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: बिहार चुनाव में क्षेत्रीय दलों की एंट्री, NDA और महागठबंधन की रणनीति में मच सकती है हलचल

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बिहार के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राज्य की सियासत में एक कयास जरूर लगाया जा रहा है कि अगर महागठबंधन ने एआइएमआइएम और बीएसपी की फरियाद को ताक पर रखा तो कोई बड़ी बात नहीं कि ये दोनों दल आपसी समझ विकसित कर ले। हालांकि अभितक दोनों दलों ने इस संबंध में खुलकर कोई बात नहीं की है। गौरतलब है कि कि आइएमआइएम ने बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए महागठबंधन में शामिल होने की गुहार लगा रखी है।

हालांकि इन दलों की हार-जीत पर चर्चा करना अभी जल्द बाजी होगी, लेकिन इस बार के चुनाव में ये किसी गठबंधन का खेल जरूर बिगाड़ सकते हैं। यूपी से सटे इलाके में बहुजन समाज पार्टी पहले की तरह कुछ सीटों पर निर्णायक साबित हो सकती है।

एआइएमआइएम, महागठबंधन के मुख्य घटक दल आरजेडी के वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है।पिछली बार सीमांचल इलाके में पांच सीट जीत कर एआइएमआइएम ने आरजेडी को सकते में डाल दिया था।दूसरे शब्दों में कहें कि सत्ता से दूर कर दिया था तो गलत नहीं होगा।यह बात किसी से छुपी नहीं है कि महागठबंधन के कैडर वोट बैंक मुस्लिम मतदाता पर इस पार्टी का पिछले विधानसभा चुनाव में खास असर दिखा था।

इस पार्टी ने 2020 के विधानसभा चुनावों में कुल 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था।इसमें उसे पांच सीटों पर जीत हासिल हुई थी।जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, उन सीटों पर इस पार्टी को 14.28 फीसदी वोट मिला। जबकि इस चुनाव में राज्य में पड़े कुल मतों में इसकी हिस्सेदारी केवल 1.24 फीसदी ही थी। हालांकि इस पार्टी के मुखिया बीजेपी के मुखर विरोधी हैं।उन्होंने महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जाहिर की है।

आरजेडी ने एआइएमआइएम के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाया है,क्यों कि ऐसा करते ही हमेशा के लिए उसका एम-वाय समीकरण में एम फैक्टर यानी मुस्लिम वोट बैंक में एआइएमआइएम की भागीदार स्थापित हो जायेगी।दूसरे , महागठबंधन का अन्य घटक दल कांग्रेस भी नहीं चाहती है कि एआइएमआइएम से तालमेल हो, क्योंकि वह दूसरे राज्यों में अपने को बीजेपी के खिलाफ मुस्लिम वोटर को अपना कोर वोटर मान कर भरोसा करती है। महागठबंधन में विशेष रूप से राजद इस पार्टी की धरातल पर ताकत को अभी तौलने में लगा है. राजद और कांग्रेस के लिए एआइएमआइएम गले की हड्डी साबित हो सकता है।

गठबंधनों से परे पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी भी लड़ी थी।78 सीटों पर लड़ी इस पार्टी के खाते में केवल एक सीट गयी थी। हालांकि राज्य के कुल वोट बैंक में इसकी हिस्सेदारी 1.49 फीसदी रहा था।जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, वहां इसके वोटों की हिस्सेदारी 4.66 फीसदी रही।एआइएमआइएम और बसपा के संबंध में खास बात यह है कि कि पिछले चुनाव में उसके जीते उम्मीदवार राज्य में सरकार बनते ही सत्ताधारी दलों में शामिल होकर सत्ता का सुख भोगने लगे थे।

जनसुराज के लिए के लिए यह पहला विधानसभा चुनाव है। इसका बीजेपी और जेडीयू के शहरी और कस्बाई युवा वोटर्स पर असर हो सकता है।हालांकि इस पार्टी के लिए यह ‘लिटमस’ टेस्ट जैसा होगा।यह दल राज्य की राजनीति में पैर जमाने पूरी ताकत झौंकने की कोशिश में है। इसके शीर्ष नेता जेडीयू के पूर्व पदाधिकारी हैं।

बिहार के चुनावी दंगल में सियासी पहलवानों के दो खेमे हैं।एक खेमा एनडीए का है। यह बीच मेंंकुछ समय छोड़कर करीब 20 सालों से सत्ता पर लगातार काबिज है। यह खेमा सत्ता की निरंतरता चाहता है।दूसरा खेमा इंडिया महागठबंधन है। यह सत्ता में वापसी के आस में पूरी ताकत से लगा हुआ है। इसने भी बीच-बीच में सत्ता का स्वाद चखा है। ऐसे में तीसरे खेमे या राजनीतिक दलों के लिए बेहद कम गुंजाईश है।बिहार में गठबंधन राजनीति के हिस्से में 243 सीट में से 237 सीटें हैं।केवल सात सीटें गैर गठबंधन दलों एवं निर्दलीय के खाते में गयी है।

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