अखिलेश अखिल
बिहार से बस यही कब्र आ रही है कि नीतीश कुमार विपक्षी एकता के जरिये बीजेपी को ख़त्म करने की तैयारी कर रहे हैं। और इसमें सच्चाई भी है। बड़ी सच्चाई तो यही है कि बिहार की राजनीति में जब दो बड़ी पार्टियां एक साथ आती है तो सामने वाली पार्टी किसी भी काम की नहीं रहती। जब तक बीजेपी और जदयू एक साथ काम करती रही राजद जैसी बड़ी और ताकतवर पार्टी कभी सत्ता तक नहीं पहुँच पाई। राजद को इसका मलाल आज तक है। फिर बीच में जब भी जदयू और राजद का मिलन हुआ ,बीजेपी कमजोर हुई और हार भी गई। सत्ता से बहार भी हो गई। बिहार में अभी इसी तरह की राजनीति चल रही है।
कहने को तो बिहार में कई राजनीतिक पार्टियां है। एक जमाने की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस वहां काफी कमजोर हो चुकी है लेकिन उसका आधार वोट अभी भी बचा है। यूपी की तरह बिहार से कांग्रेस रुक्सत नहीं हुई है। आज भी भार में कांग्रेस के नेता है और कुछ कमजोर संगठन भी। लेकिन यह नहीं कह सकते कि बिहार में कांग्रेस का कुछ भी नहीं है। करीब दो दर्जन विधायक हैं एयर मौजूदा सरकार में उसकी भागीदारी भी है। अरसे के बाद बिहार में कांग्रेस सरकार में शामिल हुई है। उधर वाम राजनीति भी है और फिर कई छोटे छोटे और भी दाल हैं। सबकी अपनी जातीय राजनीति है और सबके अपने वोट बैंक भी। लोकसभा चुनाव में सभी छोटी पार्टियों की जीत नहीं होती लेकिन विधान सभा चुनाव में बिहार में राजनीति करने वाली अधिकतर पार्टियों के पास कुछ न कुछ विधायक जरूर रहे हैं और मौजूदा समय में है भी। बिहार का एक पक्ष तो यही है।
तो बिहार में महागठबंधन की सरकार है और उसके मुखिया नीतीश कुमार हैं। इस महागठबंधन में सात पार्टियां है और सबकी जातीय राजनीति भी। सूबे की 14 करोड़ आबादी इन्ही पार्टियों के इर्द गिर्द घूमती है और थोक के भाव में वोट भी देती है। जिधर मन चला गया उस पार्टी की जयकार होती है। चुनाव से पहले सब पार्टियां बिहार क दुर्दशा पर बहस करती है। झंडे -पोस्टर लगाती है लेकिन सरकार बनने के बाद वादे पुरे हुए की नहीं इस पर कोई बहस नहीं की जाती। जनता भी सवाल नहीं करती। लोभी जनता सरकार के दिए टुकड़ों पर पलटी है और पढ़ी लिखी जनता अपने बच्चो के साथ पलायन कर बाहरी शिक्षा के जरिये खुद और बच्चो का निर्माण करती है।
नीतीश कुमार कई बार चुके कि बिहार की हालत बदलेगी। पलायन रुकेगा। सबको रोजगार दिया जायेगा। सबको बेहतर शिक्षा और उत्तम स्वास्थ्य लाभ मिलेगा लेकिन ये .हालांकि कई मामले में बिहार की तस्वीर बदली है। अब पहले वाला बिहार नहीं रहा लेकिन युवाओं के लिए आज भी बिहार में कुछ भी नहीं है। लेकिन अब जब राजद के साथ मिलकर जदयू सरकार कला रही है तब उसके निशाने पर अब बीजेपी ही है। नीतीश को लग रहा है कि सब मिलकर नीतीश को परास्त कर देंगे। लेकिन बीजेपी भी तो खेल कर रही है।
बिहार में लोकसभा चुनाव की कामयाबी के लिए बीजेपी कई रणनीतियों पर काम कर रही है। इसी रणनीति का एक हिस्सा है एलजेपी के दोनों धड़ों को एक साथ लाना। एलजेपी के संस्थापक राम विलास पासवान के निधन के बाद पार्टी दो भागों में बंट गई थी। एक गुट में अकेले चिराग पासवान बतौर सांसद बच गए तो बाकी 5 सांसदों का अलग गुट राम विलास पासवान के भाई पशुपति पारस के साथ चला गया। बीजेपी ने अब साफ कर दिया है कि पिछली बार की तरह अगर सीटें चाहिए तो एलजेपी के दोनों धड़ों को एक होना ही पड़ेगा।
अमित शाह का मानना है कि अकेले 2014 में बीजेपी को 29 प्रतिशत और 2019 में 23 प्रतिशत वोट मिले थे। यानी बीजेपी के औसतन 26 प्रतिशत वोट बिहार में हैं। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार बीजेपी के साथ आ गए तो एनडीए का वोट शेयर तकरीबन 18 प्रतिशत बढ़कर 54.34 प्रतिशत हो गया। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में एनडीए ने 39 पर कब्जा जमा लिया था। कांग्रेस के खाते में एक सीट गई थी। आरजेडी शून्य पर भले आउट हो गई, लेकिन उसे नीतीश से थोड़ा ही कम 15 प्रतिशत वोट मिले थे। महागठबंधन में अब नीतीश कुमार के शामिल हो जाने के बाद आरजेडी और जेडूयू की सम्मिलित ताकत 2019 के हिसाब से 34-35 प्रतिशत वोटों की हो गई है। नीतीश के न रहने से बीजेपी की ताकत में 18 प्रतिशत की कमी आ गई है। इसी 18 प्रतिशत को हासिल करने के लिए बीजेपी ने एलजेपी के चाचा-भतीजा को एक होने की सलाह दी है। इसलिए कि उनका वोट आधार 7-8 प्रतिशत का रहा है।
बिहार में बीजेपी को लोकसभा में 2014 से 2019 के दौरान 23 से 29 प्रतिशत वोट मिलते रहे हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ राम विलास पासवान की एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की तब की पार्टी आरएलएसपी ही थीं। तब बीजेपी को 29 प्रतिशत वोट आए थे। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को 16 प्रतिशत और आरजेडी को 15 फीसद वोट मिले थे। बीजेपी के साथ रह कर एलजेपी ने 7.9 प्रतिशत वोट 2019 में हासिल किए थे, जबकि 2014 में इसे 6.5 प्रतिशत वोट ही मिले थे।
नीतीश कुमार की पार्टी 2014 में अकेले लड़ी थी। यानी उस वक्त उसे जो 16 प्रतिशत वोट मिले थे, वही उसका आधार वोट माना जाता है। आरजेडी का भी आधार वोट 15 फीसद ही माना जाता है। 2014 में बीजेपी 30 सीटों पर लड़ी थी और उसे 22 पर कामयाबी मिली थी। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू ने बराबर यानी 17-17 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। जेडीयू का वोट शेयर 2014 के 16 प्रतिशत के मुकाबले 2019 में 21.8 प्रतिशत हो गया। यानी जेडीयू का औसत वोट दोनों चुनावों में 18 फीसद रही। आरजेडी को 2014 में 20.5 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2019 में अकेले लड़ने पर 15.4 प्रतिशत ही वोट मिले। यानी आरजेडी के औसत वोट भी इन दो चुनावों में 17 प्रतिशत रहे। साल 2019 में आरजेडी के सामने एनडीए के रूप में बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी का मजबूत गठबंधन था।
बीजेपी बिहार में दो तरह की रणनीति पर मुस्तैदी से काम कर रही है। बिहार में दलित वोटरों की तादाद कुल वोटरों में 15-16 प्रतिशत मानी जाती है। इसमें अभी एलजेपी के पास 7-8 प्रतिशत वोटर हैं। जीतन राम मांझी अगर एनडीए का हिस्सा बन जाते हैं तो बीजेपी की पूरी दलित आबादी पर पकड़ बन जाएगी। दूसरी रणनीति नीतीश के आधार वोट बैंक में सेंध लगाने की है। जेडीयू की औसत वोट हिस्सेदारी 18 प्रतिशत की ही रही है। इसमें कुर्मी और कोइरी जाति के वोटरों की तादाद अधिक है। कुर्मी वोटर पहले से ही नीतीश कुमार से इसलिए बिदके हुए हैं कि उन्होंने उस आरजेडी से हाथ मिला लिया है, जिसके खिलाफ लव-कुश समीकरण बना था।
ऐसे नाराज कुर्मी वोटरों को नीतीश कुमार से अलग करने के लिए बीजेपी के पास आरसीपी सिंह जैसे नेता हैं। आरसीपी जेडीयू में नीतीश के काफी करीबी रह चुके हैं। केंद्र में मंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। कुर्मी जाति के वोटरों पर नीतीश से कम उनका भी प्रभाव नहीं है। कोइरी वोटरों को रिझाने के लिए बीजेपी ने पहले ही उपेंद्र कुशवाहा को साथ कर लिया है। कुशवाहा की पार्टी आरएलजेडी का एनडीए में जाना पक्का माना जा रहा है। इतना ही नहीं, 6-7 प्रतिशत कुशवाहा वोटरों पर पकड़ मजबूत करने के लिए बीजेपी ने सम्राट चौधरी को अपना प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया है।

