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लिपुंगा जंगल में कोबरा और नक्सलियों के बीच भिड़ंत में मारे गए चार इनामी नक्सली !

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न्यूज़ डेस्क 
आज झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के लिपुंगा जंगल में नक्सलियों और सीआरपीएफ के कोबरा के बीच मुठभेड़ में चार हार्ड कोर नक्सली के मारे जाने की खबर है। दो इनामी नक्सली गिरफ्तार भी हुए हैं इसके साथ ही इन नक्सलियों से बड़ी संख्या में हथियार भी बरामद होने की खबर है। इन नक्सलियों पर 25 लाख रुपये का इनाम था। 

बता दें कि इन नक्सलियों ने 9 माह पहले सीआरपीएफ कोबरा के एक जवान को ‘एम्बुश’ में धोखे से मार डाला था। कोबरा कमांडो, लंबे समय से इन नक्सलियों की तलाश में थे।आज कोबरा कमांडो ने अपने जवान का बदला ले लिया है।

मारे गए नक्सलियों में सब जोनल कमेटी मेंबर कांडे होनहागा उर्फ दिरशुम, एरिया कमेटी मेंबर सिंगराई उर्फ मनोज, एलजीएसएम सूर्या उर्फ मुंडा देवगम और महिला नक्सली जोंगा तुर्की शामिल हैं। नक्सलियों के कब्जे से दो एसएलआर, एक इंसास और दो 303 राइफल बरामद की गई हैं। गिरफ्तार किए गए दो नक्सलियों में टाइगर उर्फ पांडू हांसदा और बातरी देवगम शामिल है।  

कोबरा कमांडो के बारे में कहा जाता है कि वे अपनी साथी के लिए जान की बाजी लगा देते हैं। इस मुठभेड़ में कोबरा का वह ‘जज्बा और साहस’ देखने को मिला है। 209 कोबरा बटालियन ने जिन नक्सलियों को मार गिराया है, वे सभी वही नक्सली थे, जिन्होंने लगभग 9 महीने पहले कोबरा कमांडो राजेश को एक एंबुश में धोखे से मारा था।

साल 2015 में गणतंत्र दिवस की परेड में पहली बार सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो राष्ट्र के सामने आए थे। कोबरा यूनिट का गठन करने से पहले यूएस मरीन कमांडो, उनकी ट्रेनिंग, वर्किंग स्टाइल, सर्जिकल स्ट्राइक और दूसरे कई तरह के ऑपरेशन की जानकारी ली गई। इन सबके बाद ही कोबरा यूनिट स्थापित हुई थी।

यह विशिष्ट कमांडो फोर्स जंगल में बिना किसी मदद के 11 दिन तक लड़ सकती है। इसी वजह से कोबरा विश्व में पहले स्थान पर है। नक्सलियों, आतंकियों से लड़ने और दूसरे बड़े ऑपरेशनों के लिए इस विशिष्ट फोर्स को खास तरह की ट्रेनिंग दी गई है। हथियार, वर्दी एवं तकनीकी उपकरणों के मामले में भी ‘कोबरा’ दूसरे सभी बलों से पूरी तरह अलग है। बिना किसी मदद के लगातार डेढ़ सप्ताह तक जंगलों में लड़ते रहना इस फोर्स की खासियत है।

वैश्विक आतंकी संगठन, अलकायदा सरगना लादेन को मार गिराने वाले यूएस मरीन कमांडो बिना किसी मदद के जंगल में लगातार तीन रातों तक लड़ सकते हैं। दूसरी ओर कोबरा के हर जवान के लिए ट्रेनिंग के दौरान सात दिन तक जंगल में लड़ने की परीक्षा पास करना अनिवार्य है।

कोबरा ने सारंडा के घने जंगलों में 11 दिन तक बिना किसी सहायता के एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया था। वजन लेकर जंगल में नियमित रूप से लड़ते रहने का रिकॉर्ड ब्रिटेन के विशिष्ट कमांडो दस्ते ‘एसएएस’ के नाम पर है। यह दस्ता 30 किलो वजन उठाकर दस रातें जंगल में गुजार सकता है, जबकि कोबरा 23 किलो वजन के साथ 11 रातों तक गहन जंगल से गुजरने में समर्थ है।

चूंकि कोबरा को बाहर से कोई मदद नहीं मिलती, इसलिए इन्हें खास प्रशिक्षण दिया जाता है। मैगी जैसी कोई खाद्य सामग्री इन्हें प्रदान की जाती है। पानी की बोतल को झरने या तालाब से भरना पड़ता है। खाने का सामान खत्म हो जाता है, तो जंगली सामग्री से काम चलाना पड़ेगा। जवानों को ट्रेनिंग में कई जंगली वनस्पतियों की जानकारी दी जाती है। कोबरा कमांडो अपने जूते और वर्दी एक मिनट के लिए भी नहीं उतारते।

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