बीजेपी 40 फीसदी सांसदों की टिकट काट सकती है 

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अखिलेश अखिल 
हालिया पांच राज्यों के चुनाव में हिंदी पट्टी के तीन राज्यों राजस्थान ,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जिस तरह से बीजेपी की बड़ी जीत हासिल हुई है उससे बीजेपी के सांसदों की चिंता बढ़ गई है। इन तीन राज्यों में बीजेपी ने  प्रयोग किये थे। पहला प्रयोग तो यह था कि एंटी इंकम्बेंसी को रोकने के लिए नए उम्मीदवारों को ही ज्यादा से ज्यादा मैदान में उतारा था। दूसरा प्रायोहग सांसदों को चुनावी मैदान में उतारकर यह परखना था कि सांसदों के प्रति एंटी इंकम्बेंसी कैसा है ? ये दोनों प्रयोग बीजेपी के लिए सार्थक साबित हुए और इससे कई मायने भी बीजेपी के शीर्ष नेताओं को मिल गए। बीजेपी को यह पता चल गया कि आगामी चुनाव में क्या हाल होने वाला है ? 

तीन राज्यों में बीजेपी ने जिन नए उम्मीदवारों को मैदान में खड़ा किया था ,लगभग वे सब जीत गए। उनके समर्थन में जनता ने खूब वोट डाले लेकिन बाकी के पुराने लोग हारते चले गए। बीजेपी की जिन तीन राज्यों में भारी जीत हुई है उसमे नए उम्मीदवारों की बड़ी भूमिका बताई जा रही है। इसके साथ ही बीजेपी ने जिन राज्यों में सांसदों को विधान सभा चुनाव में उतारा था उनके बीच जो हार जीत हुई है उससे भी पार्टी को बड़ी जानकारी मिल गई है। बता दें कि बीजेपी ने तीन राज्यों में कुल 21 सांसदों को मैदान में उतारा था जिनमे 12 चुनाव जीत पाए और बाकी के 9 सांसद चुनाव हार गए।

 अब बीजेपी को मिले इस फीडबैक से पार्टी के सांसदों में हड़कंप मचा हुआ है। बहुत से सांसदों को लग रहा है कि इस बार उन्हें पार्टी टिकट नहीं देगी और मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने के लिए मोदी का आदमी बनाना जरुरी है। लेकिन इसके लिए मोदी नए आदमी की ही तलाश करते हैं। इस तलाशी अभियान भी संघ की भूमिका बड़ी होती है। यानी संघ जिन नेताओं को आगे बढ़ाएगी बीजेपी उसे ही टिकट देगी। तीन राज्यों में बीजेपी की जीत से बीजेपी सांसदों की चिंता काफी बढ़ गई है। 

अभी हाल में ही 21 और 22 दिसंबर को दिल्ली में बीजेपी नेताओं की दो दिवसीय बैठक हुई। इस बैठक में आम  चुनाव पर भी चर्चा हुई और 350 सीटें जीतने की बात सामने आयी। लेकिन जिस तरह से परीत्य के आला नेताओं ने अपनी बात सामने रखी है उससे साफ़ हो गया है कि जिनका जनाधार नहीं है और जो नेता जनता से कटे हुए हैं उन्हें टिकता मिलना मुश्किल है। बैठक में इस बात पर भी चर्चा की गई कि हालिया विधान सभा चुनाव में 21 सांसदों में से 9 सांसदों की हार  हो गई। यानी 40 फीसदी सांसद चुनाव हार गए। पार्टी  के शीर्ष नेता जब इस बात को आगे बढ़ा रहे थे तो पार्टी के कई बड़े नेता पसीना पोछ रहे थे। उन्हें लग रहा था कि पार्टी को यह एक कसौटी मिल गई है और अगर इस हिसाब से ही टिकट काटे जाते हैं तो करीब सौ से ज्यादा टिकट काटे जा सकते हैं। बता दें कि पिछले चुनाव में बीजेपी 303 सीटें जीतने में सफल हुई थी। 

 जानकार कह रहे हैं कि जब  40 फीसदी से ज्यादा सांसद अपने ही लोकसभा क्षेत्र की एक विधानसभा सीट से चुनाव हार गए तो बाकी सांसदों के साथ भी यही सब हो सकता है।  तभी कहा जा रहा है कि इसी अनुपात में सांसदों की टिकट कटने की संभावना है। इसका मतलब है कि भाजपा 40 फीसदी सांसदों की टिकट काट सकती है। यानी सौ से ज्यादा सांसद पैदल हो सकते हैं। वे या तो विधान सभा चुनाव लड़ सकते हैं या फिर घर बैठ सकते हैं। इन सांसदों में अधिकतर सांसद तो ऐसे हैं कि संगठन के लायक भी नहीं है। जनता के बीच उनकी कोई पहुँच भी नहीं है और उनकी सक्रियत भी कमजोर है।

 इस बीच भाजपा ने अलग अलग एजेंसियों के सर्वेक्षणों के साथ साथ नमो ऐप पर सांसदों के बारे में फीडबैक लेनी शुरू की है। नमो ऐप के जरिए लोगों से पूछा जा रहा है कि उनके सांसद क्षेत्र में कितना दिखाई देते हैं, लोगों से मिलते-जुलते हैं या नहीं और लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता कैसी है। इसके अलावा हर सीट पर तीन संभावित उम्मीदवारों के भी नाम पूछे जा रहे हैं। जब से यह सर्वे शुरू हुआ तब से सभी सांसद अपने क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा लोगों के फोन में नमो ऐप डाउनलोड कराने और अपने नाम पर मुहर लगवाने का अभियान चला रहे हैं। सांसद अपने समर्थकों से पॉजिटिव फीडबैक डलवा रहे हैं और साथ ही संभावित उम्मीदवारों में पहला नाम अपना डलवा रहे हैं। हालांकि उनको भी पता है कि यह पूरक सर्वे है। पार्टी नेतृत्व के पास हर सीट की फीडबैक पहले से है और उसका मिलान इससे किया जाएगा।

 सांसदों की चिंता इस बात को लेकर है कि वे नमो ऐप के सर्वे को नियंत्रित नहीं कर पाएंगे। सांसदों के विरोधी और संभावित उम्मीदवार भी उतनी ही मेहनत कर रहे हैं। इसके अलावा आम लोग भी अपनी ईमानदार राय उस पर डाल रहे हैं। 

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