‘दिमागी नक्सल’ बनना फैशन या खतरे की घंटी? माओ, स्टालिन और पोल पॉट का खूनी इतिहास जानिए

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मयंक जैन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर सक्रिय Gen Z के एक वर्ग ने ‘नक्सल’ शब्द को नए तरीके से अपनाना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर खुद को ‘दिमागी नक्सल पार्टी’ कहने वाला एक ऑनलाइन समूह सामने आया, जिसका नारा है— “Think | Research | Resist” यानी “सोचो | शोध करो | विरोध करो।” यह घटनाक्रम इससे पहले सामने आए Cockroach Janta Party (CJP) के बाद देखने को मिला और इसकी शैली भी युवाओं को केंद्र में रखकर डिजिटल राजनीतिक लामबंदी जैसी दिखाई देती है।

‘दिमागी नक्सल पार्टी’ खुद को CJP का सहयोगी संगठन बताती है और एक युवा-केंद्रित नागरिक एवं व्यंग्यात्मक मंच के तौर पर पेश करती है। हालांकि, राजनीतिक व्यंग्य या उकसावे के तौर पर ही सही, युवाओं के एक वर्ग द्वारा ऐतिहासिक रूप से बेहद विवादित और हिंसा से जुड़े ‘नक्सल’ शब्द को अपनाना सोशल मीडिया की शब्दावली से कहीं बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या इस नाम को अपनाने वाले लोग उस विचारधारा, हिंसा के इतिहास और उससे जुड़ी मानवीय कीमत को वास्तव में समझते हैं?

‘नक्सल’ शब्द सुनते ही क्यों याद आती है हिंसा?

भारत में ‘नक्सल’ शब्द लंबे समय से कम्युनिस्ट उग्रवाद और सशस्त्र हिंसा से जोड़ा जाता रहा है। यह नाम उन हमलों, घात लगाकर किए गए हमलों, आईईडी विस्फोटों और दशकों तक चले खूनी विद्रोह की याद दिलाता है, जिसने खास तौर पर मध्य और पूर्वी भारत के जंगलों में सुरक्षा बलों और आदिवासी आबादी को भारी नुकसान पहुंचाया।

इस हिंसा की मानवीय कीमत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2004 से 30 नवंबर 2025 तक देशभर में वामपंथी उग्रवाद से जुड़े हमलों में 8,956 लोगों की मौत हुई। मंत्रालय का कहना है कि मारे गए नागरिकों में बड़ी संख्या आदिवासियों की थी, जिनमें कई लोगों को ‘पुलिस मुखबिर’ बताकर निशाना बनाया गया।

आधिकारिक तौर पर Left Wing Extremism (LWE) कही जाने वाली यह आंतरिक सुरक्षा चुनौती आज एक अलग मैदान में भी दिखाई दे रही है। सुरक्षा बलों की कार्रवाई से जहां सशस्त्र माओवादी आंदोलन का भौगोलिक प्रभाव काफी सिमटा है, वहीं नक्सल शब्द का रोमांटिसिज्म आदिवासी इलाकों के जंगलों से निकलकर सोशल मीडिया की आभासी दुनिया तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।

‘दिमागी नक्सल’ को विद्रोह का बैज बना रही Gen Z?

युवाओं का एक वर्ग ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को विद्रोह और असहमति की पहचान के रूप में इस्तेमाल करता दिखाई दे रहा है। ‘दिमागी’ यानी बौद्धिक या वैचारिक—इस संदर्भ में यह शब्द नक्सलवाद के वैचारिक पक्ष से जुड़ाव का संकेत देता है।

परेशानी यह है कि सशस्त्र आंदोलन से जुड़े ऐसे नाम को अपनाने में कुछ लोगों को कोई झिझक दिखाई नहीं देती, जबकि इस आंदोलन के कारण नागरिकों, आदिवासियों और सुरक्षाकर्मियों की मौत का लंबा इतिहास मौजूद है।

आज के Instagram और X के दौर में जो चीज व्यंग्य या राजनीतिक उकसावे के रूप में शुरू होती है, वह तेजी से अलग पहचान बना सकती है। एक विवादित शब्द हैशटैग बन सकता है, हैशटैग पहचान बन सकता है और पहचान धीरे-धीरे राजनीतिक विचारधारा का रूप ले सकती है।

हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ‘दिमागी नक्सल’ कहने वाला हर युवा सशस्त्र उग्रवादी है या हिंसा करना चाहता है। ऐसा आरोप लगाना गैर-जिम्मेदाराना होगा। लेकिन अगर माओवादी क्रांतिकारी राजनीति को नई पीढ़ी के सामने आधुनिक और आकर्षक विद्रोह के रूप में पेश किया जा रहा है और उसके खूनी इतिहास को नजरअंदाज किया जा रहा है, तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

बंदूक से पहले विचारधारा तैयार होती है?

एक ऐसा व्यक्ति जो जानबूझकर सशस्त्र और खूनी क्रांति का समर्थन करता है, एक मायने में उस व्यक्ति से भी ज्यादा गंभीर चुनौती बन सकता है जो अंततः जंगल से बंदूक लेकर सामने आता है।

बंदूक वाला व्यक्ति दिखाई देता है। लेकिन वह विचारधारा, जो किसी अगली पीढ़ी को यह विश्वास दिलाती है कि राजनीतिक बदलाव के लिए बंदूक उठाना जायज है, वह चुपचाप शब्दों, नारों और क्रांति के रोमांटिक विचारों के जरिए फैल सकती है।

सशस्त्र कैडर किसी आदिवासी ग्रामीण या सुरक्षाकर्मी पर गोली चला सकता है, लेकिन उससे पहले किसी को ऐसी वैचारिक जमीन तैयार करनी पड़ती है, जहां हिंसा को वीरता, जरूरत या ऐतिहासिक अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

इसीलिए उग्रवाद से लड़ाई का मतलब सिर्फ जंगलों में मौजूद हथियारबंद कैडरों को हराना नहीं हो सकता। लोकतंत्र को राजनीतिक हिंसा के महिमामंडन का जवाब तर्क, इतिहास और तथ्यों से देना होगा।

किसी भी परिस्थिति में आतंकवाद, उग्रवाद या सशस्त्र क्रांति का रोमांटिसिज्म या प्रचार नहीं होना चाहिए—चाहे ऐसा Gen X करे, Millennials करें या Gen Z।

सत्ता से सवाल करना और सशस्त्र क्रांति का समर्थन अलग-अलग हैं

युवाओं का सरकार से सवाल करना लोकतंत्र की ताकत है। सरकारों से सवाल होने चाहिए, असमानता पर बहस होनी चाहिए और राजनीतिक मान्यताओं को चुनौती दी जानी चाहिए।

लेकिन सरकार का विरोध करने और सशस्त्र क्रांति का महिमामंडन करने में बुनियादी अंतर है।

किसी क्रांतिकारी नाम को फैशन बनाने से पहले यह पूछना जरूरी है कि उस नाम के पीछे इतिहास क्या है? उसके वैचारिक स्रोत कौन थे? जब ऐसी क्रांतिकारी विचारधाराओं ने सत्ता हासिल की तो क्या हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण—उन आम लोगों के साथ क्या हुआ जो उनके रास्ते में खड़े थे?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि माओ जेडोंग भारतीय माओवादी आंदोलन के प्रमुख वैचारिक प्रेरणास्रोतों में रहे हैं।

20वीं सदी के कम्युनिस्ट इतिहास को केवल घोषणापत्र, क्रांति और समानता के वादों के जरिए नहीं समझा जा सकता। उसमें राजनीतिक शुद्धिकरण, जबरन श्रम शिविर, भयंकर अकाल, फांसी और बड़े पैमाने पर मौतों का भी इतिहास है।

लाल आतंक का गणित

कम्युनिस्ट शासन और आंदोलनों से जुड़ी मौतों का अनुमान लगाने की सबसे चर्चित कोशिशों में से एक ‘The Black Book of Communism: Crimes, Terror, Repression’ में दिखाई देती है। इसकी भूमिका में स्टेफान कूर्तुआ ने दुनिया भर के कम्युनिस्ट शासन और आंदोलनों से जुड़ी मौतों का कुल अनुमान करीब 10 करोड़ तक बताया था। हालांकि, इस आंकड़े और इसकी गणना की पद्धति को लेकर इतिहासकारों के बीच गंभीर मतभेद भी रहे हैं।

माओ के चीन का भयावह इतिहास

चीन इस इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों में से एक है। माओ के दौर में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों और दमन से जुड़ी मौतों के कुछ ऊंचे अनुमान करीब 6.5 करोड़ तक जाते हैं।

Great Leap Forward के दौरान पैदा हुए अकाल में करोड़ों लोग मारे गए। इसके बाद Cultural Revolution ने राजनीतिक उत्पीड़न, अपमान, हिंसा और सामाजिक विनाश का एक और दौर देखा।

इसके बावजूद माओ चीन की सीमाओं से बाहर भी क्रांतिकारी आंदोलनों के लिए एक प्रतीक बने रहे।

वादा आकर्षक था—किसान इतिहास की ताकत बनेंगे, पुरानी व्यवस्था को तोड़ा जाएगा और शोषण समाप्त कर दिया जाएगा।

यही कारण है कि इसके परिणामों को समझना जरूरी है।

जब आपको क्रांति की कब्रें नहीं खोदनी पड़तीं, तब क्रांति को रोमांटिक बनाना आसान होता है।

स्टालिन और गुलाग की दुनिया

सोवियत संघ का इतिहास भी अपने भयावह अध्यायों से भरा है। स्टालिन के शासन के कारण हुई मौतों के आंकड़े इस बात पर निर्भर करते हैं कि फांसी, गुलाग में मौत, जबरन निर्वासन, अकाल और अन्य श्रेणियों को किस तरह गिना जाता है। व्यापक रूप से करीब 2 करोड़ मौतों का अनुमान भी सामने आता है।

स्टालिन के शासन में जबरन सामूहिकीकरण, निर्वासन, राजनीतिक शुद्धिकरण, फांसी और जबरन मजदूरी वाले विशाल जेल-तंत्र का निर्माण हुआ।

लेखक अलेक्जेंडर सोल्झेनित्सिन ने अपनी पुस्तक The Gulag Archipelago में इस व्यवस्था की बेहद प्रभावशाली तस्वीर पेश की। उन्होंने सोवियत दमन को बाहर से देखने वाले अकादमिक की तरह नहीं, बल्कि खुद जेल और दमन का अनुभव करने वाले व्यक्ति के रूप में लिखा।

उनकी रचना बताती है कि किस तरह दमन एक प्रशासनिक प्रक्रिया बन सकता है और किस तरह कोई राज्य कुछ इंसानों को ऐसी वैचारिक श्रेणियों में बदल सकता है, जिनके साथ होने वाली क्रूरता को किसी कथित बड़े ऐतिहासिक उद्देश्य के नाम पर उचित ठहराया जाने लगे।

‘जनता का दुश्मन’ कैसे बनाया गया?

स्टालिनवादी व्यवस्था ने राजनीतिक शब्दावली के जरिए बड़े पैमाने पर दमन को स्वीकार्य बनाने की तकनीक विकसित की। पड़ोसी को ‘प्रतिक्रियावादी’, ‘वर्ग शत्रु’, ‘जनता का दुश्मन’ या ‘इतिहास की राह में बाधा’ बताया जा सकता था।

जब किसी इंसान को उसकी व्यक्तिगत पहचान से हटाकर केवल एक वैचारिक श्रेणी में बदल दिया जाता है, तो उसके साथ क्रूरता को सही ठहराना आसान हो जाता है।

शारीरिक हिंसा बाद में आती है।

लेकिन हिंसा की वैचारिक अनुमति पहले तैयार होती है।

चीन के Laogai शिविर और हैरी वू

कम्युनिस्ट चीन के संदर्भ में हैरी वू की गवाही भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। राजनीतिक अपराध के आरोप में उन्हें चीन की Laogai जबरन मजदूरी व्यवस्था में 19 साल बिताने पड़े।

चीन से बाहर आने के बाद उन्होंने अपना जीवन इन शिविरों और Laogai व्यवस्था को दुनिया के सामने लाने में लगाया। Laogai Research Foundation ने 1,000 से ज्यादा शिविरों का दस्तावेजीकरण किया था।

मानवाधिकार शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस व्यवस्था के लंबे इतिहास में लाखों लोग इसके भीतर पहुंचे और भुखमरी, थकावट, यातना तथा फांसी जैसी परिस्थितियों में बड़ी संख्या में मौतें हुईं।

कम्युनिज्म और वैचारिक हिंसा पर चर्चा करने वाले शोधकर्ताओं में कोएनराड एल्स्ट और माओकालीन चीन के विशेषज्ञ जीन-ल्यूक डोमेनाक जैसे नाम भी आते हैं।

आंकड़ों और पद्धतियों पर शोधकर्ताओं में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन व्यापक ऐतिहासिक रिकॉर्ड एक बात स्पष्ट करता है—माओवादी चीन की राजनीतिक दमन व्यवस्था को रोमांटिक बनाना बेहद मुश्किल है।

पोल पॉट और खमेर रूज: जब ‘यूटोपिया’ बना नरक

इसके बाद आता है कंबोडिया का अध्याय।

पोल पॉट और Khmer Rouge के शासन में कृषि आधारित कम्युनिस्ट यूटोपिया बनाने की कोशिश 20वीं सदी की सबसे संकेंद्रित सामूहिक हत्याओं में बदल गई।

शहर खाली करा दिए गए। संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया। शिक्षित लोगों को निशाना बनाया गया। परिवारों को अलग किया गया और बड़ी संख्या में लोगों को बेहद कठोर श्रम के लिए मजबूर किया गया।

अनुमानों के मुताबिक 15 से 20 लाख कंबोडियाई फांसी, भुखमरी, बीमारी और अत्यधिक श्रम के कारण मारे गए।

ये केवल किसी काल्पनिक ‘पूंजीवादी शासक वर्ग’ के लोग नहीं थे। इनमें किसान, मजदूर और आम परिवार शामिल थे—यानी वही लोग, जिनके नाम पर क्रांतिकारी राजनीति अपनी वैधता का दावा करती थी।

भारत में CPI (Maoist) को आतंकी संगठन क्यों माना गया?

1967 का नक्सलबाड़ी आंदोलन भारत में माओवादी विद्रोह की शुरुआत से जुड़ा महत्वपूर्ण पड़ाव था। जमीन और कृषि अधिकारों को लेकर स्थानीय असंतोष के बीच यह आंदोलन उभरा।

चारु मजूमदार जैसे नेताओं ने माओवादी विचारधारा से प्रेरणा ली और संसदीय लोकतंत्र को अस्वीकार करते हुए सशस्त्र संघर्ष के जरिए राज्य व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का समर्थन किया।

समय के साथ यह आंदोलन कई रूपों से गुजरते हुए Communist Party of India (Maoist) के रूप में संगठित हुआ।

हिंसक गतिविधियों के कारण केंद्र सरकार ने CPI (Maoist) और उससे जुड़े संगठनों को UAPA के तहत आतंकी संगठन के रूप में सूचीबद्ध किया।

इस विद्रोह का सबसे बड़ा विरोधाभास यह रहा कि जिस आंदोलन ने आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधित्व का दावा किया, उसकी हिंसा का बड़ा असर उन्हीं आदिवासी गांवों और समुदायों पर पड़ा।

छत्तीसगढ़ में मैंने क्या देखा?

2008 में अपनी फिल्म ‘Chhattisgarh Now’ के लिए मैंने छत्तीसगढ़ के संघर्ष प्रभावित इलाकों की यात्रा की।

मैं बस्तर के उन हिस्सों तक गया जहां माओवादी संघर्ष कोई बौद्धिक बहस नहीं था, जिसे सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठकर किया जाए। वहां यह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी थी।

मैंने Salwa Judum के सदस्यों, पूर्व नक्सलियों, आदिवासी पुरुषों और महिलाओं तथा सुरक्षा बलों के जवानों से बातचीत की।

आदिवासी लोगों ने नक्सलियों की कथित हिंसा, धमकी और अत्याचारों के बारे में बताया। उन्होंने परिवारों, महिलाओं और बच्चों तथा हथियारबंद कैडरों के दबाव में जी रहे ग्रामीणों की बातें बताईं।

पूर्व नक्सलियों ने आंदोलन के भीतर अपने अनुभव साझा किए। सुरक्षाकर्मियों ने उस कठिन भूगोल के बारे में बताया जहां सड़क का एक सामान्य हिस्सा भी विस्फोटक से भरा हो सकता था।

ये बातें मुझे किसी प्रेस विज्ञप्ति के जरिए नहीं मिली थीं। ये वे गवाही थीं जिन्हें मैंने जमीन पर रिकॉर्ड किया।

उन अनुभवों ने क्रांति के रोमांस और विद्रोह के बीच रहने वाले लोगों की वास्तविक जिंदगी के बीच का विशाल अंतर मेरे सामने स्पष्ट कर दिया।

फिल्म में एक दृश्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। Chhattisgarh Now में करीब 65,000 वनवासियों के एक ऐसे जमावड़े को रिकॉर्ड किया गया था, जिसे स्क्रीन पर माओवादी अत्याचारों के खिलाफ प्रदर्शन के रूप में बताया गया।

मैंने Special Police Officers और माओवादियों का विरोध करने वाले लोगों को भी रिकॉर्ड किया।

Salwa Judum की राजनीति को लेकर बाद में चाहे जितनी बहस हो, वे लोग वास्तविक आदिवासी थे। वे ऐसे शहरी बुद्धिजीवी नहीं थे जो कॉफी पीते हुए क्रांति को रोमांटिक बना रहे हों। वे उन्हीं इलाकों में रहते थे जहां उसके परिणाम उनके घरों तक पहुंच सकते थे।

LWE का खून से सना रिकॉर्ड

गृह मंत्रालय के अनुसार 2004 से 30 नवंबर 2025 के बीच वामपंथी उग्रवाद से 8,956 लोगों की मौत हुई।

मंत्रालय का कहना है कि LWE कैडरों द्वारा मारे गए नागरिकों में बड़ी संख्या आदिवासियों की थी। कई लोगों को कथित तौर पर पुलिस मुखबिर बताकर निशाना बनाया गया।

कुछ हमले आज भी राष्ट्रीय स्मृति में दर्ज हैं।

अप्रैल 2010 में दंतेवाड़ा में 76 सुरक्षाकर्मी मारे गए।
2013 के दरभा घाटी हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं, सुरक्षाकर्मियों और अन्य लोगों की मौत हुई।
अप्रैल 2021 में सुकमा-बीजापुर मुठभेड़ में 22 सुरक्षाकर्मी मारे गए।

इन बड़े हमलों के अलावा अनगिनत छोटे हमले, हत्याएं और विस्फोट हुए, जो राष्ट्रीय सुर्खियों से जल्द गायब हो गए लेकिन प्रभावित परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

माओवादियों ने बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाया। सड़कें, रेलवे प्रतिष्ठान, बिजली का ढांचा और राज्य से जुड़ी अन्य संस्थाएं हमलों का शिकार बनीं।

संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में स्कूलों को भी नुकसान पहुंचाया गया या नष्ट किया गया। माओवादी पक्ष की ओर से कभी-कभी तर्क दिया गया कि इन इमारतों का इस्तेमाल सुरक्षा बल कर रहे थे।

लेकिन सवाल यह है कि गरीब और आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को नष्ट करने से नुकसान आखिर किसका होता है?

अक्सर उसी ग्रामीण और आदिवासी आबादी का, जिसके नाम पर क्रांति अपनी वैधता का दावा करती है।

जब रमन सिंह ने उठाया था Lashkar-e-Taiba का सवाल

मई 2010 में एक असाधारण घटनाक्रम में तत्कालीन छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि खुफिया एजेंसियों से ऐसी जानकारी मिली थी कि कुछ आतंकी संगठन नक्सल प्रभावित इलाकों में माओवादियों की मदद कर सकते हैं।

उन्होंने पाकिस्तान स्थित Lashkar-e-Taiba (LeT) से संभावित सहायता का मुद्दा भी उठाया था।

रमन सिंह ने कुछ IED हमलों की तकनीकी सटीकता का हवाला देते हुए कहा था कि इनमें इस्तेमाल विशेषज्ञता किसी सामान्य स्थानीय ऑपरेटर से आगे की हो सकती है।

उनके अनुसार राज्य को खुफिया एजेंसियों से ऐसी संभावित मदद के बारे में जानकारी मिली थी।

उन्होंने उस समय छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा का भयावह आंकड़ा भी बताया था। उनके अनुसार पिछले एक दशक में नक्सलियों ने राज्य में 1,000 से ज्यादा नागरिकों और 650 से ज्यादा पुलिसकर्मियों की हत्या की थी।

उन्होंने नक्सलियों पर 132 बिजली टावर, 106 स्कूल भवन और तीन अस्पतालों को उड़ाने का आरोप भी लगाया था।

जब Gen Z उग्रवाद को अपनाती है तो कानून क्या कहता है?

भारतीय कानून किसी विचार को मानने और किसी प्रतिबंधित संगठन को जानबूझकर मदद देने के बीच महत्वपूर्ण अंतर करता है।

मार्क्स, लेनिन, माओ या चारु मजूमदार को पढ़ना अपने आप में आतंकवाद नहीं है। इसी तरह कट्टर राजनीतिक विचार व्यक्त करना मात्र किसी अपराध का प्रमाण नहीं है।

लेकिन जब विचार जानबूझकर किसी आतंकी संगठन को समर्थन देने में बदलता है, तब कानून अलग रुख अपनाता है।

UAPA की धारा 39 आतंकी संगठन को समर्थन देने से संबंधित है। इसमें निर्धारित परिस्थितियों और आवश्यक इरादे के साथ समर्थन मांगना या कुछ विशेष बैठकों का आयोजन, प्रबंधन, सहायता या संबोधन जैसे कृत्य शामिल हो सकते हैं। इसके तहत 10 साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान हो सकता है।

धारा 38 आतंकी संगठन से उसके कार्यों को आगे बढ़ाने के इरादे से जुड़े होने से संबंधित है, जबकि धारा 40 आतंकी संगठन के लिए धन जुटाने या उपलब्ध कराने से संबंधित है।

इसलिए आपराधिक जिम्मेदारी तय करने में इरादा और सबूत महत्वपूर्ण होते हैं।

लेकिन मामला सिर्फ कानून का नहीं है।

जो चीज आपराधिक अपराध नहीं बनती, वह अपने आप प्रशंसा के योग्य भी नहीं हो जाती।

जब Gen Z का कोई वर्ग किसी ऐसे उग्रवादी विचार को अपनाता या रोमांटिक बनाता है जिसका राजनीतिक हिंसा से दर्ज इतिहास रहा है, तो युवाओं को यह जानने का अधिकार है कि जब क्रांतिकारी नारों को जमीन पर लागू किया गया तो उसके परिणाम क्या हुए।

किसी विचारधारा को अपनाने से पहले उसके परिणाम जानना जरूरी है।

असली लड़ाई सबसे पहले दिमाग में लड़ी जाती है

यहीं भारतीय विचारकों राम स्वरूप और सीताराम गोयल का संदर्भ महत्वपूर्ण हो जाता है। दोनों ने कम्युनिज्म की विचारधारा की लगातार आलोचना की।

उनकी चिंता सिर्फ उस बंदूक को लेकर नहीं थी जो चल चुकी है, बल्कि उस वैचारिक व्यवस्था को लेकर भी थी जो राजनीतिक हिंसा को नैतिक और उचित बना सकती है।

सर्वसत्तावादी विचारधाराएं समाज को लगातार ‘शोषक और शोषित’, ‘मित्र और दुश्मन’ तथा ‘प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी’ जैसी स्थायी श्रेणियों में बांट सकती हैं। ऐसी स्थिति में दमन खुद नैतिक रूप से जरूरी दिखाई देने लगता है।

सोल्झेनित्सिन का अनुभव भी हमें इसी असहज सवाल तक ले जाता है।

गुलाग कंक्रीट, लोहे और कांटेदार तार से बना था, लेकिन गुलाग के लिए वैचारिक अनुमति उससे पहले तैयार हो चुकी थी।

किसी इंसान को ‘जनता का दुश्मन’ बताकर गायब करने से पहले किसी को यह श्रेणी बनानी पड़ती है—और उसे सही ठहराना पड़ता है।

यही वजह है कि ‘दिमागी नक्सल’ में ‘दिमागी’ शब्द को उन लोगों से कहीं ज्यादा गंभीरता से समझने की जरूरत है जो इसे महज एक सोशल मीडिया पहचान के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

जंगल से बंदूक लेकर निकलने वाला उग्रवादी स्पष्ट खतरा है। लेकिन जानबूझकर खूनी सशस्त्र क्रांति का महिमामंडन करने वाला वैचारिक समर्थक एक अलग और संभावित रूप से अधिक जटिल चुनौती पेश करता है, क्योंकि विचार खुद को दोहराते हैं।

बंदूकधारी को रोका जा सकता है।

लेकिन अगर कोई विचार आने वाली पीढ़ियों को राजनीतिक हत्या को क्रांतिकारी पुण्य मानना सिखाता रहे, तो वह नए बंदूकधारियों को जन्म दे सकता है।

हालांकि इसका समाधान लोगों के दिमाग पर पहरा लगाना नहीं हो सकता।

खतरनाक विचार का लोकतांत्रिक जवाब है—उसे सामने लाना, बहस करना और इतिहास तथा तथ्यों के जरिए उसकी जांच करना।

इसीलिए क्रांतिकारी हिंसा के पीड़ितों की आवाज सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

‘दिमागी नक्सल’ का तमगा लगाने से पहले पीड़ितों से मिलिए

क्रांतिकारी राजनीति का युवाओं को आकर्षित करने का अपना एक तरीका रहा है। यह जटिल दुनिया को सरल कहानी में बदल देती है—शोषक और शोषित, नायक और खलनायक, क्रांतिकारी और प्रतिक्रियावादी।

युवा को सिर्फ विचार रखने के लिए नहीं, बल्कि खुद को इतिहास बदलने वाले किरदार के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया जाता है।

Gen Z को बेरोजगारी, असमानता, भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज्म, शासन की विफलता या किसी भी ऐसे मुद्दे पर गुस्सा करने का पूरा अधिकार है जिसे वह राजनीतिक व्यवस्था की विफलता मानती है।

एक मजबूत लोकतंत्र तीखी आलोचना को सहन कर सकता है और उससे और मजबूत हो सकता है।

असहमति को खत्म करना किसी लोकतंत्र का समाधान नहीं है।

लेकिन इतिहास की स्मृति के बिना विद्रोह खतरनाक रूप से भोला हो सकता है।

अगर कोई खुद को गर्व से ‘दिमागी नक्सल’ कहता है, तो उससे यह कहना जरूरी नहीं कि वह सोचना बंद कर दे।

बल्कि उससे कहा जाना चाहिए—और ज्यादा सोचो।

माओ को पढ़िए, लेकिन Great Leap Forward का इतिहास भी पढ़िए।

क्रांतिकारी कम्युनिज्म को समझिए, लेकिन The Black Book of Communism और उसके 10 करोड़ मौतों के अनुमान को लेकर हुई बहस को भी जानिए।

स्टालिन के भाषण पढ़िए, लेकिन सोल्झेनित्सिन के जरिए स्टालिन की व्यवस्था को भी समझिए।

माओवादी चीन का अध्ययन कीजिए, लेकिन Laogai के बारे में हैरी वू की गवाही भी सुनिए।

पोल पॉट की क्रांति पढ़िए, लेकिन उन 15 से 20 लाख कंबोडियाई लोगों को याद रखिए जो उस दौर में जीवित नहीं बच सके।

और भारत में माओवाद को रोमांटिक बनाने से पहले बस्तर जाइए—या कम से कम उन लोगों की आवाज सुनिए जो उस समय वहां रहे, जब बंदूकें चल रही थीं।

मैं गया था।

2008 में मैं कैमरा लेकर छत्तीसगढ़ गया और लोगों की बातें सुनीं। मैंने Salwa Judum के सदस्यों, पूर्व नक्सलियों, सुरक्षाकर्मियों और आदिवासी लोगों से बात की।

उनकी गवाही आज भी Chhattisgarh Now में रिकॉर्ड है।

उनमें से कई लोग क्रांति जैसा कुछ नहीं चाहते थे।

वे बस जीना चाहते थे।

यही बात उस समय गायब हो जाती है जब कोई विद्रोह सोशल मीडिया स्क्रीन पर एक फैशनेबल पहचान बन जाता है।

जिन लोगों से मैं मिला, उनके लिए नक्सलवाद कोई पोस्टर, हैशटैग या बौद्धिक खेल नहीं था। वह ऐसी चीज थी जो जंगल से निकलकर उनके घरों तक पहुंच सकती थी।

आतंकवाद, उग्रवाद या खूनी सशस्त्र क्रांति को किसी भी परिस्थिति में बढ़ावा या रोमांटिक रूप नहीं दिया जाना चाहिए—चाहे ऐसा Gen X करे, Millennials करें या Gen Z।

लोकतंत्र हमें सत्ता से सवाल करने की आजादी देता है और इस आजादी की मजबूती से रक्षा होनी चाहिए।

हमें क्रांतिकारी साहित्य पढ़ने, सरकारों की आलोचना करने, राजनीतिक मान्यताओं को चुनौती देने और समाज की वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना करने की आजादी है। यही आजादी एक खुले समाज को उन सर्वसत्तावादी व्यवस्थाओं से अलग करती है, जिनका इतिहास हमें चेतावनी देता है।

लेकिन विचारों की स्वतंत्रता के साथ एक जिम्मेदारी भी आती है—

ईमानदारी से सोचने की जिम्मेदारी।

क्रांति के रोमांस को अपनाने से पहले उसका इतिहास पढ़िए।

अपने नायकों को चुनने से पहले उनके पीड़ितों से मिलिए।

किसी नाम को विद्रोह के बैज की तरह पहनने से पहले समझिए कि उस नाम का अर्थ उन लोगों के लिए क्या था, जिन्होंने उसकी सशस्त्र अभिव्यक्ति का सामना Instagram या X पर नहीं, बल्कि अपने घरों के बाहर किया था।

इतिहास केवल उन क्रांतिकारियों का नहीं है जिन्होंने झंडे उठाए।

इतिहास उन लोगों का भी है जिन्होंने उन क्रांतियों की कीमत अपनी जान देकर चुकाई।

और इससे पहले कि कोई नई पीढ़ी एक पुरानी और खूनी विचारधारा को एक नई फैशनेबल पहचान में बदल दे, उन लोगों की आवाज सुनी जानी चाहिए।

(नोट: मयंक जैन जाने माने लेखक और फिल्म निर्देशक हैं।)

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