और भारी हंगामे के बीच सरकार ने लोकसभा में पेश कर दिया दिल्ली सेवा विधेयक —–

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अखिलेश अखिल 

आज लोकसभा में सरकार ने दिल्ली सेवा विधेयक को पेश कर दिया। जिस समय यह विधेयक पेश हो रहा था उस समय विपक्ष के कई नेताओं ने काफी हंगामा किया लेकिन सरकार के सामने किसी की नहीं चली। वैसे भी लोकसभा में सरकार को कोई परेशानी नहीं है। सरकार वहां पूर्ण बहुमत में है और लोकसभा से विधेयक पास होगा। यह विपक्ष को मुँह की खानी पड़ेगी और विपक्ष को भी यह सब पता है। लेकिन विपक्ष का सारा जोड़ राज्यसभा में विरोध करने का है। हालांकि राज्य सभा में भी विपक्ष के पास 110 से ज्यादा सांसद नहीं है और यह भी तय है कि यहाँ भी सरकार जीत हासिल कर जाएगी।  
    विपक्ष को उस समय बड़ा झटका लगा जब जगन रेड्डी और नवीन पटनायक की पार्टी ने विधेयक पर सरकार का समर्थन देने का ऐलान किया। इस ऐलान के बाद दो बातें साफ़ हो गई। पहली बात तो यह है कि अब विपक्षी एकता को जगन और पटनायक का साथ नहीं मिलेगा और दूसरी बात यह है कि दिल्ली का सेवा विधेयक भी अब सरकार आसानी से पास करा लेगी .यह लोकतंत्र का एक अलग रूप है। दिल्ली के साथ आगे क्या कुछ होना है इसे अभी देखने की जरूरत है।          
     लोकसभा में संशोधन  विधेयक 2023 पर बोलते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि संविधान ने सदन को दिल्ली राज्य के संबंध में कोई भी कानून पारित करने की शक्ति दी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने साफ कर दिया है कि दिल्ली राज्य को लेकर संसद कोई भी कानून ला सकती है। सारी आपत्ति राजनीति है। कृपया मुझे यह बिल लाने की अनुमति दें।
                 जैसे ही गृह मंत्री शाह ने इस विधेयक पर बोलना शुरू किया, आम आदमी पार्टी के सांसद शुशील कुमार रिंकू ने विरोध जताना शुरू कर दिया। वे वेल में भी आ गए। सरकार के खिलाफ विपक्ष की नारेबाजी के बीच रिंकू ने कहा कि मुझे बोलने का मौका नहीं दिया गया। यह लोकतंत्र की हत्या है। आप भीमराव अंबेडकर का अपमान कर रहे हैं। इस दौरान रिंकू और कांग्रेस सदस्य टी एन प्रतापन को आसन के सामने कागज फेंकते देखा गया। हंगामे के बीच स्पीकर ओम बिरला ने विपक्षी सांसदों को उनके व्यवहार के लिए फटकार भी लगाई। उन्होंने कहा कि सभी को बोलने के लिए समय दिया जाएगा। इस तरह का व्यवहार अच्छा नहीं है। देश देख रहा है।
               वहीं, लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर चौधरी ने बिल पेश करने पर चर्चा करते हुए कहा कि यह विधेयक राज्यों के क्षेत्र में सरकार के अपमानजनक उल्लंघन को सही ठहराता है। यह संघवाद में सहयोग के लिए कब्रिस्तान खोदने के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य दिल्ली सरकार की शक्तियों पर अंकुश लगाना है। केंद्र इस कदम के माध्यम से लोकतंत्र को कमजोर करना चाहता है।
               इस दौरान आरएसपी नेता एन के प्रेमचंद्रन ने भी बिल का विरोध किया। उन्होंने कहा कि वह तीन आधार पर विधेयक का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैं विधेयक पेश करने में सरकार की विधायी क्षमता पर सवाल उठा रहा हूं। यह भारत के संविधान में परिकल्पित संघवाद के सिद्धांतों के खिलाफ है। दिल्ली में निर्वाचित सरकार का नौकरशाहों पर नियंत्रण नहीं होने का मतलब होगा कि दिल्ली में सरकार नहीं होगी। वहीं प्रेमचंद्रन को जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि संसद विधेयक पारित करने के लिए पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने कहा कि अगर वे विधेयक की योग्यता के बारे में बात करना चाहते हैं तो विचार और पारित होने के समय चर्चा करें।
              कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी विधायी क्षमता पर विधेयक का विरोध किया। उन्होंने कहा कि संसद में आज दिल्ली अध्यादेश विधेयक का संक्षिप्त परिचय हुआ, इस पर बहस नहीं हुई। परिचय का विरोध करना हमारा अधिकार है और विपक्ष के 5-6 सदस्यों ने इसका विरोध करने की कोशिश की। इनमें से एक पार्टी ने विपक्ष के रूप में खड़े होकर सरकार का समर्थन किया, लेकिन अन्य ने कहा कि यह अवैध है। 
       टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने भी बताया कि यह बिल सरकार की विधायी क्षमता से बाहर है। रॉय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया और अब इसे खत्म करने के लिए यह विधेयक लाया गया है। यह संविधान के तहत दिल्ली सरकार की विधायी शक्ति का पूरी तरह से हनन है।
                इस विधेयक के पास होने के बाद बनने वाला कानून दिल्ली सेवा अध्यादेश का स्थान लेगा, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी में वरिष्ठ नौकरशाहों की नियुक्ति और तबादले के लिए प्राधिकरण बनाने का प्रावधान है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक के अनुसार, तबादले व तैनाती दिल्ली के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमेटी करेगी। इसमें मुख्य सचिव और प्रधान गृह सचिव सदस्य होंगे। समिति की सलाह पर उप राज्यपाल तबादले और तैनाती करेंगे।

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