पीएम मोदी का परिवारवाद पर हमला लेकिन बिहार -यूपी  में परिवारवादी पार्टियों से गठजोड़ !

0
113



अखिलेश अखिल 

चरित्रहीन राजनीति का सच यही है कि वह जो कहती है करती नहीं ,और जो करती है कहती नहीं। आजादी से पहले की राजनीति इतनी चरित्रहीन नहीं थी। लेकिन आज की राजनीति दोगलेपन की शिकार है। यहाँ का हर नेता दोहरे चरित्र में जीता है और दोहरे आचरण से लैस भी है। इसमें कोई शक नहीं की आजादी के बाद सत्ता की राजनीति करने का अवसर कांग्रेस को ही मिला। उसने बहुत से बेहतर काम भी किये हैं। आज देश में जो भी दीखता है वह सब कांग्रेस सरकार की ही देन है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि  कांग्रेस के शासन में ही देश में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार भी हुए। 80 के दशक से राजनीति गन्दी होती चली गई और कांग्रेस के नेताओं ने जी भर कर  लूटने का काम भी किया। लेकिन 80 के बाद की राजनीति में  दल ऐसा नहीं बचा है जिस पर भ्रष्टाचार के  डेग नहीं लगे हो। कितनी सरकार आयी और गई लेकिन पाक सफ कोई नहीं रही। किसी ने कम खाया तो किसी ने खूब खाया। केंद्र से लेकर राज्य की राजनीति एक ही ढर्रे पर चलती रही।    
   जब अटल की जी की सरकार थी ,तब भी भ्रष्टाचार का ही बोलबाला था। कितने लूट किये गए और किसने कितनी लूट की यह भी जनता जानती है। आज भी सत्ता में वही लोग है जो कभी दूसरे दलों में रहकर लूट का खेल करते थे। मौजूदा सरकार में कितनी लूट हुई है इसकी जानकारी अभी नहीं मिल सकती। जब दूसरी सरकार आएगी तब  इस सरकार के खेल का खुलासा होगा।    
लेकिन आज जरुरी है  परिवारवादी राजनीति पर चर्चा करने की। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल में लोकसभा चुनाव का बिगुल बजाते हुए परिवारवाद पर हमला बोला। उन्होंने कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों पर परिवार की राजनीति करने का तंज कसा। पीएम मोदी के भाषण के बाद यह तय हो गया कि आगामी विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में कॉमन सिविल कोड और राम मंदिर के साथ परिवारवाद और वंशवाद के मुद्दे साथ-साथ चलेंगे। नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के नेता राहुल, अखिलेश और तेजस्वी को वंशवाद की राजनीति के लिए टारगेट करेंगे। इस सिक्के का दूसरा पहलू बीजेपी के लिए गले की हड्डी से कम नहीं है। सच यह है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में बीजेपी जिन क्षेत्रीय दलों से चुनावी गठबंधन कर रही है, वह सभी परिवारवाद की राजनीति में गले तक डूबे हैं। बिहार और यूपी में बीजेपी के सभी सहयोगी दल परिवार तक ही सीमित हैं। जाति आधारित इन दलों के पास अपना वोट बैंक है, इस कारण पीएम मोदी और बीजेपी उन्हें इग्नोर नहीं कर सकते।           
     पार्टी विद द डिफरेंस के टैगलाइन के साथ जब बीजेपी ने अपना राजनीतिक सफर शुरू किया, तभी से परिवारवाद और जातिवाद का विरोध पार्टी के एजेंडे में शामिल हो गया। अटल-आडवाणी युग के बाद 2000 के बाद जब पार्टी में नई पीढी आई, तो बीजेपी पर भी वंशवाद के आरोप लगे। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल वसुंधरा राजे, दुष्यंत सिंह, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह, प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन और हुकुमदेव नारायण के बेटे अशोक यादव और अनुराग ठाकुर के नाम गिनवाने से नहीं चूकते। पार्टी के बाहर भी बीजेपी खुद परिवारवादी पार्टी से चुनावी समझौतों में कभी नहीं हिचकी। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र और पंजाब से हुई, जहां परिवारवादी पार्टी शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल से पर गठबंधन हुआ।
             अब हालात यह है कि बिहार के संभावित एलायंस पार्टनर हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा या लोजपा हो या यूपी का अपना दल और निषाद पार्टी, सभी पार्टी परिवार के भरोसे ही दम भर रही है। बिहार में लोजपा के चिराग पासवान अपने पिता रामविलास पासवान के वारिस हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल पशुपति कुमार पारस भी रामबिलास पासवान के भाई होने के कारण एनडीए में शामिल हुए। चिराग के चचेरे भाई प्रिंसराज पासवान भी पार्टी में परिवारवाद की कड़ी हैं। ऐसा ही हाल हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा  का है। जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन के इर्द-गिर्द हम पार्टी की राजनीति घूमती है। सन ऑफ मल्लाह मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) भी वन मैन,वन शो वाला दल है। उत्तरप्रदेश में बीजेपी गठबंधन के साथी भी परिवार वाली पार्टियां ही हैं। अपना दल (सोनेलाल) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल आज भी अपनी से पिता सोनेलाल पटेल की विरासत की लड़ाई लड़ रही हैं। बीजेपी के साथ गठबंधन का उन्हें काफी फायदा मिला। लोकसभा और विधानसभा में उन्हें एनडीए पार्टनर होने का फायदा मिला। निषाद पार्टी के अध्यक्ष निषाद खुद यूपी सरकार में मंत्री हैं और पुत्र प्रवीण निषाद भाजपा के सांसद हैं।
               बीजेपी की मजबूरी यह है कि बिहार और यूपी में इन पार्टियों के पास जाति का वोट बैंक है। जाति आधारित दल जीत की गारंटी नहीं बन सकते मगर वोट काटकर हराने का माद्दा रखते हैं। बिहार में 16 फीसदी दलित और 14 फीसदी मल्लाह वोटर हैं। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में लोजपा को जीत नहीं मिली। चिराग पासवान की पार्टी का वोट प्रतिशत 5.69 था। बीजेपी को 19.46 प्रतिशत वोट मिले थे। जेडीयू को 15.39 और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को 23.11 फीसदी वोट मिले। हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा को एक फीसदी से भी कम वोट मिले थे मगर चार सीटों पर जीत मिली थी। लोकसभा चुनाव 2019 के मुकाबले बीजेपी का वोट प्रतिशत विधानसभा चुनाव में कम हुआ था मगर सीटों की संख्या में बढोतरी हुई थी।
            उत्तर प्रदेश में भी अपना दल और निषाद पार्टी ने बीजेपी की जीत में भूमिका निभाई। यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में अपना दल और निषाद पार्टी ने पूर्वांचल में बीजेपी को अजेय बढ़त दिलाई। राष्ट्रीय पार्टी से गठबंधन का फायदा इन दोनों दलों को भी हुआ। निषाद पार्टी चुनाव में 10 सीटों पर लड़ी और 5 सीटों पर जीत गई, जबकि उसे सिर्फ 0.91 प्रतिशत वोट ही मिले थे। विधानसभा चुनाव में 17 सीटों पर लड़ने वाली अपना दल को 12 सीटों पर जीत मिली, जबकि उसे 1.62 फीसदी वोट मिले थे। यूपी में 6 प्रतिशत पटेल वोटर हैं जबकि ओबीसी की आबादी में निषाद जाति का हिस्सा 18 प्रतिशत है, जो 13 लोकसभा सीटों पर निर्णायक हैं। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here