नागपुर में फेल हो गए पारासिटामोल के सैंपल, समझ लीजिए कैसे पहचानें नकली दवा

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हम में से शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां पैरासिटामोल की गोली न रखी हो। जरा सा सिर भारी हुआ, हरारत लगी या हल्का सा बुखार चढ़ा, तो हम बिना सोचे-समझे पत्ता निकालते हैं और एक गोली गटक लेते हैं। इसी तरह ब्लड प्रेशर के मरीज हर सुबह नियम से टेल्मिसार्टन जैसी बीपी की गोली खाते हैं ताकि दिल महफूज रहे। लेकिन सोचिए, जिस दवा को आप ठीक होने के लिए खा रहे हैं, अगर वही दवा नकली या घटिया क्वालिटी की निकले तो क्या होगा?

हाल ही में महाराष्ट्र के नागपुर से एक ऐसी खबर आई है जिसने सबको चौंका दिया है। वहां फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए (FDA) ने सरकारी अस्पतालों और दुकानों में सप्लाई होने वाली करीब सवा लाख पैरासिटामोल और टेल्मिसार्टन गोलियों को तुरंत बाजार से वापस मंगाने यानी रिकॉल करने का आदेश दिया है।लैब टेस्ट में ये दवाइयां क्वालिटी टेस्ट में पूरी तरह फेल साबित हुई हैं।

आइए बहुत ही आसान और सीधी भाषा में समझते हैं कि नागपुर में आखिर हुआ क्या और एक आम इंसान के तौर पर आप मेडिकल स्टोर पर नकली या घटिया दवा की पहचान कैसे कर सकते हैं।

नागपुर एफडीए की टीम समय-समय पर अस्पतालों और मेडिकल स्टोरों से दवाओं के सैंपल लेकर सरकारी लैब में जांच के लिए भेजती है। इस बार जब पैरासिटामोल और बीपी की दवा टेल्मिसार्टन के सैंपल की जांच हुई, तो नतीजे बेहद हैरान करने वाले थे।

लैब रिपोर्ट में पाया गया कि पैरासिटामोल की इन गोलियों में बुखार उतारने वाला जरूरी केमिकल यानी एक्टिव इनग्रेडिएंट तय मात्रा से बहुत कम था।
टेल्मिसार्टन की गोलियां भी मानक स्तर पर खरी नहीं उतरीं, जिसका मतलब है कि बीपी का मरीज अगर इसे खाए तो उसका ब्लड प्रेशर काबू में आने के बजाय बढ़ सकता है।
रिपोर्ट आते ही प्रशासन ने तुरंत करीब 1.25 लाख गोलियों के पूरे बैच को बैन कर दिया और जहां-जहां ये दवाइयां बंटी थीं, उन्हें तुरंत वापस मंगाने का फरमान जारी किया।अधिकारियों का कहना है कि ऐसी घटिया दवाइयां बीमारी तो ठीक नहीं करतीं, उल्टे मरीज के लीवर और गुर्दे (किडनी) को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।

यह कोई पहली बार नहीं है जब हमारे देश में दवाओं के सैंपल फेल हुए हों. असल में बाजार में दो तरह की खराब दवाइयां घूमती हैं। पहली वो जो पूरी तरह नकली होती हैं, यानी किसी अवैध फैक्ट्री में चाक-मिट्टी या घटिया पाउडर मिलाकर ब्रांडेड कंपनी के नाम से पैक कर दी जाती हैं। दूसरी वो जिन्हें सब-स्टैंडर्ड यानी घटिया कहा जाता है, जिसमें लाइसेंस वाली कंपनी ही मुनाफे के चक्कर में दवाई की सही मात्रा नहीं डालती।

मरीज समझता है कि वो दवा खा रहा है, लेकिन अंदर जाकर वो दवा कोई असर ही नहीं करती।नतीजा यह होता है कि मामूली बुखार बिगड़कर गंभीर रूप ले लेता है और मरीज की जान पर बन आती है।अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि हम तो कोई साइंटिस्ट या लैब टेक्नीशियन नहीं हैं। फिर मेडिकल स्टोर पर खड़े होकर एक आम आदमी कैसे समझे कि जो पत्ता वो खरीद रहा है वो असली है या नकली।यहां कुछ बहुत आसान से तरीके हैं जिन्हें हर किसी को ध्यान में रखना चाहिए।

जब भी आप मेडिकल से दवा का पत्ता लें, तो उसे एक नजर ध्यान से देखें। असली दवाओं की पैकिंग पर नाम, स्पेलिंग और लोगो एकदम साफ और उभरे हुए होते हैं।

अगर रैपर पर किसी अक्षर की स्पेलिंग गलत दिखे या छपाई धुंधली (मिसप्रिंट) हो, तो फौरन शक करें।
फॉयल की सील अगर कहीं से भी खुली या उखड़ी हुई लगे, तो वो दवा कभी न खरीदें।रंग में कोई अजीब सा फर्क दिखे या एक ही पत्ते में कुछ गोलियों का शेड अलग लगे, तो दुकानदार को तुरंत टोकें।आजकल सरकार ने कई बड़ी और जरूरी दवाओं के रैपर पर क्यूआर कोड (QR Code) या बारकोड छापना जरूरी कर दिया है।

अपने स्मार्टफोन का कैमरा खोलकर पत्ते के पीछे बने बारकोड को स्कैन करके देखें।स्कैन करते ही स्क्रीन पर दवा बनाने वाली असली कंपनी का नाम, मैन्युफैक्चरिंग डेट और बैच नंबर आ जाना चाहिए।अगर कोड स्कैन करने पर कुछ न खुले या कोई अजीब सी फर्जी वेबसाइट दिखे, तो समझ जाएं कि मामला गड़बड़ है।जब आप घर आकर गोली निकालते हैं, तो उसके टेक्सचर पर थोड़ा ध्यान दीजिए।अगर गोली हाथ में लेते ही भुरभुराने लगे या पत्ते के अंदर ही उसका पाउडर झड़ रहा हो, तो वह खराब क्वालिटी की निशानी है।गोली बहुत ज्यादा नम या चिपचिपी लग रही हो, तो भी उसे खाने से बचें।
किसी सिरप में अगर नीचे बहुत ज्यादा गाढ़ी परत जम गई हो और हिलाने पर भी न घुले, तो उसे बच्चों को बिल्कुल न दें।
बिल लेने की आदत कभी न छोड़ें
हमारे देश में ज्यादातर लोग मेडिकल स्टोर पर जाकर पैसे देते हैं और दवा जेब में रखकर चले आते हैं। पक्का बिल कोई नहीं मांगता। यह सबसे बड़ी भूल है।हमेशा दुकानदार से पक्का कैश मेमो या कंप्यूटर बिल मांगें।
बिल पर दवा का नाम, उसका बैच नंबर और एक्सपायरी डेट जरूर दर्ज होनी चाहिए।पक्का बिल होने का फायदा यह है कि अगर कल को उस बैच की दवा नागपुर की तरह फेल घोषित होती है, तो आप उसी बिल के दम पर मेडिकल वाले को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं और क्लेम कर सकते हैं।

अगर किसी दवा को खाने के बाद आपको कोई फायदा महसूस नहीं हो रहा है, या उल्टी, पेट दर्द और शरीर पर अचानक लाल दाने निकलने लगें, तो तुरंत उस दवा को रोक दें।

अपने डॉक्टर को तुरंत जाकर बताएं कि यह दवा खाने के बाद से ऐसी परेशानी हो रही है।
दवा का बचा हुआ पत्ता संभालकर रखें ताकि डॉक्टर या ड्रग इंस्पेक्टर उसे देख सकें।
आप राज्य के ड्रग कंट्रोल विभाग या एफडीए की वेबसाइट पर जाकर उस दवा के बैच नंबर की ऑनलाइन शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं।
अपनी सेहत को लेकर थोड़ी सी होशियारी बहुत जरूरी है।सस्ते के चक्कर में किसी अनजान या सड़क किनारे वाले मेडिकल से दवाइयां कभी न खरीदें। जब भी दवा लें, दो मिनट निकालकर उसका बैच नंबर, एक्सपायरी और प्रिंटिंग जरूर चेक कर लें। आपकी यही छोटी सी सावधानी आपको और आपके पूरे परिवार को नकली दवाओं के इस खतरनाक खेल से पूरी तरह महफूज रख सकती है।

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