मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को मोदी- शाह की जोड़ी और नीतीश कुमार दोनों को रखना होगा खुश

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जनसंघ के जमाने से लेकर वर्तमान की भारतीय जनता पार्टी को कभी भी इससे पहले तक बिहार में अपनी पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनाने का मौका नहीं मिला था। यह पहली दफा है जब भारतीय जनता पार्टी अपनी ,पार्टी के नेता सम्राट चौधरी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने में सफल हुई है। 2025 ई के बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त से ही भारतीय जनता पार्टी, अपनी पार्टी के किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाने की तिकड़म लगाने मैं जुट गई थी, लेकिन नीतीश कुमार द्वारा इसमें लंगड़ी लगा दिए जाने के कारण बीजेपी इस मामले में चित्त हो गई थी और गठबंधन में अपेक्षाकृत कम विधायकों की संख्या के बावजूद नीतीश कुमार गठबंधन के मुख्यमंत्री बन गये थे। नीतीश कुमार पहले भी ऐसा कारनामा कर चुके थे।बीजेपी जब कभी उनके मार्ग में रोड अटकने का प्रयास करती थी, यानी बीजेपी का मुख्यमंत्री बनाने के बारे में सोचती थी, तब नीतीश कुमार बीजेपी को सबक सिखाने के लिए उसे अपनी सरकार से बाहर कर देते थे और विपक्षी महागठबंधन के साथ मिलकर सरकार बना लेते थे। लेकिन अबकी बार बीजेपी ने नीतीश कुमार की लंगड़ी से भी बड़ा धोबिया पेच मारकर उन्हें फंसा दिया । बीजेपी द्वारा नीतीश कुमार पर लगाया गया यह पेज इतना कड़ा था कि आरजेडी द्वारा बार-बार मुख्यमंत्री बना देने की बात कहे जाने के बावजूद नीतीश कुमार नेआरजेडी के साथ जाना तो दूर ,उसकी तरफ देखा भी नहीं।

भारी मन से ही सही लेकिन 14 अप्रैल को नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि इसे लेकर वे अपने मंत्रिमंडल के अंतिम बैठक के दौरान भावुक भी हो गए थे। लेकिन उनके मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ ही बीजेपी के लिए अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता बिल्कुल साफ हो गया। और बीजेपी ने भी इसके बाद बिल्कुल ही कोई देरी नहीं की। बीजेपी ने सबसे पहले सम्राट चौधरी को बीजेपी विधायक दल का नेता चुना और फिर एनडीए के विधायक दल का नेता चुनवा कर उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री का ताज पहनने के लिए तैयार कर दिया।

15 अप्रैल को बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन के द्वारा पद और गोपनीयता की शपथ दिलाए जाने के बाद सम्राट चौधरी ने बीजेपी नेता के रूप में बिहार के पहले मुख्यमंत्री होने का कीर्तिमान बनाया। एक कीर्तिमान बना तो एक कीर्तिमान टूटा भी। जो कीर्तिमान टूटा वह कीर्तिमान यह था कि जब से भारतीय जनता पार्टी में पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी पावरफुल हो गई थी, तब से जिन राज्यों में यह अपने दल का मुख्यमंत्री बनाती थी, वहां उनके निर्णय चौंकाने वाले होते थे। यह निर्णय न सिर्फ विपक्षी राजनीतिक दलों को चौकाता था ,बल्कि सत्ताधारी गठबंधन के घटक दलों को भी चौका देता था और जनमानस को तो चौकाता था ही। लेकिन इस बार बिहार के नये मंत्रिमंडल गठन के दौरान नीतीश कुमार ने उसे ऐसा नहीं करने दिया और उल्टे अपने पसंद के सम्राट चौधरी को ही बीजेपी के खेमा से मुख्यमंत्री बनवाकर किसी संघी या घोर भाजपाई को बिहार का मुख्यमंत्री बनने पर रोक लगाकर पीएम मोदी और नीतीश कुमार दोनों को चौका दिया और बीजेपी को किसी संघी को या खांटी भाजपाई की जगह पर सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा, जो बीजेपी में आने से पहले आरजेडी में भी रह चुके थे और जेडीयू में भी। बीजेपी में आने से पूर्व सम्राट चौधरी ना सिर्फ आरजेडी या जेडीयू पार्टी में रहे थे ,बल्कि इस पार्टी की तरफ से सरकार में मंत्री भी बने थे।

बीजेपी खेमे से सम्राट चौधरी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने के उद्देश्य से नीतीश कुमार अपनी बिहार समृद्धि यात्रा के अंतिम चरण के दौरान सम्राट चौधरी को अपने साथ ही लेकर घूमते रहे, लोगों को बताते रहे कि उनके बाद उनके बचे हुए अधूरे काम को सम्राट चौधरी ही करेंगे। और जब तक बीजेपी सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने पर राजी नहीं हुई, तब तक उन्होंने मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा भी नहीं दिया था।

अपनी जगह सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नीतीश कुमार ने भले ही बीजेपी के किसी संघी या बीजेपी के शुरू से रहे किसी समर्पित नेता को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने के अरमान का गला घोट दिया हो,चाहे जितनी मेहनत की हो या बीजेपी को लंगडी लगाई हो, लेकिन सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने तो बीजेपी खेमा से ही हैं।और पीएम मोदी तथा अमित शाह ने सिर्फ चेहरा परिवर्तन के लिए तो नीतीश कुमार की जगह सम्राट चौधरी को बिहार का मुख्यमंत्री नहीं बनाया है। इन्हें तो बिहार में बीजेपी का वोट विस्तार करना होगा ‌, भले ही वन नीतीश कुमार की जेडीयू पार्टी की कीमत पर ही क्यों ना हो।

बीजेपी का वोट विस्तार वैसे तो एक छोटा सा वाक्यांश है ,लेकिन सम्राट चौधरी को यह वाक्यांश हमेशा परेशान करता रहेगा। फिलहाल तो सम्राट चौधरी नीतीश कुमार के निर्देशानुसार काम करने की बात कह रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार के निर्देशानुसार काम कर वे बिहार में बीजेपी का वोट विस्तार नहीं कर पाएंगे। और ऐसा करने पर सारा क्रेडिट नीतीश कुमार लेंगे।

बिहार में बीजेपी के वोट विस्तार के लिए सम्राट चौधरी को बीजेपी के कड़े हिंदुत्व वाली नीति पर चलना होगा, भले ही यह नीतीश कुमार के धर्मनिरपेक्ष वाली नीति से अलग ही क्यों न हो। और दूसरा सुशासन की बात कहे जाने के बावजूद बिहार में अपराध का ग्राफ अभी भी ऊंचा है इसके प्रति भी सम्राट चौधरी को कड़ा रूप अपनाना पड़ेगा हालांकि इस वर्ष की शुरुआती समय में उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री की हैसियत से उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर वाली छवि धारण करना शुरू किया था, लेकिन बाद में वे इससे बचने लगे थे। ऐसा प्रतीत होता है कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के यहां पॉपुलर ना होने देने के लिए नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी को ऐसा करने से रोका हो।

इसके अलावा शराबबंदी एक ऐसा मुद्दा है जो नीतीश कुमार को अप्रसन्न कर सकता है। शराबबंदी को लेकर सम्राट चौधरी का मानना है कि शराबबंदी के कारण बिहार को हर साल लगभग 28,000 से 30,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हो रहा है, जो राज्य के कुल राजस्व के लिहाज से बहुत बड़ा है।
शराबबंदी को लेकर सम्राट चौधरी पूर्व में नीतीश कुमार की नीति की आलोचना भी कर चुके हैं।उन्होंने पहले शराबबंदी को “फेल” (असफल) बताया था और कहा था कि इसके कारण बिहार में शराब की “होम डिलीवरी” शुरू हो गई है।
हालांकि जब वे नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने शराबबंदी को नीतीश कुमार का “ऐतिहासिक फैसला” भी बताया, लेकिन साथ ही उन्होंने अपराधियों (शराब माफिया) को चेतावनी भी दी है कि वे कानून तोड़ने से बचें।

ऐसे में अभी अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी अपने कार्यों को अंजाम देने के क्रम में नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह की जोड़ी के साथ-साथ नीतीश कुमार की भी सहानुभूति प्राप्त करने में सफल होते हैं या आगे इसमें कुछ गड़बड़ झाला हो जाता है जिससे उनके लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने को लेकर कोई प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है?

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