मास्टकार्ड ने अमेरिकी सरकार से कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के अपने पेमेंट नेटवर्क रुपे को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा ले रहे हैं। उसने अपनी सरकार से शिकायत भरे लहजे में कहा है कि मोदी की इस स्ट्रैटिजी से उसे नुकसान हो रहा है। रुपे को मोदी सरकार का साथ मिलने से पेमेंट्स सेक्टर की वैश्विक कंपनियों का परेशान होना लाजिमी है, लेकिन इस कदर कि भारतीय प्रधानमंत्री की शिकायत करनी पड़ जाए! यह वाकई हैरतअंगेज है। आखिर क्या है इसकी वजह ?
मोदी सरकार ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के ऐलान के साथ ही ‘ कैशलेस इंडिया ‘ की ओर कदम बढ़ा दिया। भारत में प्रति व्यक्ति आय भी तेजी से बढ़ रही है, बैंक अब छोटे-छोटे कस्बों तक पहुंच रहे हैं और नोटबंदी के कारण डिजिटल ट्रांजैक्शन तेज रफ्तार पकड़ रही है। यही वजह है कि मास्टरकार्ड समेत पेमेंट्स सेक्टर की दिग्गज कंपनियां भारत को एक बड़ा बाजार मानने लगी है, जहां उनके विस्तार की असीम संभावनाएं बन सकती हैं।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि अगस्त महीने में 14 करोड़ 42 लाख क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन हुए, जिनके जरिए 4 खरब 79 अरब 80 करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ। वहीं, 35 करोड़ 70 लाख डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन के माध्य से 4 खरब, 89 अरब, 70 करोड़ रुपये इधर से उधर हुए। कुल मिलाकर भारतीयों ने किराना, इलेक्ट्रॉनिक्स, पोशाक एवं अन्य मदों में खरीद के लिए करीब 1 लाख करोड़ रुपये के कार्ड ट्रांजैक्शन हुए जो अगस्त 2017 में 7 खरब रुपये के मुकाबले करीब 43% अधिक थे। बैंकों की ओर से जारी डेबिट और क्रेडिट कार्ड्स से ट्रांजैक्शन मास्टरकार्ड और वीजा या रुपे जैसी पेमेंट कंपनियों के जरिए हो पाता है, जो हर ट्रांजैक्शन पर कुछ शुल्क वसूलते हैं।

