आखिर सीएम ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक मंत्रालय खुद क्यों सम्हाला ?

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अखिलेश अखिल 

बंगाल की सागरदिघी सीट हारने के बाद ममता बनर्जी की आँख खुल गई। हालिया उपचुनाव में यह सीट कांग्रेस के हाथ लगी। कांग्रेस की जीत के बाद ममता बिफर गई और वाम दलों के साथ ही कांग्रेस पर उन्होंने तीखा हमला भी किया था। उन्होंने कांग्रेस की तुलना बीजेपी से कर दी थी और भी न जाने क्या -क्या कहा था। ममता को लग रहा था कांग्रेस ने उसके गढ़ में सेंधमारी की है। तुरंत उन्होंने सपा के साथ गठबंधन की और ऐलान भी कर दिया कि वह तीसरा मोर्चा बना रही है। ममता ने नवीन पटनायक से भी मुलाकात की और मोर्चा में शामिल होने का आग्रह भी किया।      
लेकिन अब बहुत कुछ बदल गया है। अब ममता की आँखे खुली है। उन्हें लग गया है कि जिस सागारदिघी सीट से टीएमसी हारी है उसके मूल में कांग्रेस नहीं संघ और बीजेपी के प्रति सद्भावना रही है। जैसे ही कई मसलों पर ममता ने बीजेपी की सरकार की कई बार सपोर्ट किया बंगाल के मुस्लिम बिदक गए। सागर दिघी सीट भी मुस्लिम बहुल है। अब तक ममता टीएमसी यहाँ से जीतती रही है। लेकिन जैसे ही ममता ने जीएसटी वगैरह मसले पर केंद्र सरकार का सपोर्ट किया मुस्लिम बिदक गए। अब जाकर ममता को यह सब बात समझ में आयी है।        
 सागर दिघी में हर के बाद तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राज्य के करीब 30 फीसदी अल्पसंख्यक वोटों की चिंता सता रही है। उनको लग रहा है कि भाजपा और संघ के प्रति सद्भाव दिखाने की उनकी रणनीति बैकफायर कर रही है। राज्य की मुस्लिम बहुल सागरदिघी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के हाथों मिली हार ने उनको बेचैन कर दिया है। तभी वे कांग्रेस पर भी भड़की थीं।              
हालांकि अब ऐसा लग रहा है कि उन्होंने भाजपा के साथ सद्भाव दिखाने की रणनीति छोड़ कर कांग्रेस की ओर हाथ बढ़ाया है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने सरकारी मदद और अन्य उपायों से अल्पसंख्यकों को खुश करने का प्रयास भी शुरू किया है। इसके लिए उन्होंने पहला काम यह किया है कि राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री को हटा दिया है।
              ममता बनर्जी ने अपनी सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहम्मद गुलाम रब्बानी को हटा कर दूसरे विभाग में भेज दिया है। अब अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय वे खुद संभालेंगी। यह ममता का बड़ा दांव हैं। ध्यान रहे ममता को मुस्लिम परस्त साबित करने के लिए भाजपा उनको ममता बानो कहती रही है।          
    अब अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय संभालने से भाजपा के लिए ऐसे आरोप लगाना और आसान हो जाएगा। लेकिन ममता को लग रहा है कि उनकी पहली चिंता 30 फीसदी वोट बचाने की है। तभी मंत्रालय संभालने के साथ ही उन्होंने अल्पसंख्यक विकास बोर्ड और प्रवासी मजदूर विकास बोर्ड बनाने का फैसला किया है। इसका काम भी वे खुद देखेंगी और साथ ही मदरसा शिक्षा का काम भी संभालेंगी।

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