बीरेंद्र कुमार झा
सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने गुरुवार को कहा कि भारत में जम्मू कश्मीर का विलय बिना किसी शर्तों के साथ हुआ था और यह अपने आप में परिपूर्ण था। जस्टिस खन्ना ने याचिकाकर्ताओं के वकील से जानना चाहा कि सर्वोच्च क्या है ,संविधान या विलय का समझौता ?इसके जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता शाह ने कहा कि यह विलय का साधन है ।इस पर जस्टिस खन्ना ने फिर कहा कि सवाल वही है, सर्वोच्च क्या है ,संविधान या विलय का साधन ?वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि बेशक भारत का संविधान सर्वोच्च है,लेकिन इसमें अनुच्छेद 370 भी शामिल है। संविधान पीठ में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर 5 वें दिन सुनवाई हुई।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल,न्यायमूर्ति संजीव खन्ना,न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की संविधान पीठ ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के अलावा किसी भी भारतीय राज्य का मामला ले लें,राज्य सूची के विषयों पर किसी भी राज्य के लिए कानून बनाने की संसद की शक्ति पर प्रतिबंध है। पीठ ने कहा कि विधायी शक्तियों के वितरण से भारत की संप्रभुता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
अनुच्छेद 370 में कभी संशोधन नहीं हो सकता ,यह बात खतरनाक
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने सुनवाई के दौरान कहा कि अनुच्छेद 370 का प्रावधान ऐसा है कि इसमें कभी संशोधन नहीं हो सकता, यह एक खतरनाक बात है कौल ने कहा कि जम्मू कश्मीर विधानसभा यह भी कह सकती थी कि अनुच्छेद 370 का उपयोग करके संविधान के सभी प्रावधानों को जम्मू कश्मीर पर लागू होने दें। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में अनुच्छेद 370 को छोड़कर बांकी सब कुछ लागू होता है। अभी भी सही मायने में 370 नहीं हटा है।इसमें जो कुछ था उसे अनुच्छेद 370 की मशीनरी से ही हटा दिया गया है। हम प्रक्रिया पर नहीं हैं ।
इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जफर शाह ने कहा कि यदि पूर्ण एकीकरण करना है तो विलय समझौता (merger agreement) करना ही पड़ेगा।इस पर न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि क्या यह सब एक बात पर निर्भर नहीं है कि अपनाई गई प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी या नहीं ? यहां सवाल यही है। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर से संबंधित भारत के संविधान की पहली अनुसूची में मूल प्रविष्टि क्या है? इसका जवाब देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शाह ने कहा कि मूल संविधान मेरे पास है। मैं आपको खंड खंड दिखाऊंगा कि 1954 के आदेश में क्या है और 1949 के संविधान में क्या था । इसकी जड़ें इतिहास में है और हमें इसकी सराहना करनी होगी।
समिति का मतलब मंत्री परिषद के माध्यम से लोगों की सहमति
वरिष्ठ अधिवक्ता जफर शाह ने जम्मू कश्मीर की स्वायत्तता का सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य की सहमति का मतलब मंत्रीपरिषद के माध्यम से राज्य के लोगों की सहमति से है। क्यों खास था जम्मू कश्मीर? ऐसा इसलिए था ऐसा इसलिए था क्योंकि कोई विलय समझौता नहीं था और राज्य को संवैधानिक स्वायत्तता बनाई रखती थी।उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 हटाने के लिए सहमति की भी आवश्यकता थी। (परिग्रहण के साधन में निर्दिष्ट नहीं किए गए मामलों के संबंध में) जिसके लिए दोनों पक्षों का सहमत होना आवश्यक था। उन्होंने कहा कि जब दोनों को सहमत होना है तो उन्हें उसे प्रविष्टि के संबंध में सहमत होना होगा, जिसके तहत संसद को कानून बनाने की शक्ति प्राप्त थी।
केंद्र सरकार और राष्ट्रपति को भी जम्मू कश्मीर को लेकर सीधे कानून बनाने का अधिकार नहीं
वरिष्ठ अधिवक्ता शाह ने कहा कि जम्मू कश्मीर के संविधान की उत्पत्ति परिवहन के साधन और उद्घोषणा के क्रम में है।अनुच्छेद 370 का पहला भाग सूची 1, सूची 2, और सूची 3 कानूनों को लागू करने की बात करता है और इसमें परामर्श शब्द का उल्लेख है। परामर्श का मतलब सहमत होना नहीं है।आप असहमत भी हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि राष्ट्रपति और केंद्र सरकार देश के किसी भी राज्य के लिए उनकी राय या सहमति के बगैर कानून बना सकते हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर के लिए नहीं।
विकास होने से हर कोई खुश : केंद्र सरकार
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संविधान पीठ से कहा अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद जम्मू कश्मीर में तेजी से विकास हुआ है और राज्य की जनता खुश है।मेहता ने यह दलील तब दी जब याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता शाह ने संविधान पीठ के समक्ष अपनी दलील पूरी करते हुए कहा कि यह शीर्ष अदालत हमारी आखिरी जगह है, जहां हम इन मुद्दों पर न्याय पा सकते हैं। सब की निगाह की अदालत पर टिकी है। हम उम्मीद करते हैं कि जम्मू कश्मीर के लोगों को न्याय मिलेगा । अधिवक्ता शाह ने मेहता के दलीलों का जवाब देते हुए कहा की कोई भी देश को नहीं बेचता है और इसलिए सभी सरकार प्रगति के लिए काम करती है।सड़क आदि बनाई जाती है।

