जेनज़ी लॉयर्स एसोसिएशन ने न्यायिक सुधारों के लिए देशव्यापी आंदोलन का किया ऐलान

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“न्याय व्यवस्था ठीक तो सब कुछ ठीक” आंदोलन का मूलमंत्र; देश के विभिन्न राज्यों और शहरों में रैलियों के बाद जंतर-मंतर पर होगा देशव्यापी महासंगठन

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज करने की मांग; न्यायिक भ्रष्टाचार, गंभीर कदाचार और न्यायिक शक्तियों के दुरुपयोग से जुड़ी शिकायतों के लिए स्वतंत्र, पारदर्शी और समयबद्ध व्यवस्था बनाने की मांग

आंदोलन को देश-विदेश के विभिन्न संगठनों का समर्थन

GenZ Lawyers Association (GZLA) ने देश की न्याय व्यवस्था में व्यापक और समयबद्ध सुधार, अधिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही, अधिवक्ताओं और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा तथा न्यायिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के विरुद्ध गंभीर कदाचार अथवा आपराधिक कृत्यों की शिकायतों के निवारण के लिए एक स्पष्ट, स्वतंत्र और प्रभावी व्यवस्था की मांग को लेकर देशव्यापी आंदोलन की घोषणा की है।
यह आंदोलन चरणबद्ध तरीके से चलाया जाएगा। प्रथम चरण में मुंबई में लगभग 5,000 अधिवक्ताओं की विशाल बाइक और कार रैली आयोजित करने की योजना है। इसके बाद देश के विभिन्न राज्यों और प्रमुख शहरों में इसी प्रकार की शांतिपूर्ण रैलियां, अधिवक्ता सम्मेलन और जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

अंतिम चरण में देशभर के अधिवक्ता और अन्य प्रतिभागी नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विशाल शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए एकत्र होंगे और न्यायिक सुधारों से संबंधित अपनी मांगें केंद्र सरकार एवं संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों के समक्ष रखेंगे।

इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन का मुख्य संदेश होगा: “न्यायपालिका ठीक तो सब ठीक।”

GZLA का कहना है कि एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह न्यायपालिका संवैधानिक लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है। इसलिए न्यायिक सुधारों की मांग को न्यायपालिका के विरोध के रूप में नहीं, बल्कि न्यायपालिका को और अधिक मजबूत तथा जनता के प्रति विश्वसनीय बनाने के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।

जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ तत्काल FIR और स्वतंत्र जांच की मांग
इस राष्ट्रव्यापी अभियान के प्रमुख मुद्दों में GZLA ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज करने तथा जांच के दौरान जिन अन्य व्यक्तियों की भूमिका सामने आए, उनके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई करने की मांग की है।

एसोसिएशन ने इस मामले में निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध आपराधिक जांच की मांग करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति का पद या संवैधानिक हैसियत अपने आप में सामान्य आपराधिक कानून के संचालन को रोकने का आधार नहीं बन सकती।

GZLA ने स्पष्ट किया है कि उसकी मांग FIR, स्वतंत्र जांच और विधि-सम्मत प्रक्रिया की है और किसी व्यक्ति की अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण सक्षम न्यायालय द्वारा कानून के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

एसोसिएशन ने जस्टिस यशवंत वर्मा प्रकरण में राज्य तंत्र द्वारा पर्याप्त तत्परता से आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई न किए जाने पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। GZLA के अनुसार, यह प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि देश में न्यायाधीशों के विरुद्ध आपराधिक शिकायतों के संबंध में एक स्पष्ट और समयबद्ध वैधानिक प्रक्रिया की तत्काल आवश्यकता है।

सिर्फ एक जज का मामला नहीं—पूरी व्यवस्था में सुधार की मांग
GZLA ने स्पष्ट किया है कि उसका आंदोलन किसी एक न्यायाधीश या किसी एक मामले तक सीमित नहीं है।

एसोसिएशन ने ऐसे न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध भी प्रभावी कार्रवाई की मांग की है जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार, बेईमानी, गंभीर न्यायिक अथवा व्यावसायिक कदाचार, न्यायिक शक्तियों के जानबूझकर दुरुपयोग, अधिवक्ताओं अथवा पक्षकारों के साथ लगातार अपमानजनक या डराने वाले व्यवहार अथवा न्यायिक पद की गरिमा के प्रतिकूल आचरण के विश्वसनीय और प्रमाण-समर्थित आरोप सामने आते हैं।

GZLA के अनुसार, ऐसी शिकायतों को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वे किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध हैं। उसी प्रकार केवल शिकायत किए जाने के आधार पर किसी न्यायाधीश को दोषी भी नहीं माना जा सकता।

इसलिए एक ऐसी स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच व्यवस्था होनी चाहिए जो दुर्भावनापूर्ण अथवा निराधार शिकायतों और वास्तविक एवं गंभीर शिकायतों के बीच अंतर कर सके।

जहां केवल न्यायिक कदाचार सामने आए, वहां उचित प्रशासनिक अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई हो और जहां प्रथम दृष्टया आपराधिक अपराध का मामला सामने आए, वहां कानून के अनुसार आपराधिक जांच और अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।

“Judicial Independence का अर्थ Accountability से मुक्ति नहीं”
GZLA का कहना है कि न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी सिद्धांत नहीं हैं।

न्यायिक स्वतंत्रता का उद्देश्य न्यायाधीशों को बाहरी दबाव से मुक्त रखकर उन्हें निर्भीक और निष्पक्ष रूप से कानून के अनुसार निर्णय लेने में सक्षम बनाना है। लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता को गंभीर कदाचार अथवा कानून-विरुद्ध आचरण के लिए जवाबदेही से पूर्ण संरक्षण के रूप में नहीं देखा जा सकता।

एसोसिएशन ने इसलिए दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों के बीच संतुलन की मांग की है—ईमानदार और निष्पक्ष न्यायाधीशों को झूठी, दुर्भावनापूर्ण तथा दबाव बनाने वाली शिकायतों से पूर्ण सुरक्षा मिले, लेकिन साथ ही वास्तविक न्यायिक कदाचार, भ्रष्टाचार अथवा गंभीर शक्ति-दुरुपयोग से पीड़ित नागरिक और अधिवक्ता भी उपचार-विहीन न रहें।

न्यायाधीशों के खिलाफ आपराधिक शिकायत के लिए स्पष्ट व्यवस्था की मांग
GZLA के राष्ट्रव्यापी आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में से एक है कि देश में न्यायाधीशों तथा न्यायिक और अर्ध-न्यायिक ट्रिब्यूनलों के सदस्यों के विरुद्ध शिकायतों के निवारण के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी, स्वतंत्र, सरल और समयबद्ध वैधानिक व्यवस्था बनाई जाए।

एसोसिएशन के अनुसार, वर्तमान प्रक्रिया आम नागरिक की दृष्टि से अत्यंत जटिल और बिखरी हुई दिखाई देती है।

एक सामान्य नागरिक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों, न्यायिक निर्णयों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं तथा अनुमति या मंजूरी से जुड़े जटिल कानूनी प्रश्नों को समझने के बाद यह तय करे कि उसे अपनी शिकायत आखिर किस अधिकारी के पास देनी है और उस शिकायत पर कार्रवाई करने की कानूनी जिम्मेदारी किसकी है।

GZLA की मांग है कि एक ऐसा स्पष्ट मंच बनाया जाए जहां कोई भी नागरिक या अधिवक्ता अपने पास उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के साथ शिकायत प्रस्तुत कर सके और उस शिकायत पर निर्धारित समय-सीमा के भीतर निर्णय लेना संबंधित प्राधिकारी की कानूनी जिम्मेदारी हो।

प्रस्तावित व्यवस्था में क्या होना चाहिए?
GZLA के अनुसार प्रस्तावित न्यायिक जवाबदेही व्यवस्था में कम-से-कम निम्नलिखित प्रावधान होने चाहिए:

(i) वर्तमान और पूर्व न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत प्राप्त करने के लिए एक स्पष्ट रूप से नामित स्वतंत्र प्राधिकारी;

(ii) शिकायत की प्रारंभिक जांच के लिए निश्चित समय-सीमा;

(iii) प्रथम दृष्टया विश्वसनीय सामग्री पाए जाने पर स्वतंत्र जांच;

(iv) झूठी, दुर्भावनापूर्ण और दबाव बनाने वाली शिकायतों से न्यायाधीशों की सुरक्षा;

(v) प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध सामने आने पर सक्षम जांच एजेंसी को मामला सौंपने की स्पष्ट व्यवस्था;

(vi) ऐसा कदाचार जो आपराधिक अपराध न हो, उसमें उचित प्रशासनिक अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई;

(vii) प्रत्येक शिकायत पर समयबद्ध और कारणयुक्त निर्णय;

(viii) संबंधित प्राधिकारी द्वारा अनुचित निष्क्रियता की स्थिति में प्रभावी अपील अथवा अन्य उपचार; और

(ix) अत्यंत गंभीर मामलों में, जहां जारी कार्यवाही से किसी नागरिक को अपूरणीय क्षति होने की आशंका हो, कानून के अनुसार उचित अंतरिम अथवा सुधारात्मक राहत की व्यवस्था।

अधिवक्ताओं और नागरिकों को तत्काल शिकायत के लिए प्रभावी मंच मिले
GZLA ने उन परिस्थितियों पर भी चिंता व्यक्त की है जहां कोई अधिवक्ता अथवा पक्षकार चल रही न्यायिक कार्यवाही में गंभीर और तत्काल अन्याय अथवा न्यायिक शक्ति के दुरुपयोग की शिकायत करता है, लेकिन उसके पास तत्काल और प्रभावी शिकायत निवारण का कोई सरल मंच उपलब्ध नहीं होता।

एसोसिएशन का कहना है कि सामान्य न्यायिक त्रुटियों के लिए अपील, पुनरीक्षण और अन्य वैधानिक उपचार उपलब्ध हैं और नई व्यवस्था उनका विकल्प नहीं होनी चाहिए।

लेकिन जहां शिकायत किसी सामान्य गलत आदेश से आगे बढ़कर गंभीर कदाचार, भ्रष्टाचार, जानबूझकर शक्ति के दुरुपयोग अथवा अन्य गंभीर अनुचित आचरण की हो, वहां शिकायतकर्ता को केवल वर्षों तक मुकदमा समाप्त होने की प्रतीक्षा करने के लिए मजबूर करना हर परिस्थिति में पर्याप्त समाधान नहीं हो सकता।

इसलिए GZLA ने ऐसी गंभीर शिकायतों के लिए त्वरित, स्वतंत्र और विधिसम्मत grievance-redressal mechanism की मांग की है।

अपराध सामने आने पर राज्य मूकदर्शक नहीं रह सकता—GZLA
GZLA का कहना है कि आपराधिक कानून लागू करने की पूरी जिम्मेदारी किसी व्यक्तिगत नागरिक पर नहीं डाली जा सकती।

जहां सक्षम सरकारी अथवा जांच प्राधिकारियों के समक्ष विश्वसनीय सामग्री आती है और वह सामग्री प्रथम दृष्टया किसी संज्ञेय अपराध की ओर संकेत करती है, वहां संबंधित अधिकारियों को कानून के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।

GZLA ने जस्टिस यशवंत वर्मा प्रकरण का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया है कि इस मामले में राज्य तंत्र की प्रतिक्रिया अपेक्षित तत्परता के अनुरूप नहीं रही। एसोसिएशन ने मांग की है कि भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो, इसके लिए संबंधित अधिकारियों की स्पष्ट जिम्मेदारी, जवाबदेही और कार्रवाई की निश्चित समय-सीमा कानून में तय की जाए।

GZLA का कहना है:

“कानून के समक्ष समानता तभी वास्तविक होगी जब कानून शक्तिशाली और सामान्य नागरिक—दोनों पर समान सिद्धांतों के आधार पर लागू हो।”

कोर्टरूम में अधिवक्ताओं और पक्षकारों की गरिमा की सुरक्षा भी बनेगा आंदोलन का मुद्दा
न्यायिक सुधार अभियान में अधिवक्ताओं और पक्षकारों के साथ न्यायालयों में होने वाले व्यवहार को भी प्रमुख मुद्दा बनाया जाएगा।
GZLA का कहना है कि न्यायिक पद के साथ अत्यधिक शक्ति और जिम्मेदारी जुड़ी होती है और इसलिए न्यायिक अधिकारियों से संयम, धैर्य, निष्पक्षता, शिष्टाचार और गरिमापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।

एसोसिएशन ने अधिवक्ताओं अथवा पक्षकारों के बार-बार अपमान, धमकीपूर्ण या अपमानजनक व्यवहार, सुनवाई का उचित अवसर न देने अथवा उनकी गरिमा को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाले आचरण की शिकायतों के लिए भी प्रभावी व्यवस्था की मांग की है।

हालांकि, GZLA ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसी व्यवस्था का उपयोग किसी प्रतिकूल न्यायिक आदेश को चुनौती देने अथवा न्यायालय के वैध अनुशासन को कमजोर करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

उद्देश्य Bench और Bar के बीच परस्पर सम्मान को मजबूत करना और न्याय-प्रशासन की गुणवत्ता में सुधार करना होना चाहिए।

 

पहला चरण: मुंबई में 5,000 वकीलों की बाइक और कार रैली

देशव्यापी आंदोलन का पहला बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम मुंबई में लगभग 5,000 अधिवक्ताओं की विशाल बाइक और कार रैली के रूप में आयोजित करने की योजना है।

इस कार्यक्रम में विभिन्न बार एसोसिएशनों, युवा अधिवक्ताओं और कानूनी संगठनों के सदस्यों को शामिल होने का आह्वान किया जाएगा।

GZLA ने स्पष्ट किया है कि मुंबई की रैली केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होगी, बल्कि देशव्यापी न्यायिक सुधार आंदोलन की शुरुआत होगी।

 

मुंबई के बाद अलग-अलग राज्यों में आंदोलन, अंतिम पड़ाव जंतर-मंतर
मुंबई के बाद अभियान का विस्तार देश के विभिन्न राज्यों और प्रमुख शहरों में किया जाएगा।

विभिन्न स्थानों पर शांतिपूर्ण रैलियां, अधिवक्ता सम्मेलन, जन-जागरूकता कार्यक्रम और न्यायिक सुधारों पर विचार-विमर्श आयोजित किए जाएंगे।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से अधिवक्ताओं और नागरिकों से सुझाव भी एकत्र किए जाएंगे ताकि न्यायिक जवाबदेही और शिकायत निवारण के लिए एक व्यापक सुधार प्रस्ताव संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों के समक्ष रखा जा सके।

इसके बाद आंदोलन अपने अंतिम बड़े चरण में पहुंचेगा, जहां देश के विभिन्न हिस्सों से अधिवक्ता और अन्य प्रतिभागी:

जंतर-मंतर, नई दिल्ली
पर एक विशाल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में एकत्र होंगे।

GZLA के अनुसार, आंदोलन का उद्देश्य व्यक्तिगत शिकायतों को संवैधानिक और लोकतांत्रिक माध्यम से संस्थागत सुधार की राष्ट्रीय मांग में परिवर्तित करना है।

GZLA ने अपने आंदोलन का केंद्रीय संदेश रखा है:

“Judiciary Theek Toh Sab Theek”
“न्यायपालिका ठीक तो सब ठीक।”
एसोसिएशन का कहना है कि नागरिक के लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी अधिकार की अंतिम सुरक्षा न्यायपालिका पर निर्भर करती है।

चाहे मामला जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, संपत्ति, व्यापार, रोजगार, पारिवारिक अधिकार, सरकारी कार्रवाई अथवा मौलिक अधिकारों का हो—अंततः नागरिक न्याय के लिए न्यायालय की ओर देखता है।

इसलिए ऐसी न्यायपालिका जो अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी, जवाबदेह, सुलभ, समयबद्ध और नागरिक-अनुकूल हो, वह केवल न्याय व्यवस्था को ही नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र को मजबूत करती है।

“तुम देखोगे अपनी आँखों से, हम आ रहे हैं लाखों से”
आंदोलन के लिए GZLA ने एक और जन-मोबिलाइजेशन नारा दिया है:

“तुम देखोगे अपनी आँखों से,
हम आ रहे हैं लाखों से।”

एसोसिएशन के अनुसार, यह नारा देशभर के अधिवक्ताओं और नागरिकों को शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से न्यायिक सुधारों के लिए एकजुट करने के संकल्प का प्रतीक है।

 

“न्यायपालिका को कमजोर नहीं, और मजबूत करना आंदोलन का उद्देश्य” — GZLA

GZLA ने विशेष रूप से स्पष्ट किया है कि यह अभियान न्यायपालिका अथवा न्यायाधीशों के विरुद्ध आंदोलन नहीं है।

एसोसिएशन का कहना है कि बड़ी संख्या में न्यायिक अधिकारी अत्यधिक कार्यभार और सीमित संसाधनों के बीच महत्वपूर्ण संवैधानिक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इसलिए वास्तविक न्यायिक सुधारों में न्यायाधीशों की रिक्तियां भरना, न्यायिक बुनियादी ढांचा बढ़ाना, लंबित मामलों को कम करना, तकनीकी सुविधाओं का विस्तार और न्यायिक अधिकारियों की कार्य परिस्थितियों में सुधार भी शामिल होना चाहिए।

लेकिन संस्था के सम्मान का अर्थ यह नहीं हो सकता कि गंभीर और विश्वसनीय शिकायतों पर कोई सवाल ही न उठाया जाए।

GZLA के अनुसार:

“Judicial Independence एक ईमानदार न्यायाधीश को बाहरी दबाव से बचाती है, जबकि Judicial Accountability नागरिक और स्वयं न्यायपालिका को शक्ति के दुरुपयोग से बचाती है। मजबूत न्यायपालिका के लिए दोनों आवश्यक हैं।”

GenZ Lawyers Association ने देशभर के अधिवक्ताओं से इस शांतिपूर्ण, अनुशासित, लोकतांत्रिक और संविधान-सम्मत न्यायिक सुधार आंदोलन से जुड़ने का आह्वान किया है।

मुंबई में प्रस्तावित बाइक एवं कार रैली की तारीख और मार्ग, राज्यवार कार्यक्रम तथा जंतर-मंतर पर होने वाले अंतिम राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की विस्तृत घोषणा GZLA द्वारा अलग से की जाएगी।

 

इस देशव्यापी आंदोलन को विभिन्न सामाजिक एवं कानूनी संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, RTI कार्यकर्ताओं, SSR Warriors तथा विभिन्न क्षेत्रों के सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन प्राप्त हो रहा है। आने वाले समय में यह आंदोलन एक व्यापक महाजनआंदोलन का स्वरूप धारण करेगा, ऐसा विश्वास व्यक्त किया गया है।

“न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और आम नागरिक को समय पर न्याय मिलने की गारंटी नए भारत के राष्ट्रनिर्माण की बुनियादी आवश्यकता है। यह आंदोलन केवल न्यायिक सुधारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के भविष्य में सकारात्मक और ऐतिहासिक परिवर्तन लाने तथा एक नई और मजबूत राष्ट्रनिर्माण प्रक्रिया को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा,” ऐसी जानकारी Indian Bar Association के Chairman अधिवक्ता निलेश ओझा ने दी।

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