अब वायरलेस तरीके से चार्ज होंगी बसें,नई तकनीक बदल देगी EV की दुनिया

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अभी तक इलेक्ट्रिक गाड़ियों या बसों को चार्ज करने के लिए हैवी और भारी-भरकम केबल की जरूरत पड़ती थी। इनसे होने वाली चार्जिंग में घंटों का समय भी लगता था। इस समस्या को दूर करने के लिए स्विट्जरलैंड के प्रतिष्ठित ईटीएच ज्यूरिख के स्पिन-ऑफ ‘विंडक्शन’ ने ऐसी वायरलेस चार्जिंग तकनीक बनाई है, जिसमें बस के पहियों से बस को चार्ज किया जा सकता है।

इतना ही नहीं यह सिस्टम बस से सवारियों के चढ़ने-उतरने के दौरान एक्टिवेट हो जाता है और 90% की जबरदस्त एफिशिएंसी दे सकता है। अगर इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाता है, तो यह इलेक्ट्रिक गाड़ियों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट की शक्ल बदलकर रख सकता है।

आमतौर पर गाड़ियों या बसों को वायरलेस तरीके से चार्ज करने के लिए सड़क पर लगी प्लेट और वाहन के बीच काफी दूरी होती है। इससे बिजली के ट्रांसफर होने की रफ्तार धीमी हो जाती है।
विंडक्शन ने इस दूरी को कम करने के लिए चार्जिंग कॉइल को सीधा बसों के टायर में फिट कर दिया। इससे चार्जिंग प्लेट और कॉइल के बीच की दूरी बहुत कम हो गई।
इस खास तकनीक की वजह से सड़क में लगी चार्जिंग प्लेट ग्रिड से जुड़कर चुंबकीय क्षेत्र बनाती है और जैसे ही बस उस प्लेट पर आकर रुकती है, टायर के अंदर मौजूद कॉइल बिजली को सीधे बैटरी में ट्रांसफर कर देते हैं।
इस तकनीक की खूबी है कि बस के पहिए हर समय करंट देने वाली प्लेट के संपर्क में रहते हैं। इससे ऊर्जा 10% से भी कम वेस्ट होती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार नॉर्मल टायरों में मजबूती के लिए स्टील बेल्ट का इस्तेमाल होता है। यह वायरलेस तकनीक के साथ काम नहीं कर सकते थे। इस चुनौती से निपटने के लिए कंपनी ने स्टील-मुक्त नए किस्म के टायर बनाए। इन टायरों की मदद से बस को वायरलेस तरीके से चार्ज करना संभव हो सका।

इसके अलावा रास्तेभर मिलने वाली चार्जिंग के चलते बसों में भारी बैटरियां लगाने की जरूरत भी नहीं रही। इसके अलावा छोटी बैटरी की वजह से बस की खरीद लागत भी घटेगी, वजन कम होगा और यात्रियों के लिए बस में ज्यादा जगह तैयार हो पाएगी।

इस तकनीक की टेस्टिंग ज्यूरिख एयरपोर्ट और ज्यूरिख ओएर्लिकॉन के बीच 24 स्टॉप वाले रूट पर हुई। इस पूरे रूट पर बस को सिर्फ दो बार चार्ज करने की जरूरत पड़ी।
दिनभर 16 घंटे चलने के दौरान ये बसें टुकड़ों में कुल तीन घंटे चार्ज हो सकेंगी, जिससे डिपो में रातभर पांच घंटे तक एक साथ चार्ज करने का लोड खत्म होगा।
इससे ग्रिड पर भी लोड नहीं पड़ेगा। सब कुछ सही रहा तो 2028 में इस तकनीक का पैसेंजर ट्रायल शुरू हो सकता है।

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