देवी सुभद्रा के रथ को जो चार घोड़े खींचते हैं उनके नाम रुचिका माचिका जीत और अपराजिता है।

दाऊ बलराम जी का रथ तालध्वज कहलाता है।यह सबसे अधिक 763 काष्ठ खंडों से बनता है।इसमें कुल 14 चक्के होते हैं और इसकी ऊंचाई 44 फीट होती है।रथ की लंबाई 33 फीट है। इसके सारथी का नाम मैथिली ,रक्षक का नाम वासुदेव,रस्सी का नाम वासुकि नाग तथा पताका उन्नानी कहलाती है। रथ में चार घोड़े हैं जिसके नाम तीव्र भर दीर्घाश्रम और स्वर्णनाभ है।

भगवान जगन्नाथ्य की रथ यात्रा शुरू होने को लेकर प्रचलित धार्मिक मान्‍यता के अनुसार एक बार बहन सुभद्रा ने अपने भाइयों कृष्‍ण और बलरामजी से नगर को देखने की इच्‍छा प्रकट की। फिर दोनों भाइयों ने बड़े ही प्‍यार से अपनी बहन सुभद्रा के लिए भव्‍य रथ तैयार करवाया और उस पर सवार होकर तीनों नगर भ्रमण के लिए निकले थे। रास्‍ते में तीनों अपनी मौसी के घर गुंडिचा भी गए और यहां पर 7 दिन तक रुके और उसके बाद नगर यात्रा को पूरा करके वापस पुरी लौटे। तब से हर साल तीनों भाई-बहन अपने रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं और अपनी मौसी के घर गुंडीचा मंदिर जाते हैं। इनमें सबसे आगे बलराम जी का रथ, बीच में बहन सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे जगन्‍नाथजी का रथ होता है।

भगवान जगन्‍नाथ की रथयात्रा में प्रयुक्त होने वाले रथ नीम की परिपक्‍व और पकी हुई लकड़ी से तैयार किए जाते हैं। इसे दारु कहा जाता है। रथ को बनाने में लकड़ी को छोड़कर किसी अन्‍य चीज का प्रयोग नहीं किया जाता है। रथ यात्रा में कुछ धार्मिक अनुष्‍ठान भी किए जाते हैं। मान्‍यता है कि इस रथ यात्रा का साक्षात दर्शन करने भर से ही 1000 यज्ञों का पुण्य फल मिल जाता है। जब तीनों रथ यात्रा के लिए सजसंवरकर तैयार हो जाते हैं तो फिर पुरी के राजा गजपति की पालकी आती है और फिर रथों की पूजा की जाती है। उसके बाद सोने की झाड़ू से रथ मंडप और रथ यात्रा के रास्‍ते को साफ किया जाता है।

भगवान जगन्नाथ अपनी यात्रा के दौरान मुस्लिम भक्‍त सालबेग की मजार पर कुछ देर के लिए जरूर रुकता है। माना जाता है कि एक बार जगन्‍नाथजी का एक भक्‍त सालबेग भगवान के दर्शन के लिए पहुंच नहीं पाया था। फिर उसकी मृत्‍यु के बाद जब उसकी मजार बनी तो वहां से गुजरते वक्‍त जगन्नाथ जी का रथ खुद ब खुद वहां रुक गया। फिर उसकी आत्‍मा के लिए शांति प्रार्थना की गई। इसके बाद ही रथ आगे बढ़ पाया। तब से हर साल रथयात्रा के दौरान रास्‍ते में पड़ने वाली सालबेग की मजार पर जगन्‍नाथजी का रथ जरूर रुकता है।

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