बीरेंद्र कुमार झा
भारतीय सेना के पराक्रम का लोहा पूरी दुनिया मानती है। मई 1999 में पाकिस्तान की तरफ से हुई युद्ध की पहल के बाद भारतीय सेना ने उसे ऐसी धूल चटाई थी कि पाकिस्तान का सिर शर्म से झुक गया था। हाल यह था कि पाकिस्तान ने अपने बहुत सारे सैनिकों का शव लेने से भी इनकार कर दिया था। कारगिल के युद्ध में भारतीय सैनिकों की शोर्य गाथाएं हमेशा याद की जाती रहेंगी। 26 जुलाई का ही वह दिन था, जब भारतीय सेना ने टाइगर हिल फतह करने के साथ ऑपरेशन को खत्म करने का ऐलान कर दिया था। इस बार देश 24 वा कारगिल विजय दिवस मना रहा है।
पाकिस्तानी सैनिकों ने की थी घुसपैठ
पाकिस्तानी सैनिक कारगिल में घुसपैठ की तैयारी काफी पहले ही से कर रहे थे, जबकि भारतीय सेना को इस बात की भनक तक भी नहीं थी। 3 मई 1999 को भारतीय सेना को इस बात की जानकारी चरवाहों की मदद से मिली। पाकिस्तानी सैनिक नार्दन लाइट इन्फेंट्री के कैप्टन इफ्तेखार कारगिल की अहम चौकी पर पहुंच गए थे।एक दिन वहां से गुजर रहे कुछ चरवाहों की नजर उन पर पड़ी तो इसकी जानकारी उन चरवाहों ने भारतीय सेना को दी। इसके बाद चरवाहों के साथ सैनिक वहां पहुंचे और पूरे इलाके का मुआयना किया। हेलीकॉप्टर से जांच के दौरान पता चला कि पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए हैं।
1999तक भारतीय सेना की यहां सिर्फ एक ब्रिगेड तैनात रहती थी। वहीं ठंड के मौसम में दोनों ही तरफ की सेनाएं यहां से पीछे हट जाती थी। चोटियों की ऊंचाई 14 हजार से 18 हजार फीट है। पाकिस्तानी सेना एलओसी से करीब 10 किलोमीटर तक अंदर आ गई थी और सर्दियों में खाली छिड़ी हुई चोटियों पर अपने लिए बंकर बना लिया। 3 मई को जब भारतीय सैनिक वहां पहुंचे तो उन्हें भी बंदी बना लिया गया।
भारतीय सेना का कारगिल विजय अभियान
सबसे पहले भारत की सेना को तोलोलिंग चोटी फतह करने का टास्क दिया गया था।लेफ्टिनेंट जनरल महेंद्र पुरी के नेतृत्व में पहली कोशिश असफल हो गई ।इसके बाद दो राजपूताना राइफल्स को इसकी जिम्मेवारी सौंपी गई। इस चोटी पर कोबरा दिगेंद्र सिंह ने अकेले ही 48 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था। कैप्टन विजयंत का भी इस चोटी को फतह करने में हम योगदान माना जाता है। 13 जून तक इस चोटी पर भारतीय सेना ने फतह हासिल कर ली।
8 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर तिरंगा लहराया जो कि बहुत अहम था। इस युद्ध में बहादुरी के साथ लड़ते हुए कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद हो गए लेकिन उन्होंने प्वाइंट 5140 की चोटी फतह करवा दी। टाइगर हिल के बाद बटालिक सेक्टर के जुगाड़ हिल पर भारतीय सेना ने कब्जा किया। इस हिल पर मेजर सरवन शहीद हुए थे। 2 महीने चले इस युद्ध में भारत के 527 सैनिक शहीद हुए थे,वहीं पाकिस्तान के शवों की गिनती भी नहीं की जा सकी।
पाकिस्तान ने शव लेने से भी कर दिया था इंकार
युद्ध खत्म होने के बाद सेना के बंकरो और खाइयो में पाकिस्तानी सैनिकों के शव पड़े थे। भारतीय सेना ने इसकी पहचान शुरू की। सैनिकों के बैग और जेब में पड़े कागजों से पहचान की जा रही थी। पाकिस्तान नहीं चाहता था कि वह बताएं कि उसे कितनी बड़ी क्षति हुई है। इसे छिपाने के लिए उसने अपने सैनिकों की परवाह नहीं की। उसने केवल 5 शवों को स्वीकार किया। इसमें कैप्टन कर्ल शेर खान का शव भी शामिल था, जिन्हें पाकिस्तानी सेना ने सर्वोच्च पुरस्कार निशान ए हैदर से नवाजा था।कहा जाता है कि भारतीय सेना ने शेर खान की जेब में लिखकर रख दिया था कि ये बहुत बहादुरी से लड़े।

