जून का महीना भारतीय राजनीति में पालाबदल वाला दिख रहा है। बीते दिनों बंगाल की सत्ता खोने वाली टीएमसी के 20 सांसदों ने त्रिपुरा की एक अनजान सी पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया का दामन थाम लिया था। इसके बाद इन सांसदों की ओर से संसद में होने वाली किसी भी वोटिंग में एनडीए का ही साथ दिए जाने की बात ही जा रही है।यही नहीं अब महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन टाइगर’ के चर्चे हैं। उद्धव गुट के 9 में से 6 सांसदों के साथ छोड़ने के कयास लग रहे हैं और हालात ऐसे हैं कि सांसदों को साधने के लिए आज ही दिल्ली में उद्धव सेना की मीटिंग है।
अब यदि यह गुट अलग होकर एकनाथ शिंदे के साथ जाता है तो उद्धव सेना काफी कमजोर हो जाएगी। वहीं इसका असर महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि दिल्ली से बिहार तक दिखेगा।चर्चाएं तेज हो गई हैं कि आखिर कैसे इस घटनाक्रम के चलते दिल्ली के पावर बैलेंस में जेडीयू कमजोर हो सकती है।यही नहीं आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी टीडीपी पर भी एनडीए सरकार की निर्भरता कम होगी। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अपने दम पर 240 सीटें ही मिल पाई थीं।ऐसे में केंद्र सरकार में जेडीयू और टीडीपी की भूमिका बेहद अहम हो गई थी। अब जबकि बीजेपी के पास टीएमसी के 20 बागी सांसदों और उद्धव सेना के 6 अन्य सांसदों का समर्थन आ जाता है तो फिर जेडीयू और टीडीपी पर उसकी निर्भरता पहले जैसी नहीं रहेगी।
नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू बीते करीब दो दशकों से बिहार की राजनीति में सीनियर पार्टनर थी।लेकिन इसी साल नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद बने हैं और बीजेपी के सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद संभाल लिया है। इस तरह बिहार में ड्राइविंग सीट पर अब बीजेपी है।12 लोकसभा सांसदों वाली जेडीयू की दिल्ली में भूमिका अहम मानी जा रही थी, लेकिन अब यदि बीजेपी ने दूसरे दलों के जरिए अपनी सरकार ताकत बढ़ा ली है तो फिर जेडीयू पर उसकी निर्भरता भी कम होगी।
ऐसी ही स्थिति चंद्रबाबू नायडू की भी होगी, जिनके 16 सांसद हैं। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के दो साल ही पूरे हुए हैं और अगले तीन साल के लिए दूसरे दलों के सांसदों के जरिए उसके अपनी ताकत बढ़ा ली है।इससे एनडीए सरकार स्थिर भी रहेगी और मजबूत भी रह सकेगी।

