बीरेंद्र कुमार झा
भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव बरकरार है। 2020 को लद्दाख मुद्दे पर हुई खूनी झड़प के बाद से दोनों देशों के बीच रिश्ते में खटास लगातार सामने आ रही है ।अपना पक्ष मजबूत करने और चीन को आईना दिखाने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर सीमा विवाद के मुद्दे को लगातार उठता आ रहा है। लेकिन चीनी को इससे कितनी दिलचस्पी है इसका पता चीनी नेता की तरफ से दिए एक बयान से सामने आया है।चीनी नेता की तरफ से कहा गया कि भारत को हर वक्त सीमा विवाद का मुद्दा नहीं उठाना चाहिए। उनके नेता शी जिनपिंग के पास और भी बड़े मुद्दे हैं। चीनी नेतृत्व का कहना है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हर बार मिलने पर सीमा विवाद के मुद्दे उठाने के बजाय सकारात्मक बातें करनी चाहिए।
विदेश मंत्रीएस जयशंकर के बाद कुछ दिन पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी जोहांसबर्ग में अपने चीनी समकक्ष वांग यी के सामने दो टूक शब्दों में सीमा विवाद को प्राथमिकता दी थी।सीमा विवाद वह मुद्दा है, जिस पर भारत अपने पड़ोसी देश चीन को हमेशा आंखें दिखाएं खड़ा रहता है, जबकि दूसरी ओर चीन हर बार इस मुद्दे को टाल देता है। अब चीन ने इस मामले में कहा है कि भारत के नेताओं को हर बार सीमा विवाद के मुद्दों पर बात नहीं करनी चाहिए।
सीमा मुद्दे को उठाने वाले भारतीय नेतृत्व के प्रति चीनी नेतृत्व का तर्क यह है कि सीमा मतभेदों को उचित स्थानों पर रखा जाना चाहिए।और दोनों देशों को अन्य क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में मिलकर काम करना चाहिए।
क्या है चीनी तर्क
सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पास द्विपक्षीय संबंधों में सीमाएं या अन्य गंभीर परेशानियों को सुलझाने संबंध लिए बहुत कम2 समय है।उनके पास इससे भी ज्यादा गंभीर मुद्दे है।
मनमोहन सिंह के वक्त हाव भाव से जिनपिंग ने किया था इशारा
जब जब मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने भी यह महसूस किया था कि शी जिनपिंग को भारत के सीमा विवाद के मुद्दों पर ज्यादा बात करने में दिलचस्पी नहीं हैं। मार्च 2013 में ब्रिक्स के डरबन शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मुलाकात हुई थी। भारतीय प्रधानमंत्री के साथ राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहली बैठक में काफी शांत और दूर बैठे थे उनके इस हाव – भाव से साफ पता चलता था कि भारत की ओर से सीमाओं पर चिंताओं के लिए उनके पास समय नहीं है।
2014 से आक्रामकता में और तेजी
2014 से देश में नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में है। पीएलए पर सितंबर 2014 में ही डैमचौक और चुनार क्षेत्र में अतिक्रमण करने का आरोप है।इसके परिणाम स्वरूप भारतीय सेना के साथ एक बड़ा गतिरोध भी पैदा हुआ। सीमा पर तैनात भारतीय सेना के कमांडरों का कहना है कि पीएलए ने 2005 – 2007 में एक बार भारतीय सेना के गश्ती अभियानों को अवरुद्ध कर दिया था। सीएनएन जंक्शन पर सितंबर 2014 में चीनी सेना की स्थिति सख्त हो गई थी। सीएनएन जंक्शन पर गश्त के दौरान भारतीय सेना के अधिकारों को अभी भी बहाल नहीं किया गया है।
सीमा मुद्दे पर भारत गंभीर पर चीन बेफिक्र
पीएलए पूर्वी लद्दाख में रॉकेटों,तोपखाने की बंदूकों और टैंकों के साथ पूर्वी लद्दाख के पश्चिमी क्षेत्र में लगभग 50 हजार सैनिकों को ईकट्ठा करने और पूर्वी क्षेत्र में 6 अतिरिक्त ससस्त्र ब्रिगेडों को शामिल कर चुका है ।इससे पता चलता है कि चीन सीमा पर समाधान के बजाय दोहरा दृष्टिकोण अपना रहा है। पीएम मोदी को इसकी गंभीरता का एहसास है ,इसलिए जब भी ये शी से मिलते हैं तो एलएसी पर स्थिति स्पष्ट कर देने जी बात करते हैं। लेकिन शी शायद यह सोचते हैं कि इस मुद्दे पर ध्यान देना उनके लायक नहीं है क्योंकि वे इस सीमा विवाद की जाती रखना चाहते हैं।

