नीला, आसमानी, बैंगनी, कलर के शेड्स की पहचान नहीं होती, जानें कलर ब्लाइंडनेस है या नहीं?

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क्या आपको कभी लाल रंग नारंगी जैसा या हरा रंग किसी दूसरे शेड जैसा दिखाई देता है? अगर अलग-अलग रंगों के बीच फर्क समझना मुश्किल होता है, तो इसकी वजह कलर ब्लाइंडनेस यानी Color Vision Deficiency हो सकती है। आम धारणा के विपरीत, कलर ब्लाइंडनेस का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को दुनिया के सारे रंग दिखाई देना बंद हो जाते हैं। ज्यादातर मामलों में कुछ खास रंगों या उनके शेड्स को पहचानने में परेशानी होती है, खासकर लाल और हरे रंग के बीच यह समस्या देखने को मिलती है। यह समस्या कई लोगों में जन्म से मौजूद होती है और इसका संबंध जीन्स से हो सकता है। जबकि कुछ मामलों में यह आंखों से जुड़ी हो सकती है।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थेमोलॉजी के अनुसार कलर ब्लाइंडनेस का मेडिकल नाम Color Vision Deficiency (CVD) है। इसमें व्यक्ति की आंखें और दिमाग कुछ रंगों या रंगों के बीच के अंतर को सामान्य तरीके से पहचान नहीं पाते। आंख की रेटिना में मौजूद कोन सेल्स रंगों को पहचानने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामान्य कलर विजन में अलग-अलग कोन सेल्स प्रकाश की अलग-अलग वेव लेंथ के प्रति संवेदनशील होती हैं। इनसे मिलने वाली जानकारी ऑप्टिक नर्व के जरिए दिमाग तक पहुंचती है, जहां रंगों को पहचानने और उनका अर्थ समझने की प्रक्रिया पूरी होती है। इस प्रक्रिया के किसी भी हिस्से में समस्या होने पर कलर विजन प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि कलर ब्लाइंडनेस केवल आंख की समस्या नहीं होती; कुछ मामलों में रेटिना, ओप्टिक नर्व या ब्रेन की बीमारी भी इसका कारण बन सकती है।

कलर ब्लाइंडनेस के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:

अनुवांशिक कारण:एनआईएच के अनुसार कलर ब्लाइंडनेस का सबसे आम कारण जेनेटिक बदलाव है। यह समस्या माता-पिता से बच्चों में जीन के जरिए पहुंच सकती है। खासकर लाल-हरे रंग की विजन लॉस अक्सर X क्रोमोसोम से जुड़े जेनेटिक पैटर्न के कारण होती है। इसी वजह से यह समस्या पुरुषों में महिलाओं की तुलना में ज्यादा देखने को मिलती है। अनुवंशिक कलर विजन डेफिशिएंसी आमतौर पर बचपन से मौजूद रहती है और ज्यादातर मामलों में समय के साथ बढ़ती नहीं है। कई बार व्यक्ति को खुद भी इसका पता नहीं चलता, जब तक कि उसे रंग पहचानने वाली किसी स्थिति का सामना न करना पड़े।

रेटिना से जुड़ी समस्याएं:क्लीवलैंड क्लीनिक के अनुसार आंख के पीछे मौजूद रेटिना में कोन सेल्स होती हैं, जो रंगों को पहचानने में अहम भूमिका निभाती हैं। अगर रेटिना किसी बीमारी या चोट से प्रभावित हो जाए, तो कलर विजन भी बदल सकती है।

उम्र से संबंधित मैकुलर डिजनरेशन (AMD), ग्लूकोमा और रेटिनल डिटेचमेंट जैसी कुछ आंखों की समस्याएं एक्वायर्ड कलर विजन डेफिशिएंसी से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए अगर किसी व्यक्ति को उम्र बढ़ने के साथ रंग पहले की तुलना में फीके या अलग दिखने लगते हैं, तो आंखों की जांच करवाना जरूरी हो सकता है।

ऑप्टिक नर्व को नुकसान:एनसीबी के अनुसार रेटिना से दिमाग तक विजुअल सिग्नल पहुंचाने का काम ऑप्टिक नर्व करती है। इसमें सूजन, चोट या किसी बीमारी के कारण नुकसान होने पर रंगों को प्रभावित करने की क्षमता हो सकती है। कुछ लोगों में ऑप्टिक नर्व की समस्या के दौरान रंगों की चमक कम महसूस होना या एक आंख से रंग अलग दिखना शुरुआती फ्लेक्स में शामिल हो सकता है। ऑप्टिक न्यूरिटिस और कुछ प्रकार की ऑप्टिक न्यूरोपैथी कलर विजन को प्रभावित कर सकती हैं।

ब्रेन या न्यूरोलॉजिकल कंडीशन:रंग देखने की प्रक्रिया केवल आंखों तक सीमित नहीं है। आंखों से मिलने वाले विजुअल सिग्नल को दिमाग प्रोसेस करता है। इसलिए ब्रेन या नर्वस सिस्टम की कुछ समस्याएं भी कलर परसेप्शन को प्रभावित कर सकती हैं।
नेशनल आई इंस्टीट्यूट के अनुसार मल्टीपल स्क्लेरोसिस और अल्जाइमर रोग जैसी कुछ न्यूरोलॉजिकल स्थितियों से कलर विजन डेफिशिएंसी जुड़ी हो सकती है। इसके अलावा ब्रेन इंजरी या विजुअल पाथवे को प्रभावित करने वाली कुछ अन्य स्थितियां भी रंग पहचानने की क्षमता में बदलाव कर सकती हैं। हालांकि अचानक रंगों में बदलाव होने का मतलब यह नहीं है कि कोई न्यूरोलॉजिकल बीमारी जरूर मौजूद है। इसके पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

कुछ दवाएं और उम्र का बढ़ना: क्लीवलैंड क्लीनिक के मुताबिक कुछ दवाओं के इस्तेमाल से भी कलर विजन प्रभावित हो सकता है। कुछ दवाएं रेटिना या ऑप्टिक नर्व पर असरह रंगों को देखने में बदलाव पैदा कर सकती हैं। इसलिए किसी नई दवा को शुरू करने के बाद अगर रंगों को पहचानने में अचानक परेशानी महसूस हो, तो डॉक्टर को इसकी जानकारी दें। इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ मोतियाबिंद और आंखों में होने वाले दूसरे बदलाव भी कलर परसेप्शन को प्रभावित कर सकते हैं। कई बार मोतियाबिंद के कारण रंग पहले की तुलना में कम असर या कुछ अलग दिखाई दे सकते हैं।

कलर ब्लाइंडनेस का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को सभी रंग दिखाई देना बंद हो जाते हैं। ज्यादातर मामलों में समस्या कुछ खास रंगों या शेड्स के बीच अंतर पहचानने में होती है। लाल-हरे रंग का विजन लॉस इसका सबसे आम प्रकार है, जबकि पूरी तरह रंग न देख पाना बहुत दुर्लभ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जन्म से मौजूद और अचानक विकसित हुई कलर विजन समस्या को एक जैसा नहीं समझना चाहिए। अगर रंग पहचानने की क्षमता में नया बदलाव आया है, तो नेत्र विशेषज्ञ से जांच करवाकर कारण पता करना जरूरी है।

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