किसी मरीज को जब डॉक्टर डायलिसिस की सलाह देते हैं, तो परिवार के मन में सबसे पहला सवाल अक्सर यही आता है कि क्या अब किडनी पूरी तरह खराब हो चुकी है? इसका जवाब हमेशा “हां” नहीं होता। डायलिसिस ऐसा मेडिकल ट्रीटमेंट है जो उस समय शरीर की मदद करती है, जब किडनी ब्लड से वेस्ट प्रोडक्ट और एक्ट्रा फ्लुइड को पर्याप्त रूप से बाहर नहीं निकाल पाती। यह स्थिति क्रोनिक किडनी डिजीज के आखिरी चरण में हो सकती है, लेकिन अचानक हुई एक्यूट किडनी इंजरी में भी कुछ समय के लिए डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए डायलिसिस शुरू होना और किडनी का पूरी तरह काम करना बंद होना एक ही बात नहीं है।
एनआईएच के अनुसार हमारी दोनों किडनियां शरीर के खून को लगातार फिल्टर करनी है। यह वेस्ट प्रोडक्ट यानी शरीर की गंदगी और अतिरिक्त फ्लुइड जैसे पानी को बाहर निकालने के साथ-साथ शरीर में सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम और दूसरे मिनरल्स का संतुलन बनाए रखने में भी मदद करती हैं। किडनी शरीर में बनने वाले एसिड को बाहर निकालने और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी भूमिका निभाती है।
जब किडनी यह काम पर्याप्त रूप से नहीं कर पाती, तो ब्लड में गंदगी और एक्ट्रा फ्लुइड जमा होने लगते हैं। ऐसे समय डायलिसिस किडनी के कुछ जरूरी काम को अस्थायी या लंबे समय तक संभालने में मदद करती है।डायलिसिस का सबसे आम तरीका हेमोडायलिसिस (Hemodialysis) और पेरिटोनियल डायलिसिस (Peritoneal Dialysis) हैं। हेमोडायलिसिस में ब्लड को शरीर के बाहर एक खास फिल्टर यानी डायलाइजर (Dialyzer) से गुजारा जाता है और फिर साफ ब्लड शरीर में वापस पहुंचाया जाता है। वहीं पेरिटोनियल डायलिसिस में पेट की अंदरूनी परत यानी पेरिटोनियल को फिल्टर की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
एनआईएच के अनुसार जब किडनी की फिल्टर करने की क्षमता काफी कम हो जाती है, तो शरीर में कई तरह के बदलाव शुरू हो सकते हैं। ब्लड में यूरिया और दूसरे वेस्ट प्रोडक्ट बढ़ने लगते हैं। शरीर में एक्ट्रा फ्लुइड जमा हो सकता है, जिससे पैरों या चेहरे पर सूजन, वजन बढ़ना और कुछ मामलों में सांस लेने में परेशानी हो सकती है। किडनी के खराब फंक्शन का असर पोटेशियम और एसिड बेस्ड बैलेंस पर भी पड़ सकता है। खासकर बहुत ज्यादा पोटेशयिम यानी हाइपरकेल्मिया (Hyperkalemia) गंभीर स्थिति हो सकती है, क्योंकि इससे हार्ट रिदम प्रभावित हो सकती है।
डायलिसिस शुरू होने का मतलब किडनी ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया है?जरूरी नहीं। यही Dialysis को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक है। एनसीबीआई के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय से क्रोनिक किडनी डिजीज है और उसकी किडनी फंक्शन इतनी कम हो गई है कि शरीर में वेस्ट, फ्लुइड और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो रहा है, तो लंबे समय तक डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है। किडनी फेलियर आमतौर पर तब कहा जाता है जब किडनी फंक्शन सामान्य के लगभग 15 प्रतिशत से कम रह जाए।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किडनी में बिल्कुल भी फंक्शन बाकी नहीं है। डायलिसिस किडनी के कुछ काम को बाहर से संभालती है, जबकि किडनी में बची हुई फंक्शन कुछ हद तक काम करती रह सकती है।
नेशनल किडनी फाउडेशन के अनुसार एक्यूट किडनी इंजरी ऐसी स्थिति है जिसमें किडनी फंक्शन कुछ घंटों या दिनों में अचानक खराब हो जाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे गंभीर इंफेक्शन, बहुत ज्यादा फ्लुइड लॉस, कुछ मेडिसिन्स या किडनी को नुकसान पहुंचाने वाली स्थितियां।
डायलिसिस किडनी फेलियर के गंभीर मामलों में जीवन बचाने वाला इलाज हो सकता है, लेकिन डायलिसिस लगना हमेशा यह साबित नहीं करता कि किडनी ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया है। क्रोनिक किडनी डायलिसिस में यह लंबे समय की जरूरत हो सकती है, जबकि एक्यूट किडनी इंजरी में कई मरीजों को कुछ समय के लिए डायलिसिस की जरूरत पड़ती है और किडनी फंक्शन सुधरने पर इसे बंद किया जा सकता है।
इसलिए डायलिसिस की जरूरत का फैसला केवल क्रिएटिनिन की रिपोर्ट देखकर नहीं, बल्कि मरीज की पूरी क्लीनिकल कंडिशन, किडनी फंक्शन, यूरिन आउटपुट, इलेक्ट्रोलाइट्स, फ्लुइड बैलेंस और बीमारी के कारण को देखकर नेफ्रोलॉजिस्ट करता है।

